Andhyug aur Naari - 6 books and stories free download online pdf in Hindi

अन्धायुग और नारी--भाग(६)

उस रात देवदासी तुलसीलता ने मंदिर में नृत्य किया और उसके बाद वो अपनी कोठरी में जाकर आराम करने लगी,तभी आधी रात के समय किसी ने उसकी कोठरी के द्वार की साँकल खड़काई,तुलसीलता ने भीतर से ही पूछा....
"कौन...कौन है"?
तभी बाहर से आवाज़ आई...
"मैं हूँ तुलसीलता,किवाड़ खोलो,देखो कोई तुमसे मिलने आया है",
"अच्छा! पूरन काका! आप! जरा ठहरिए! मैं अभी किवाड़ खोलती हूँ",
और ऐसा कहकर तुलसीलता ने अपनी कोठरी के किवाड़ खोल दिए,पूरन काका जो कि पुजारी जी के यहाँ नौकर थे वें तुलसीलता से बोले...
"तुम्हें अभी इसी वक्त हवेली जाना होगा,ठाकुर साहब ने तुम्हें बुलवाया है"
"लेकिन मैनें तो पहले ही वहाँ जाने से मना कर दिया था",तुलसीलता बोली....
"अब मैं उनके लठैतों को क्या जवाब दूँ"?,पूरन काका बोले...
"उन लोगों को कोई भी जवाब देने की जरूरत नहीं है,मैं उन्हें जवाब दे चुकी हूँ,आप जाकर आराम कीजिये,जब कोई भी उनकी बात नहीं सुनेगा तो वे लोग अपनेआप वापस चले जाऐगें",तुलसीलता बोली...
"ठीक है तो मैं जाकर आराम करता हूँ,लेकिन तुम जरा सावधान रहना,ठाकुर शिवबदन किसी की ना नहीं सुनते",
पूरन काका जाते जाते तुलसीलता से बोले और पूरन काका के जाते ही तुलसीलता ने अपनी कोठरी के द्वार बंद कर लिए लेकिन फिर किसी ने थोड़ी देर बाद तुलसीलता की कोठरी के किवाड़ की साँकल खड़काई,इस बार फिर तुलसीलता ने पूछा कि कौन है,लेकिन किवाड़ो के दूसरी ओर से कोई जवाब नहीं आया,जब किवाड़ो के दूसरी ओर से कोई आवाज़ नहीं आई तो तुलसीलता ने फिर पूछा कि कौन है लेकिन इस बार भी कोई जवाब नहीं आया,लेकिन इस बार उसकी कोठरी के किवाड़ो पर कोई बार बार धक्का दे रहा था और बार बार धक्का देने पर कोठरी के कमजोर किवाड़ खुल गए,किवाड़ खुलते ही पाँच छः लोग कोठरी के भीतर दाखिल हुए और उन्होंने तुलसीलता के हाथ पैर बाँधे,मुँह पर भी पट्टी बाँधी और उसे उठाकर ले चले,वें सब और कोई नहीं ठाकुर शिवबदन सिंह के लठैत थे जो तुलसीलता को उठाने आए थे,रात के अँधेरे में वें सभी तुलसीलता को उठाकर हवेली ले गए.....
हवेली पहुँचकर उन लठैतों ने तुलसीलता के हाथ पैर खोल दिए और मुँह पर लगी पट्टी भी खोल दी,मुँह पर लगी पट्टी खुलते ही तुलसीलता चीखने लगी,उसके चीखने की आवाज़ मेरी कोठरी तक भी आ रही थी,क्योंकि मेरा कमरा दादाजी की बैठक के साथ लगा हुआ था और ये सब मैं बचपन से ही सुनता चला आ रहा था,इसलिए इन सब चींजो की मुझे आदत सी हो गई थी,उसके चीखने पर दादाजी बोलें....
"कितना भी चीख ले, यहाँ तुझे बचाने कोई नहीं आने वाला",
"तू समझता क्या है खुद को,तेरे पास दौलत है तो तू सबको खरीद लेगा",तुलसीलता बोली....
"हाँ! मेरे पास दौलत है और मैं सबकुछ खरीद सकता हूँ",दादाजी बोले....
"भगवान से कुछ तो डर,इस बुढ़ापे में ऐसा कुकर्म करते तुझे लाज नहीं आती",तुलसीलता बोली...
"नहीं आती लाज,तभी तो तुझे यहाँ बुलवाया है",दादाजी बोलें....
"क्यों अपना बुढ़ापा खराब कर रहा है,देख लेना कुत्ते की मौत मरेगा एक दिन",तुलसीलता बोली....
"तू कुछ भी बक ले मेरे बारें में,तेरी मर्जी और तेरी जैसी औरतें मुझे ना जाने कब से गालियाँ देतीं चलीं आ रहीं हैं,लेकिन मैं आज तक तो नहीं मरा,तेरे जैसी देवदासी भी थोड़ी गालियाँ सुना देगी मुझे तो कौन सा फर्क पड़ने वाला है",दादा जी बोलें....
"ठाकुर!तू इन्सान के रुप में शैतान है",तुलसीलता बोली...
"हाँ! मैं शैतान ही हूँ,बोल क्या करेगी",दादाजी बोले....
उस देवदासी की आवाज़ से मुझे पता तो चल ही गया था कि वो और कोई नहीं तुलसीलता है,इसलिए मेरा मन घबरा रहा था,लेकिन मैं उस समय मजबूर था,मैं दादा जी के खिलाफ नहीं जा सकता था.....
और तभी एक चमत्कार हुआ,दादाजी के लिए एक लठैत संदेशा लेकर आया और दादाजी से बोला....
"हूजूर! पास वाले गाँव के ठाकुर मानसिंह ने आपके लिए बग्घी भेजी है,लखनऊ की मशहूर तवायफ़ हुस्नाबानो उनके यहाँ महफिल जमाने आई है,वो बस आज रात ही रुकने वाली है,आप बग्घी से जाऐगें तो वहाँ पहुँचने में मुश्किल से आधे घण्टे का वक्त लगेगा,ठाकुर साहब ने खास गुजारिश की है कि आप उस महफ़िल में जरूर पहुँचे,आपके बिना उनकी महफिल अधूरी है,वें आपका इन्तज़ार कर रहे हैं",
"तो अब इस देवदासी का क्या होगा"?,दादाजी ने पूछा....
"ये तो यहाँ रुक सकती है,इसे कल रात तक के लिए यहाँ बाँधकर रखते हैं,,लेकिन एक बार हुस्नाबानो चली गई तो दोबारा नहीं आऐगी",लठैत बोला...
"तो फिर मेरे जाने की तैयारी करो,हुस्नाबानो के लिए ठाकुराइन से कुछ जेवर माँगकर लाओ,हुस्नाबानो को तोहफा भी तो देना पड़ेगा,लोगों को भी तो पता चले कि ठाकुर शिवबदन सिंह क्या चींज है",दादाजी बोले....
और फिर लठैत दादी जी से जेवर माँगने पहुँचा,दादी ने गैर मन से तिजोरी से कुछ जेवर और सोने चाँदी की अशर्फियाँ निकालकर लठैत को दीं और लठैत ने फिर वो सब दादा जी के हाथ में थमा दिया और दादा जी नई शेरवानी पहनकर बग्घी में बैठकर दूसरे गाँव की ओर चल पड़े,ये कोई नई बात नहीं थी,ये सिलसिला तो सालों से चल रहा था और दादी को इन सबकी आदत सी हो गई थी.....
दादी जब जवान थी तो दादाजी के खिलाफ आवाज़ उठा दिया करतीं थीं लेकिन तब दादा जी उनके साथ मारपीट करके उनका मुँह बंद करा दिया करते थे,फिर दादी ने अपने बच्चों की खातिर आवाज़ उठाना बंद कर दिया,क्योंकि वें अपनी विधवा जेठानी का हाल देख चुकीं थीं,उनके जेठ जी उनकी जेठानी के साथ ऐसा ही व्यवहार किया करते थे और वें शादी के एकाध साल के बाद ही वें पागल हो गईं थीं,उनके कोई सन्तान नहीं थीं फिर उनके पति यानि कि मेरे बड़े दादाजी को कोढ़ हो गया था और उन्होंने किसी नदी में डूबकर आत्महत्या कर ली थी....
बड़े दादाजी के मरने के बाद मेरी दादी ने अपनी जेठानी यानि कि मेरी बड़ी दादी को कुछ दिनों तक सम्भाला और उनका ख्याल रखा लेकिन कुछ दिनों बाद उन्हें पागलपन का बहुत भयंकर दौरा पड़ा और उनके दिमाग की नस फट गई फिर उनकी मृत्यु हो गई,इसलिए दादी फिर सावधान रहने लगी ,वें अपनी हालत अपनी जेठानी जैसी नहीं करना चाहती थीं,क्योंकि तब तक उनकी गोद में उनकी पहली सन्तान आ चुकी थी और फिर उन्होंने उस सन्तान की खातिर अपने ग़मो और अपनी जिन्दगी से समझौता कर लिया था और तब से वें अभी तक केवल समझौता ही करतीं चलीं आ रहीं थीं,जब भी दादाजी ने जो कुछ भी माँगा,दादी ने फौरन ही उन्हें तिजोरी से निकालकर दे दिया.....
खैर! दादाजी जी तो दूसरे गाँव हुस्नाबानो की महफिल में चले गए थे और अब तुलसीलता लठैतों की निगरानी में थीं,दादाजी के जाते ही सभी लठैतों ने महुए की देशी शराब की छोटी छोटी मटकियाँ निकाली और पीने लगे,क्योंकि दादाजी के हवेली से जाते ही उन सभी का डर भी चला गया था और वें सभी बेझिझक शराब पीने लगे और कुछ देर में ही बेसुध होकर खर्राटे भरने लगे और मैं इसी ताक में था कि सभी लठैत कब सो जाएं और मैं तुलसीलता को उस कमरें से छुड़वा लूँ,मुझे तुलसीलता की आवाज़ से ही पता चल गया था कि वो तुलसीलता ही होगी और मैं दादाजी की बैठक में पीछे की खिड़की से वहाँ पहुँचा क्योंकि आगे के दरवाजे पर तो सभी लठैत पहरा दे रहे थे....
मैं खिड़की से भीतर पहुँचा तो लालटेन के उजाले में मुझे रस्सियों से बँधी तुलसीलता दिखी,जो शायद बैठे बैठे ही ऊँघ रहीं थीं,मैं धीरे से उसके पास पहुँचा और उससे बोला....
"घबराओ मत तुलसीलता! मैं आ गया हूँ",
और फिर धीरे धीरे से उसने अपनी आँखें खोलीं.....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....


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