Hamara Pyara Samvidhan in Hindi Philosophy by Er.Vishal Dhusiya books and stories PDF | हमारा प्यारा संविधान

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             भारतीय संविधान का इतिहास:- 

भारतीय संविधान का इतिहास ब्रिटिश काल के विभिन्न अधिनियमों (विशेषकर 1919 और 1935) से शुरू होकर 1946 में संविधान सभा के गठन और 26 नवंबर 1949 (स्वीकृत) व 26 जनवरी 1950 (लागू) तक विस्तृत है। यह 299 सदस्यों की सभा द्वारा निर्मित, डॉ. बी.आर. अंबेडकर की अध्यक्षता में तैयार, विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 

भारतीय संविधान के इतिहास के मुख्य बिंदु:- 

ऐतिहासिक विकास: 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से लेकर 1935 के भारत सरकार अधिनियम (सबसे बड़ा स्रोत) तक, जिसने संवैधानिक ढांचे की नींव रखी।

संविधान सभा (1946): भारत का संविधान लिखने वाली सभा का गठन 1946 में हुआ, जिसमें 299 सदस्य थे।

निर्माण प्रक्रिया: 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन की अवधि में विभिन्न देशों के संविधानों से प्रेरित होकर यह तैयार किया गया।

संविधान निर्माण में डॉ बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के योगदान




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भारतीय संविधान निर्माण में डॉ ...

डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार (जनक) थे, जिन्होंने 29 अगस्त 1947 को संविधान की प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उन्होंने समानता, न्याय, बंधुत्व और स्वतंत्रता पर आधारित, अस्पृश्यता उन्मूलन और आरक्षण जैसे प्रावधानों के साथ दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक संविधान को आकार दिया। 

www.constitutionofindia.net

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संविधान निर्माण में प्रमुख योगदान:

प्रारूप समिति के अध्यक्ष: बाबा साहेब ने विभिन्न समितियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों का गहन अध्ययन किया और संविधान का अंतिम मसौदा तैयार किया। वे संविधान सभा की बहसों में सक्रिय रहे और हर प्रश्न का तार्किक उत्तर दिया।

मौलिक अधिकार और न्याय: उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी। भारतीय नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करना उनके दूरदर्शी दृष्टिकोण का परिणाम था।

सामाजिक समानता (अस्पृश्यता का अंत): अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से छुआछूत (अनुच्छेद 17) को संवैधानिक रूप से समाप्त किया और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के प्रावधान सुनिश्चित किए, जो कि सदियों से हो रहे भेदभाव के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम था।

अल्पसंख्यकों के अधिकार: उन्होंने संविधान में भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए।

कानून और संवैधानिक उपाय: संविधान में संशोधन की प्रक्रिया (अनुच्छेद 368) और संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32) को शामिल किया। उन्होंने अनुच्छेद 32 को 'संविधान की आत्मा और हृदय' कहा था, जो मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है।

लोकतांत्रिक ढांचा: उन्होंने एक स्वतंत्र न्यायपालिका, मजबूत कार्यपालिका और कानून के शासन की स्थापना सुनिश्चित की। 

                            निष्कर्ष:- 

डॉ. अंबेडकर ने समाज के सबसे कमजोर वर्ग के अधिकारों की रक्षा की और भारत को एक आधुनिक, लोकतांत्रिक और समावेशी राष्ट्र बनाने के लिए एक व्यापक, व्यावहारिक और प्रगतिशील संविधान प्रदान किया, जिसे 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया।

महत्वपूर्ण तिथियां:

26 नवंबर 1949: संविधान सभा द्वारा संविधान को अपनाया गया।

26 जनवरी 1950: संविधान पूर्ण रूप से लागू हुआ।

मूल संरचना: मूल रूप से 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियां थीं (अब बढ़कर 448+ अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं)।

हस्तलिखित: प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने संविधान के हर पन्ने को अपने हाथों से लिखा। 

             भारतीय संविधान की प्रस्तावना

"हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय;

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता;

प्रतिष्ठा और अवसर की समता;

प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में,

व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता

सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए,

दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।" 

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मुख्य विशेषताएं और शब्द:

हम भारत के लोग: संविधान की शक्ति का स्रोत।

संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न: देश आंतरिक और बाहरी मामलों में स्वतंत्र है।

समाजवादी और पंथनिरपेक्ष: 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा जोड़े गए।

न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व: राज्य का आदर्श।

संविधान अपनाने की तिथि: 26 नवंबर 1949।


भारतीय संविधान के कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद इस प्रकार हैं:-


संविधान के महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद:- 

भारतीय संविधान में मूल रूप से 395 अनुच्छेद हैं (अब 448 से अधिक), जो 25 भागों और 12 अनुसूचियों में विभाजित हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण अनुच्छेदों में समानता का अधिकार (14-18), स्वतंत्रता (19-22), संवैधानिक उपचार (32), राज्य के नीति निदेशक तत्व (36-51), मौलिक कर्तव्य (51A), तथा राष्ट्रपति, संसद और चुनाव आयोग से संबंधित अनुच्छेद शामिल हैं, जो भारतीय शासन और नागरिक अधिकारों का आधार हैं। 

भारतीय संविधान के कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद इस प्रकार हैं:

नागरिकता और राज्य (Articles 1-11)

अनुच्छेद 1: संघ का नाम और राज्य क्षेत्र।

अनुच्छेद 3: नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन। 

मौलिक अधिकार (भाग III: अनुच्छेद 12-35) 

अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता।

अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत (UnTouchability)।

अनुच्छेद 19: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (जीवन का अधिकार)।

अनुच्छेद 21A: 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार।

अनुच्छेद 32: संवैधानिक उपचारों का अधिकार (सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रिट जारी करना)। 

नीति निदेशक तत्व (भाग IV: अनुच्छेद 36-51) 

अनुच्छेद 44: नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code)।

अनुच्छेद 50: कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण।

अनुच्छेद 51: अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना। 

मौलिक कर्तव्य (भाग IV-A: 51A)

अनुच्छेद 51A: भारत के प्रत्येक नागरिक के 11 मौलिक कर्तव्य। 

Lloyd Law College

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संघ और राज्य कार्यपालिका (राष्ट्रपति, संसद, सुप्रीम कोर्ट) 

अनुच्छेद 52: भारत का राष्ट्रपति।

अनुच्छेद 61: राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया।

अनुच्छेद 72: राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति।

अनुच्छेद 74: मंत्रिपरिषद (राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए)।

अनुच्छेद 76: भारत के महान्यायवादी (Attorney General)।

अनुच्छेद 110: धन विधेयक की परिभाषा।

अनुच्छेद 112: वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट)।

अनुच्छेद 123: राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति।

अनुच्छेद 124: सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना।

अनुच्छेद 155: राज्यपाल की नियुक्ति। 

                अन्य महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद:- 

अनुच्छेद 243: पंचायती राज से संबंधित।

अनुच्छेद 280: वित्त आयोग का गठन।

अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग (Election Commission)।

अनुच्छेद 352: राष्ट्रीय आपातकाल।

अनुच्छेद 356: राज्यों में राष्ट्रपति शासन।

अनुच्छेद 360: वित्तीय आपातकाल।

अनुच्छेद 368: संविधान संशोधन की प्रक्रिया ।

ये अनुच्छेद भारत के शासन, कानून और नागरिकों के अधिकारों की रीढ़ हैं। 

                  Sc ST Obc आरक्षण:- 

भारत में SC/ST/OBC आरक्षण ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव को दूर करने और प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए एक संवैधानिक उपाय है। केंद्र में SC के लिए 15%, ST के लिए 7.5% और OBC के लिए 27% आरक्षण लागू है 1, 2, 4। 1950 में शुरुआत के बाद, 1991 में मंडल आयोग के बाद ओबीसी को जोड़ा गया, जो अब उच्च शिक्षा व सरकारी नौकरियों में समानता ला रहा है 3, 10।

आरक्षण का इतिहास (Historical Background)

प्रारंभिक चरण (पूर्व-स्वतंत्रता): 1902 में कोल्हापुर के छत्रपति शाहूजी महाराज ने पिछड़ी जातियों के लिए नौकरियों में आरक्षण शुरू किया था 7। 1933 में 'सामुदायिक पुरस्कार' के तहत दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल का विचार आया, जो बाद में 'पुणे समझौते' में बदला 10।

संवैधानिक शुरुआत: 1950 में संविधान लागू होने के साथ, मुख्य रूप से अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की व्यवस्था की गई 7, 10।

मंडल आयोग (1990-91): अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27% आरक्षण, 1980 की मंडल आयोग की रिपोर्ट के बाद 1990 में केंद्र सरकार द्वारा लागू किया गया, जिससे कुल आरक्षण का दायरा बढ़ा 3, 8। 

आरक्षण प्रतिशत और संरचना (Current Status)

केंद्र सरकार के तहत शैक्षणिक संस्थानों और नौकरियों में (कुल 49.5% + EWS):

अनुसूचित जाति (SC): 15% 1, 2

अनुसूचित जनजाति (ST): 7.5% 1, 2

अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 27% (क्रीमी लेयर को छोड़कर) 1, 8

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS): 10% (अतिरिक्त) 5 

प्रमुख संवैधानिक और कानूनी बिंदु

मंडल आयोग: ओबीसी को आरक्षण देने की सिफारिश की।

क्रीमी लेयर (Creamy Layer): 2008 में सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, ओबीसी में आर्थिक रूप से सक्षम (क्रीमी लेयर) लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा गया है 8।

संवैधानिक दर्जा: 2018 में 102वें संविधान संशोधन द्वारा 8 राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा दिया गया।

राज्यवार अंतर: राज्यों में आरक्षण का प्रतिशत अलग हो सकता है (जैसे मध्य प्रदेश में 14% ओबीसी, 20% ST, 16% SC) 5, 15। 

OBC Rights

यह आरक्षण सुनिश्चित करता है कि ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदायों को शिक्षा और रोजगार के अवसरों में उचित भागीदारी मिले, जिससे सामाजिक समता स्थापित हो सके 3, 12।

क्रिमीलेयर क्या है:-

क्रीमी लेयर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उन संपन्न और उन्नत परिवारों को कहते हैं जो वार्षिक आय (वर्तमान में 8 लाख रुपये से अधिक) या ऊंचे पद पर होने के कारण आरक्षण का लाभ नहीं पाते। यह "मलाईदार तबका" सामाजिक और शैक्षणिक रूप से आगे निकल चुका है, इसलिए इन्हें ओबीसी कोटा से बाहर रखा जाता है। 2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST आरक्षण में भी क्रीमी लेयर लागू करने का समर्थन किया है। 

                क्रीमी लेयर के मुख्य बिंदु:- 

आय सीमा: जिन OBC परिवारों की वार्षिक आय 8 लाख रुपये या अधिक है, वे क्रीमी लेयर में आते हैं।

अपवर्जन: क्रीमी लेयर वाले व्यक्तियों को सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण नहीं मिलता।

मापदंड: केवल आय ही नहीं, बल्कि माता-पिता का संवैधानिक पद, ग्रुप A/B अधिकारी होना, या डॉक्टर, इंजीनियर जैसे पेशों में होना भी क्रीमी लेयर का आधार है।

नॉन-क्रीमी लेयर: जिनकी सालाना आय 8 लाख रुपये से कम है, वे 'नॉन-क्रीमी लेयर' में आते हैं और आरक्षण के पात्र हैं। 

क्रीमी लेयर की अवधारणा 1992 के इंदिरा साहनी मामले के बाद पेश की गई थी ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में पिछड़े वर्गों तक ही पहुंचे। 

                  SC/ST Act:- 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले सामाजिक भेदभाव और हिंसा को रोकने के लिए एक विशेष कानून है। यह 30 जनवरी 1990 से लागू हुआ, जिसका उद्देश्य इस समुदाय को सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करना, मामले की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनाना और दोषियों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान करना है Testbook, Drishti IAS। 

SC/ST एक्ट का इतिहास और पृष्ठभूमि

संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत 'अस्पृश्यता' (Untouchability) को खत्म किया गया है। इसके पालन के लिए यह अधिनियम बनाया गया था Drishti IAS।

पूर्व कानून: इस एक्ट से पहले अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 और नागरिक अधिकार संरक्षण (PCR) अधिनियम, 1955 प्रभावी थे, लेकिन ये जाति-आधारित अत्याचारों को पूरी तरह रोकने में अपर्याप्त साबित हुए NEXT IAS।

अधिनियम का पारित होना: भेदभाव की निरंतरता को देखते हुए, संसद ने 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम पारित किया, जिसे 1990 में लागू किया गया, Drishti IAS।

संशोधन (2015/2018): कानून को और अधिक मजबूत बनाने के लिए 2015 में संशोधन किया गया और 2018 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद, संसद ने कानून में बदलाव कर एफआईआर (FIR) के तुरंत बाद गिरफ्तारी का प्रावधान बहाल रखा, जिसमें अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती है। 

हरिजन एक्ट' (SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989) के तहत कई धाराएँ लगती हैं, जिनमें मुख्य रूप से धारा 3 है, जो अत्याचारों को परिभाषित करती है और इनके लिए दंड का प्रावधान करती है, जैसे धारा 3(1)(x) जातिसूचक शब्दों के प्रयोग या अपमान के लिए, और धारा 3(2)(v) जैसे गंभीर अपराधों के लिए, जिसमें सज़ा छह महीने से लेकर आजीवन कारावास तक हो सकती है. 

मुख्य धाराएँ और उनके प्रावधान:

धारा 3 (Section 3): यह सबसे महत्वपूर्ण धारा है, जो विभिन्न प्रकार के अत्याचारों को सूचीबद्ध करती है, जैसे:

धारा 3(1)(x): किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य का सार्वजनिक रूप से अपमान करना या उसे डराने-धमकाने के इरादे से जातिसूचक शब्द (जैसे 'हरिजन') का प्रयोग करना. 

धारा 3(2)(v): अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्य के खिलाफ अपराध के इरादे से किसी अन्य व्यक्ति को जबरन श्रम, बेगार, या बंधुआ मजदूर बनाना. 

धारा 4 (Section 4): यह जानबूझकर किसी अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्य को लोक सेवक के रूप में सेवा करने से रोकना या उसे किसी भी अधिकार से वंचित करना, जैसे अपराधों के लिए सजा का प्रावधान करती है. 

धारा 14 (Section 14): इस अधिनियम के तहत मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों (Special Courts) के गठन का प्रावधान करती है, ताकि मामलों का शीघ्र निपटारा हो सके. 

संक्षेप में: 'हरिजन एक्ट' के तहत किसी व्यक्ति पर लगे आरोप के आधार पर धारा 3 के विभिन्न उप-खंड (जैसे 3(1)(x), 3(2)(v)) और अन्य प्रासंगिक धाराएँ लगाई जाती हैं, जिसमें अपराध की गंभीरता के अनुसार सज़ा का प्रावधान है। 

समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता पर डॉ अंबेडकर के विचार:- 

डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुसार, समाजवाद का अर्थ केवल आर्थिक समानता नहीं, बल्कि जाति और धर्म आधारित असमानता का अंत था, जिसे वे संविधान के माध्यम से 'राज्य समाजवाद' द्वारा स्थापित करना चाहते थे। वे धर्मनिरपेक्षता के समर्थक थे, लेकिन "धर्म" के बजाय 'धम्म' (मानवीय मूल्यों) को महत्व देते थे, ताकि राज्य की धर्म में दखल न हो और धार्मिक स्वतंत्रता बनी रहे। 

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समाजवाद पर डॉ. अंबेडकर के विचार:

राज्य समाजवाद (State Socialism): अंबेडकर उद्योगों के राष्ट्रीयकरण, बीमा पर राज्य का एकाधिकार और कृषि योग्य भूमि के पुनर्वितरण के समर्थक थे।

आर्थिक और सामाजिक समानता: उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक आर्थिक और सामाजिक समानता न हो।

संवैधानिक प्रावधान: वे चाहते थे कि समाजवादी ढांचे को संविधान में ही निहित किया जाए ताकि भविष्य में सरकारें इसे आसानी से बदल न सकें।

स्वतंत्र मजदूर पक्ष: 1936 में उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की, जो किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए समाजवादी कार्यक्रमों पर केंद्रित थी। 

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धर्मनिरपेक्षता पर डॉ. अंबेडकर के विचार:

राज्य और धर्म का अलगाव: वे राज्य की ओर से किसी धर्म को विशेष महत्व देने के खिलाफ थे और एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) राज्य का समर्थन करते थे, जो कानून और शासन में धर्म से मुक्त हो।

धम्म का समर्थन: वे 'धर्म' (परंपरा/कर्मकांड) के बजाय 'धम्म' (नैतिकता/मानवता) को महत्व देते थे। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया क्योंकि यह समानता और बंधुत्व पर आधारित था।

जातिवाद के खिलाफ: उनका धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण भारत को सांप्रदायिकता और जातिवाद से मुक्त कराना था।

समान स्वतंत्रता: वे मानते थे कि राज्य को सभी नागरिकों को अपनी धार्मिक आस्था चुनने और अभ्यास करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, जो संविधान की मूल भावना के अनुरूप है। 

समाजवाद/धर्मनिरपेक्षता पर संवैधानिक दृष्टिकोण:

यद्यपि अंबेडकर के मन में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष मूल्य थे, लेकिन उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द को शामिल करने का विरोध किया था, क्योंकि उनका मानना था कि इन आदर्शों को समय और जनभावना के अनुसार बदलने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।


श्रोत- 

भारतीय संविधान, दृष्टि आईएएस किताब, गूगल व अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज 

         - Er.Vishal Kumar Dhusiya