अस्तित्व
मनोहर के मन-मस्तिष्क पर अस्तित्व शब्द ने खलबली मचा दी थी। उसने सुन रखा था कि आपका अस्तित्व ही आपका जीवन है। उसने कई लोगों से इस विषय पर चर्चा की लेकिन उस प्रश्न की जकड़न को वो अब भी महसूस कर रहा था। अस्तित्व के प्रश्न ने कई और प्रश्नों को जन्म दे दिया था, जैसे- सफलता-असफलता और सौभाग्य-दुर्भाग्य। एक स्पष्ट मनोवृति उभर आयी थी कि सफलता मतलब सौभाग्य और असफलता मतलब दूर्भाग्य। एक ओर तो मनोहर ने सुन रखा था कि सौभाग्यवादी पैदा होते हैं और मन के एक कोने में यह बात भी उथल-पूथल मचा रखी थी कि कर्म और परिश्रम से भाग्य को बदला जा सकता है मगर कब और कैसे की उधेड़बून में पड़ा हुआ था। लगातार कई बार की असफलता ने मनोहर के मन-मस्तिष्क पर कुठाराघात किया। निराशावादी विचारो के घने कोहरे ने उसके आत्मविश्वास के अस्तित्व को बुरी तरह से झकझोर दिया था। अपने पाश में बांध लिय था। एक तो असफलता की मार, फिर गरीबी की मार और उस पर मौसम की मार झेलने को मजबूर था। गर्मी और बरसात जैसे तैसे काट लेने के बाद अब बारी थी हाड़-मांस कपंकपा दने वाली ठंडी हवाओं के मार की ।
रात भी अंधेरी और दिन भी घने कोहरे के कारण अंधेरा। घना कोहरा के कारण एक कदम पर भी रखा सामान भी नज़र नहीं आ रहा था। मनोहर का ध्यान आकाश की ओर गया। सुर्यदेव थोड़ा धुमिल प्रतीत हो रहे थे।
मनोहर का निकाला गया यह निष्कर्ष की जैसे घना कोहरा सुर्यदेव के अस्तित्व को निगल नहीं सकता उसी प्रकार आपके आत्मविश्वास के अस्तित्व को निराशावादी घने कोहरे द्वारा नहीं निगलने दुंगा।
मनोहर के ढृढ़ प्रतिज्ञा ने मनोहर को सफल बना दिया।
समाप्त
निठल्ला लल्ला
’’मुफ्त की रोटियाँ तोड़ता है, नकारा है, निठल्ला है। निठल्ला हुआ तो क्या हुआ मेरा लल्ला है। ’’
अपनी पत्नी की इस बेतूकी जवाब पर भड़कते हुए कामता प्रसाद जी ने कहा ’’ तुम्हारे लाड-प्यार ने इसको बिगाड़ कर रखा है, तुम्हारा लल्ला कब बड़ा होकर निठल्ला हो गया तुमको पता भी नहीं चला। देखना एक दिन ये जेल में होगा और हम दोनां वृद्धाश्रम में। ’’
कामता प्रसाद जी ने अपनी बात को खत्म किया , चश्मा लगाया और निकल गए बाहर। कई दिनों तक कामता प्रसाद और उनके बेटे में बात-चित नहीं हुई। कामता प्रसाद जी की पत्नी शीला अपने लल्ला और उसका खर्चा खुल्ला का ख्याल भली-भांति रख रही थी।
एक दिन कृष्णा घर आया तो , कामता प्रसाद जी अखबर पढ़ रहे थे, उन्होंने कृष्णा पर तीरछी नज़र डाला और कृष्णा के पैंट के फूले हुए पैकेट ने उनको एहसास करा दिया कि उसकी जेब में कुछ न कुछ है। कामता प्रसाद जी ने हाथ के इशारे से, अपनी बगल वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया तो कृष्णा सकपका कर वहीं बैठ गया। कामता प्रसाद , कृष्णा को एकटक निहार रहे थे और कृष्णा नज़र नीची किए हुए बैठा हुआ था। कामता प्रसाद जी ने कहा ’’ तुमने मेरी बात कब मानी है जो आज मानोगे, लेकिन आज अगर मेरी बात मान लो तो जिन्दगी भर तुम्हार एहसान मानूंगा। ’’
कृष्णा की पाँचों इन्द्रियां अगली बात सुनने के लिए तैयार थीं। पती की बात सुनकर शीला भी वहां आ गयी। कामता प्रसाद जी ने अखबार दिखा कर कृष्णा से कहा ’’ देखो, आज नयी कम्पनी में नोकरी के लिए विज्ञापन निकला है और संयोग से मेरे एक मित्र की सीधी पहचान कम्पनी के मालिक से है। तुम काम करोगे या मैं तुम्हारे आगे रोउं-गिड़गिड़ाउं ? ’’
अपने पिता द्वारा रोने-गिड़गिड़ाने की बात ने कृष्णा के मन-मस्तिष्क पर तर्कसंगत असर डाला। एक तो पिताजी के द्वारा कही गयी बात और वो भी दो महीने के बाद बात-चित।
कामता प्रसाद जी कृष्णा के जवाब की प्रतीक्षा में थे और कृष्णा ने अपने पैंट की जेब से अखबार का एक पन्ना निकाल कर कहा ’’ हां, मैं यह काम करूंगा। और अभी जा रहा हूं। ’’
कामता प्रसाद जी ने मिलान किया कि दोनों एक ही विज्ञापन, एक ही नौकरी की बात कर रहे हैं। कृष्णा के आँखों में आँसु देखकर कामता प्रसाद जी अपने आप को रोक नहीं पाए और खुद भी रोने लगे। आज सही मायने में बेटा और बाप के मन से मन का मिलन हुआ था।
कृष्णा ने कड़ी मेहनत से साबित कर दिया कि अब वो निठल्ला नहीं है।
आज न तो कृष्णा जेल में है औन न उसके माता-पिता ही वृद्धाश्रम में।
शीला अब और गर्व से कहती है कि ’’यह मेरा लल्ला है। ’’
समाप्त