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वजूद - 8

भाग 8

कड़ी मशक्कत के बाद गांव के बचे हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था और उनके खाने-पीने और रहने की व्यवस्था प्रशासन द्वारा की गई थी। बचे हुए लोगों की आंखे अब भी बहते पानी में और गांव की तबाही के बाद बचे हुए मलबे में अपनों को तलाश रही थी। हालांकि उम्मीद किसी को नहीं थी फिर तलाश जारी थी। कई आंखों में उस तबाही की दहशत साफ देखी जा सकती थी और कई आंखे अपनों के खोने के गम से अब तक नम थी। गांव तो फिर बस सकता था परंतु जिनके घर अपनों के ना होने से उजड़े हैं उसे फिर से बसा पाना असंभव था।

दूसरी ओर नदी में बाढ आ जाने के कारण गांव का रास्ता बंद कर दिया गया था। इस कारण सुखराम काका और शंकर गांव के बाहर ही फंस गए थे। उन्हें चिंता हो रही थी कि नदी में बाढ़ के बाद गांव के क्या हालात है। शंकर सबसे ज्यादा परेशान हो रहा था। वो बार-बार गाड़ी से उतरता और वहां लोगों से पूछता कि वो गांव में कब जा सकते हैं। प्रशासन और पुलिस के लोग हर बार उसे समझाते कि जब तक नदी का पानी नहीं उतरता है तब तक वे लोग गांव में नहीं जा सकते हैं। शंकर बार-बार उनसे पूछता कि गांव के लोगों के क्या हाल है, गांव में क्या हालात है। उन लोगों का कहना था कि वे लोग यहां है इसलिए गांव में क्या हालात है उसकी जानकारी उन्हें नहीं है। कुछ और लोग गांव में गए हैं जो भी पता है उन्हें ही पता है। शंकर की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी। उसे अपने भाई और भाभी का हाल जानना था। वे कहां है, किस हाल में है ? उसे सब जानना था परंतु उसे इस संबंध में कोई जानकारी नहीं मिल रही थी। वे सुखराम काका से भी बार-बार पूछ रहा था काका गांव में सब कुशल से तो होगा ना। काकी, भैया, भाभी गांव के और लोग सब कैसे होंगे ? सुखराम काका बस उसे दिलासा दे रहे थे कि बेटा चिंता ना कर सब ठीक होगा। सब सकुशल होंगे। नदी का पानी बढ़ गया है, गांव में कुछ नहीं हुआ होगा। शंकर बस मन ही मन प्रार्थना कर रहा था कि सुखराम काका जो कह रहे हैं बस वहीं सच हो। परंतु वो ये भी जानता था कि नदी का पानी बढ़ा है तो गांव में कुछ तो हुआ ही होगा। उसे ना सिर्फ अपने भैया-भाभी की चिंता हो रही थी, बल्कि गांव के कई ऐसे लोग थे, जिनसे वो जुड़ा था उनकी भी चिंता हो रही थी। वैसे तो शंकर के व्यवहार के कारण गांव का हर शख्स उसे प्यार करता था इस कारण ही शंकर को सभी की चिंता हो रही थी।

गांव के बाहर ही शंकर और सुखराम काका को दो दिन हो गए थे। दो दिन के बाद नदी का पानी नीचे उतरा और फिर गांव की ओर जाने के लिए रास्ता खोल दिया गया। सुखराम काका की गाड़ी तेजी से गांव की ओर चल पड़ी। करीब 45 मिनट का सफर करने के बाद जैसे ही उनकी गाड़ी गांव के करीब पहुंची तो उनकी गाड़ी यकायक रूक गई थी। गांव अब गांव नहीं बल्कि श्मशान नजर आ रहा था। पानी के उतर जाने के बाद टूटे मकान, मिट्टी का मलबा था। यहां से वहां तक सिर्फ तबाही का मंजर नजर आ रहा था। गांव के बीचों बीच बना मंदिर में टूट चुका था। गांव का पंचायत कार्यालय अब आधी दिवारों और टूटी छत के बगैर ही नजर आ रहा था। वो चबूतरा जहां शंकर अपने दोस्तों के साथ बैठा करता वो तो कही नजर ही नहीं आ रहा था। गांव का स्कूल भी पानी में दिवारों को खो चुका था। बस कुछ बची टूटी दिवारें ही नजर आ रही थी।

शंकर की आंखे इस मंजर को देख रही थी, पर वो इस पर यकीन नहीं कर पा रहा था। अचानक सुखराम काका के रोने की आवाज ने उसे फिर से वर्तमान में लाकर खड़ा कर दिया था। सुखराम काका रोए जा रहे थे और कहते जा रहे थे-

मैं लुट गया, मैं बर्बाद हो गया। मेरा घर, सुमित्रा सबकुछ बह गया। पूरा गांव ही खत्म हो गया है। हे भगवान ये क्या कर दिया, ये अनर्थ क्यों होने दिया भगवान क्यों होने दिया ?

सुखराम काका का यह रूदन सुन शंकर को अपने भैया-भाभी की याद आई। वह बिना सोचे समझे ही उस मलबे में कूद गया और बढ़ चला उस ओर जिस ओर उसका घर हुआ करता था। जब वो वहां पहुंचा तो वहां कुछ नहीं था। ना उसके भैया थे, ना भाभी थी और ना ही वो घर था, जिसमें वो अपने भैया-भाभी के साथ रहा करता था। वो पूछना चाहता था कि उसका घर कहां गया, उसके भैया कहां है, भाभी कहां है, पर वहां एक खामोशी थी। जो उसके किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे सकती थी। उस खामोशी को उसकी ही चीख ने तोड़ा और फिर निकला शंकर की आंखों से आंसूओं का सैलाब। वो वहीं बैठ गया था, उसके मुंह से सिर्फ दो ही शब्द निकल रहे थे, भैया-भाभी।

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