बेटा
बड़ी थकान महसुस हो रही थी। रास्ते में कई बार कई पेड़ के नीचे बैठ कर सुस्ता चुका मोहना का ऐसा हाल था। एक तो शरिरिक कमजोरी, उस पर तबियत खराब और जाना इतना जरूरी था कि बिना गए काम न बने।
माँ के इस बात पर ’’ दो दिन नहीं जाएगा तो कौन सा आफत आ जाएगा। ’’
मोहना ने जवाबस्वरूप कहा ’’ माँ, बिगड़ने का क्या है। मगर उसका, जिसके पास मैं जा रहा हूं, उसका मन बदल गया तो बहुत कुछ बदल जाएगा। ’’
मोहना को कम ही उम्र में बड़ा तर्जूबा हो गया था। कम से कम इतना तर्जूबा हो ही गया था कि नियत और सिरत कभी भी बदल सकती है। स्थिति आपकी कितनी भी खराब हो, मगर आपकी आर्थिक स्थिती खराब होते ही लोगों को चांदी हो जाती है। आपकी खराब स्थिती को लोग अपनी कमाई का जरिया बना लेते हैं। बाद में एहसान जताएंगे सो अलग। आपके द्वारा की गई सारी मदद सिर्फ एक दिन की जरूरत पुरी न होने पर फिकी पड़ जाएगी और मदद का नामोनिशान सामने वाले के मन से सदा के लिए मिट जाएगा। यही हुआ था मोहना के साथ भी।
नयन को लाख समझाने पर कि ’’ पिता जी इस बार पैसा नहीं भेज पाएंगे और हमको पैसों की जरूरत है, सौ-दो सौ रूपया ज्यादा ही लौटा दुंगा। ’’
मगर उसका मन पसीजा भी तो ब्याज की हामी भरने पर। सो मोहना को आज नयन के घर पहूंचना ही था क्योंकि नयन तो दस प्रतिशत का ब्याज मांग रहा था, बड़ी मुश्किल से 5 प्रतिशत पर राजी किया था उसको।
मोहन को अपने घर के द्वार पर देखा कर नयन को इतनी प्रसन्नता हुई कि जैसे मोहन के इन्तजार में ही बैठा हो। हालांकि उसने चाय-पानी तो नहीं पुछा लेकिन मिठाइयों की मिठास भरी नयन की बातें मोहन को मंत्रमुग्ध करती रही। मीठी-मीठी बातें सच्ची मित्रता का अनुभव कराती रही। नयन ने अपनी मीठी-मीठी बातों से मोहन के मन-मस्तिष्क में इतनी मिठास भरी दी कि मोहन को कहना पड़ा ’’ घर में माँ अकेली है, मेरा रास्ता देख रही होगी। पैसा जल्दी मिल जाता तो जल्दी घर जाता। ’’
नयन ने कहा ’’ हाँ हाँ क्यों नहीं, अभी लो। ’’
मोहन तो थोड़ा बहुत पढ़ा ही था कि कम से कम चिट्ठी-पत्री का काम कर सकता था। मोहना ने लेन-देन के कागजात पर हस्ताक्षर करने के लिए ज्योंही कलम उठाया तो नयन ने बड़ी शालीनता से उसके हाथ से कलम लेकर कहा ’’ नहीं भइया, मैं तो अंगूठा पर ही विश्वास करूंगा। ’’
’’ जैसी तेरी मर्जी, ले ले तु भी साहुकारी के मजे। ’’ बोलकर अंगूठा लगाया और बिन गिने ही रूपया जेब में भर लिया।
माँ के प्रति चिन्ता ने मोहन के चहलकदमी को और तिव्र किया और आधे समय में ही उसने दुरी नाम ली । बेटे का मूंह देखने के लिए द्वार पर बैठी उसकी माँ की खुशी का कोई ठीकाना न रहा। मोहना की थकान को महसूस करते हुए ,माँ ने पांव दबाना प्रारम्भ किया, पहले तो मोहन को अनुभव ही नहीं हुआ कि माँ की हथेली कुछ ज्यादा ही गर्म लग रही है। मोहन ने उठकर माँ के ललाट को स्पर्श किया तो पता चला कि कुछ गर्म है। मोहना ने झट उठकर माँ को चारपायी पर लिटाते हुए कहा ’’ माँ ही केवल बेटा की थकान को महसूस कर सकती है, बेटा को अपनी माँ की थकान का अनुभव नहीं होना चाहिए ? ’’ बोलकर माँ के पाँव दबाने लगा। मंद’-मंद मुस्काती माँ, अपने बेटे का स्वभाव देख कर प्रफुलित हो रही थी और मन ही मन उसके व्याह की सोचने लगी।
समाप्त