Shakunpankhi - 12 in Hindi Moral Stories by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | शाकुनपाॅंखी - 12 - डर किस बात का?

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शाकुनपाॅंखी - 12 - डर किस बात का?

19. डर किस बात का?

पेशावर के अपने शिविर में शहाबुद्दीन चहलकदमी कर रहे हैं। पार्श्व में पहाड़ियों पर उगते सूर्य की किरणें सोना बरसा रही हैं। हवा तेज है, सुल्तान के चेहरे पर चिंता की रेखाएँ । चोबदार ने प्रवेश कर आदाब किया, हुजूर एक फ़कीर .... ।'
' ले आओ', सुल्तान के मुख से निकला। उनकी दृष्टि द्वार पर ही टिक गई। चोबदार के साथ फकीर । बाल बिल्कुल सफेद । चेहरे पर इत्मीनान की रौनक । चोगा साफ धवल । फ़कीर ने एक नज़र सुल्तान को देखा । चोबदार वहाँ से हट गया। 'सुल्तान, मैं भी गोर का रहने वाला हूँ।' बैठते हुए फ़कीर ने कहा । 'पहचान रहा हूँ मैं ।' 'मुझे बताया गया कि आप गज़नी से आ गए हैं, अपनी फौज के साथ किधर जाने का इरादा है?"
'आपसे क्या छिपा है ? राय पिथौरा से हार कर मैं सो नहीं सका हूँ ।'
'अभी आपने अपने जंगजुओं को अपना मकसद क्यों नहीं बताया?'
'दुश्मन के भी रम्माज़ घूमते रहते हैं.......।’
' तुम्हारी सोच बेहतर है। इंशा अल्लाह तुम्हें फतह हासिल होगी। पर जंगजुओं में जुनून भरने के लिए मकसद बताना जरूरी है। ख़ैर, यह तुम्हारी हिक़मत अमली है, जैसा चाहो करो। पर मैं एक अर्ज़ करने आया हूँ.....।'
'हुक्म करें.....।'
'जिन जंगजुओ को पिछली जंग में मैदान छोड़ने पर आपने सजा दी थी, वे शर्मसार हैं। अपनी ग़लती का एहसास है उन्हें । मैं चाहता हूँ आप उन्हें मुआफ कर दें। वे पूरी ताकत से जंग में काम करेंगे। फिर आप की फौज और ताकतवर हो जाएगी।' सुल्तान एक क्षण सोचते रहे। कहा 'आपकी इस्लाह हमारे और इस्लाम दोनों के लिए मुफीद है। मैं अपने कारिन्दे भेजकर उन जंगजुओं को बुलवा लेता हूँ।' 'बहुत अच्छा, मैं चलता हूँ । आपकी फ़तह के लिए दुआ करूँगा ।'
फ़कीर के जाने पर सुल्तान कुछ देर सोचते रहे, नफा नुक्सान जैसे जोड़ रहे हों ।
सुल्तान ने ताली बजाई। चोबदार उपस्थित हुआ ।
'तातार खां ।'
चोबदार उन्हें बुलाने चला गया। थोड़ी ही देर में तातार उपस्थित हुए।
'अपने सिपहसालारों को इकट्ठा करो। जरूरी बात करनी है।' तातार व्यवस्था करने चले गए। इसी बीच सुल्तान ने जलपान किया ।
सिपहसालारों के साथ बैठक करते हुए सुल्तान ने बताया, 'पिछली जंग में हार के बाद जिन जंगजुओं को हमने सज़ा देकर छोड़ दिया था, अब उन्हें बुलाना चाहता हूँ। पता चला है, वे सब शर्मसार हैं। वे सब पूरी ताकत से लड़ेंगे।'
"यह सही फैसला है। इससे अपनी ताकत बढ़ेगी। सभी ने अपनी सहमति जताई। आज बहुत दिन बाद शहाबुद्दीन गोरी के चेहरे पर मुस्कान दिखी। उसने तुर्क, ताज़िक खल्जी और अफगान घुड़सवारों की सेना का निरीक्षण किया। एक बड़े मैदान में उसने सबको इकट्ठा किया। गिनती में संख्या एक लाख बीस हजार पहुँच गई। उसने एक ऊँचे टीले पर खड़े होकर संबोधित करना शुरू किया-
'खुदा के बन्दों, आप नहीं जानते हैं कि हमने आपको क्यों इकट्ठा किया है? पर आज मैं बताता हूँ। हमें हिन्द के सरताज पृथ्वीराज को शिकस्त देनी है। पिछले छः सालों से हमारी उसकी टक्कर होती रही। कितनी बार उसने हमारे सिपहसालारों को कैद कर छोड़ दिया। अभी पिछले साल तो मैं ही मुश्किल से बच पाया। (हाथ से संकेत कर) इस खल्जी पट्टे ने मुझे बचाया।'
सभी की आँखें उस खल्जी जवान को देखने लगीं।
'मेरे भीतर आग जल रही है। मैं गर पृथ्वीराज को हरा नहीं सका तो लौट कर नहीं आऊँगा । तुम लोग भी सोच लो । मैं जंग सिर्फ जंग के लिए नहीं लड़ना चाहता। मैं जंग जीतना चाहता । हमें जंग जीतना है।'
'अल्लाहताला हमें जिताएगा,' घुड़सवारों ने हुंकार भरी । 'अब भी मौका है गर तुम्हें खून बहाने से डर लगता हो तो घर लौट जाओ । हमारे साथ सर हथेली पर रख कर चलना है।'
'हम तैयार हैं मालिक,' घुड़सवारों की ओर से आवाज़ आई ।
'दुबारा, तिबारा सोच लो । खौफ खाने वालों को मेरे साथ चलने की ज़रूरत नहीं है। राय पिथौरा को जीत पाना कोई हँसी खेल नहीं है। बहुत फुर्ती और होशियारी की ज़रूरत पड़ेगी। दिन दिन, रात रात घोड़े की पीठ से जीन उतारी नहीं जाएगी। तभी हम कोई उम्मीद कर सकते हैं। पर हमें हर हाल में यह जंग जीतनी है। जंग जंग होती है। सर पर कफ़न बांध कर चलना होगा। बोलो तैयार हो ?"
'हम पूरी तरह तैयार है । इन्शा अल्लाह हमारी फ़तह होगी।' घुड़सवारों ने पूरी शक्ति से उत्तर दिया ।
'तो ठीक है गर हमारी फ़तह हुई तो सोने, चाँदी, जवाहरात से तुम्हारे घर भर जाएंगे।'
'खुदा सुल्तान को फतह दे', सभी जोर से चिल्ला पड़े।
'तो याद रखो, हमें फ़तह के लिए लड़ना है। हम खुदा के बन्दे हैं। खुदा हमारी मदद करेगा।'
सुल्तान ने झुक कर खुदा से दुआ माँगी। सैनिकों ने भी वैसा ही किया ।
सैनिकों से कहा गया कि अगले दिन फज़िर की नमाज के बाद कूच करना है। उन्हें तैयारी का मौका दिया गया। घुड़सवार अपने अपने अड्डों की ओर चल पड़े। शहाबुद्दीन घुड़सवारों को संबोधित कर निकला ही था कि एक सूफ़ी फ़क़ीर उससे टकरा गया।
फ़क़ीर ने पूछा, 'कहाँ जा रहे हो?'
'हिन्द की ओर कूच कर रहा हूँ।'
'कूच का मकसद ?"
'हिन्द के सरताज, पृथ्वीराज पर फतह हासिल करना ।'
"तो तुम खून बहाने जा रहे हो ।'
'फतह के लिए खून बहाना ही पड़ेगा।'
‘रहम करो। इंसान का खून बहाकर अपने को खुदा का बंदा कहते हो ।'
'हम काफ़िरों को ख़ुदा के बंदे बनाएंगे। क्या यह ख़ुदा का काम नहीं है?"
'तुम गफलत में हो सुल्तान । खुदा यह कभी नहीं चाहता कि तलवार से इस्लाम कुबूल कराया जाए, पर तुम लोग अपनी जीत पक्की करने के लिए इस्लाम का सहारा लेते हो। ऐसी समां बाँधते हो जैसे जंग करना इस्लाम कुबूल कराने के लिए जरूरी है। इस्लाम का इससे भला तो न होगा पर तुम्हारा फायदा ज़रूर होगा। पूरी कौम को तुम अंधी खोह में ठेल दोगे ।'
“फ़कीर तुम किस से बात कर रहे हो, जानते हो?" तातार खां बोल पड़ा।
'खुदा के बन्दे से, जो तलवार के ज़रिये इस्लाम फैलाना चाहता है, जिसे यह पता नहीं कि ख़ुदा मज़बूर, कमजोर की ख़िदमत करने का हुक्म देता है, खून बहाने का नहीं । इन्सान कितना पागल हो गया है? या खुदा! राह दिखा इन नासमझों को ।'
'फ़क़ीर तुम मेरे साथ चलोगे?”
"कहाँ?"
'मैं तुम्हें अपने साथ हिन्द ले चलना चाहता हूँ जिससे तुम्हें दिखा सकूँ कि कितने काफ़िरों से मैंने इस्लाम कुबूल कराया हैं ?"
'हो सकता है कि मैं भी किसी रास्ते हिन्द पहुँच जाऊँ। उनके मज़हब में भी बहुत ऊँची ऊँची बातें हैं। मैं उन्हें जानने की कोशिश करूँगा। पर सुल्तान तुम्हारे साथ तो न जा सकूँगा ।'
"क्यों?"
'कातिलों और फ़क़ीर का क्या साथ ?"
'सुल्तान को कातिल कहते तुम्हें डर नहीं लगा?' तातार खां उबल पड़ा ।
'डर किस बात का तातार खां? एक फ़कीर हकीकत न बयां करे इस डर से कि सामने सुल्तान खड़े हैं। कातिल न कहूँ तो मैं तुम लोगों को और क्या कहूँ.. .? हिन्द के लोगों ने तुम लोगों पर कोई हमला तो किया नहीं है फिर तुम्हारे जंग छेड़ने का सब़ब ? तुम लोग हिन्द में लूट पाट करोगे, इस्लाम तो एक बहाना है। मज़हब का नशा देकर तुम लोगों को आग में कुदा सकते हो। पर सोच लो सुल्तान, जो पगडंडी तुम बना रहे हो उससे दुनिया का बहुत नुक्सान होगा। भरपाई नहीं हो सकेगी।
इस्लाम को गलत रास्ते पर न खींचो सुल्तान। ख़ुदा मुहब्बत चाहता है, नफरत नहीं ।'
'तुम फ़क़ीर न होते तो मैं खुद तुम्हें न छोड़ता ।' तातार खां से न रहा गया।
"फ़कीर को किस बात का डर है तातार खां?"
"कोई हीरे जवाहरात तो वह बांध कर चलता नहीं। उसकी जिन्दगी ही है, कोई जब चाहे ले ले। इससे क्या फर्क पड़ता है?"
“गर तुम्हारा क़त्ल करने का हुक्म हो जाए तो।'
'कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आज़माना चाहो तो आज़मा सकते हो ।'
'चलो तातार खाँ । फकीर की बातों में आकर हम अपना रास्ता भूल जाएँगे ।'
फ़क़ीर चल पड़ा। शहाबुद्दीन गोरी और तातार खां भी अपने घोड़ों पर आगे बढ़ गए।