narabhakhi saya in Hindi Horror Stories by Sanjay Kamble books and stories PDF | नरभक्षि साया

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नरभक्षि साया


नरभक्षी साया


By sanjay Kamble



" उस लड़की को लगा, मैं बच गई.. और बड़ी तेजी से अपनी कार को सड़क पर दौड़ने लगे.. पर तभी एक तेज रफ्तार ट्रक ने उसकी गाड़ी को ठोकर मारी, उसकी कार कहीं फिट गहरी खाई में लुढ़कते हुए जाने लगी.. और एक पत्थर के पास जाकर रुक गई. जख्मी हालत में गाडी मे कैद उस लड़की को शैतान की वह बात याद आ गई...
 'नरभक्षी साये यहां से किसी को जिंदा जाने नहीं देते... और boom.... कहानी खत्म..." 

पिछली सिट पर बैठे सचिन ने बताई यह कहानी सुनकर उदय ने गाड़ी का स्टेरिंग संभालते हुए कहा.

 " यार, काफी डरावनी थी और वह शैतान जो उसके शरीर के भीतर घुसा था, उसकी वह आवाज काफी खौफनाक थी."


 "छोड़ो यार यह किस्से कहानीयां... अगर रियल में कुछ दिखाना चाहते हो तो बोलो." प्रियंका ने मजाकिया अंदाज में कहा


 " अरे यह जो कहानी मैंने बताई वह रियल थी..."
सचिन समझाने लगा

" कुछ भी मत फेंक.. यह बस एक कहानी थी.. एक काल्पनिक कहानी..."
निकिता की रूखी बात सुनते ही सचिन हमेशा की तरह आज भी अपनी मनगढंत कहानी को रियल बताने के लिये जी जान से कोशिश करने लगा.

 " नहीं यार, सच में ऐसा हुआ था... मैने एक मैगज़ीन में पढा था. उस इलाके के पुराने लोग कहते हैं कि वहाँ सिर्फ़ हवा नहीं चलती, बल्कि 'नरभक्षी साये' घूमते हैं। वे साये इंसान के मांस के साथ उसकी चीखों और हड्डियों के भूखे होते हैं। कहते हैं कि सालों पहले कुछ लोग उस गहरी खाई में भूखे मर गए थे, और अब उनकी अतृप्त आत्माएं किसी को भी वहाँ से जिंदा लौटने नहीं देतीं। वे पहले तुम्हें भ्रम (Hallucinations) में डालते हैं, अपनों की आवाज में पुकारते हैं, और जब तुम पूरी तरह टूट जाते हो... तब वे तुम्हारे शरीर का एक-एक हिस्सा अलग कर देते हैं। उन शैतानो ने किसी को भी उस इलाके से जाने नहीं दिया... सच में..."

 सचिन की बात सुनकर प्रियंका ने कहा.
 "ठीक है बाबा, तुम कहते हो तो यह कहानी सच थी.. और जहां यह पब्लिश हुई थी उस मैगजीन का नाम है 'टाइम मैगजीन' ओके...खुश..." 

 तभी चिप्स का पैकेट हाथ में लेते हुए निकिता ने कहा 
 "हां.. टाइम मैगजीन वालों ने फ्रंट पेज पर उस भूत की तस्वीर छपी थी.. वो भी स्वैग वाली...यो... यो."


"ठीक है. चलो अब कोई रियल भूतों के किस्से सुनाओ.."
उदय ने मजाकिया अंदाज मे कहा.

 "रियल में और भुत..? क्या ये सच में होते भी हैं.?" 
 प्रियंका पूछने लगी


 "यार तुम यह भूतों की कहानी किस्से बताना बंद करो... मैं इसीलिए ट्रिप पर नहीं आ रहा था, क्योंकि मुझे पता है तुम यह भूतों वाली कहानी बताना बंद नहीं करोगे और भूतों से मुझे सख्त नफरत है..."
 विनोद ने थोड़ा चिड़कर कहा 

 "अबे साले, नफरत है. या फटती है.. "
 गाड़ी के स्टेरिंग संभालते हुए फिर से उदय ने विनोद का मजाक उड़ाते हुए कहां 


 "फटती है, इसलिए नफरत है.. " सचिन की इस बात पर
सब ठहाका मार के हंसने लगे...


" लगता है हमारी मंझिल आ गई है..?"
उदय ने स्टेरिंग संभालते हुए गाड़ी की आधी खुली खिड़की से बाहर देखा.

 "हां लगता तो है," प्रियंका ने भी बाहर झांक कर देखा.

 "तो यही डेरा डाल लो.." निकिता ने भी हामी भरी 


 "यार काफी सुनसान इलाका है, मेरी मानो थोड़ा इंसानी बस्ती के नजदीक डेरा डालते हैं.. "
विनोद ने थोड़ी खौफ भरी नजरों से आस-पास देखा 


" यह जगह अच्छी है, गाड़ी साइड में रोक दो हम यही डेरा डालेंगे सचिन ने भी हां कहां और उदय ने गाड़ी उसे सुनसान इलाके में एक जगह रख दी.




 सभी दोस्त गाड़ी से उतरे और इलाके को आराम से देखने लगे रात का अंधेरा गहरा चुका था रात के करीब 11:30 बजे होंगे. आधे चांद की धीमी रोशनी से पूरा इलाका मध्य रोशनी से जगमगा रहा था.. खुला मैदान कुछ पेड़, सामने गहरी खाई और ऊंचे पहाड़. सभी दोस्तों ने अपना ताम जाम उठाया और एक खाली जगह पर अपना टेंट लगा दिया... उदय और विनोद ने आग जलाई. प्रियंका और निकिता खाने का सामान निकालने लगी पर सचिन आसपास के इलाके का मुआइना करने निकला.

 सारे दोस्त कॉलेज के टाइम से एक दूसरे के साथ थे.. कॉलेज खत्म होने के बाद सभी अपने अपने करियर में बीजी हो गए, इसके बावजूद दो या तीन महीने में एक बार कोई भी एक दोस्त ट्रिप प्लान करता और बाकी सभी दोस्त बगैर कोई एक्सक्यूज दिए खुशी से ट्रिप के लिए अपनी हाजरी लगते... आज भी सब ऐसे ही एक ट्रिप प्लान करके आए थे...

 उस इलाके में टहलते टहलते सचिन कुछ दूर झाड़ियों के पीछे पेशाब करने के लिए रूक गया... इलाका काफी सुनसान था... थोड़ी खाली जगह फिर पेड़ों के गुच्छे उसके बाद गहरी खाई और उनसे पहाड़... अपने आसपास नजर डालते हुए उसे कुछ दूरी पर एक इंसानी आकृति नजर आई जो पेडों के पास खडी थी.. उसने सोचा अपना ही कोई दोस्त है. शायद विनोद या उदय...

" विनोद... उदय.... क्या तुम हो वहां पर...?"


 उसने आवाज दी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.

  अपना काम निपटा कर वह उस इंसानी आकृति की तरफ चलने लगा... जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता वह इंसानी आकृति उससे दूर जाती महसूस हो रही थी...

 "कौन है वहां...?"

 सचिन ने आवाज दी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.. वह दोबारा उस आकृति की तरफ चलने लगा और आवाज़ लगाई..


 "कौन हो तुम... क्या तुम्हें कोई मदद चाहिए.."

 पर कोई जवाब नहीं आया उस आकृति को अपने से दूर जाता देख सचिन रुक गया और पीछे मुडा ही था झट से उसे किसी ने सामने से पकड़ लिया..

 सचिन के तो रोंगटे खड़े हो गए वह अंदर तक हिल गया था. लेकिन अगले ही पल वह सामान्य हो गया क्योंकि सामने उसका दोस्त विनोद और उदय थे जिन्होंने सचिन को डरा दिया था... 

" क्या बात है, इतना क्यों डर गए...? "
 विनोद ने आश्चर्य से पूछा.

 "हां यार तुम्हारे चेहरे पर तो डर साफ-साफ नजर आ रहा है हम तो बेकार में विनोद को फट्टू समझते हैं..."


" ऐसी बात नहीं यार, वहां पर कोई था, मैंने आवाज़ लगाई पर वह आगे ही चला जा रहा था काफी देर तक मैं उसे आवाज लगा रहा था पर वह रुका नहीं..."

 सचिन उन दोनों को समझाने लगा पर विनोद ने उससे कहा...

 "अरे क्या घंटा आवाज लगा रहा था, हमने तो तुम्हारी आवाज नहीं सुनी.. तो क्या साइलेंट मोड में आवाज लगा रहा था..."


 उस पर उदय ने कहा.
 "चलो, बहुत हो गया.. भूख लग रही है.. खाना गरम हुआ होगा..."

 तीनों वापस कैंप की जगह लौटे तब तक प्रियंका और निकिता ने खाना पेट में सजाना शुरू किया था...

 लेकिन प्लेट में चिकन के लेग पीस देखकर विनोद थोड़ा सा नाराज हो गया... 
 "यार मैंने तुम लोगों को पहले ही कहा था, अगर बाहर जाना है तो वेजिटेरियन ही खाना खाएंगे. तुम लोग नॉनवेज खा रहे हो, वह भी ऐसी जगह जिसके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं..."



 विनोद की बात सुनकर उदय ने कहा...
" यार तुम खामखा घबराते हो.. तुम्हें क्या लगता है, हमारे प्लेट में चिकन लेग पीस देखकर यहां आस-पास मंडरा रहे भुत भी खाने की दावत में आ जाएंगे..."


 उस पर निकिता ने विनोद के डर को और बढाते हुए कहा...
 "विनोद ठीक ही कह रहा है, तुम लोगों को पता नहीं है लेकिन इस जगह पर कई सारे हादसे हुए हैं.. काफी लोग यहां इस पहाड़ी की चोटी से नीचे गिरकर मारे जा चुके हैं.. कई लोगों ने खुदकुशी की है, तो कुछ की गाड़ियां यहां से नीचे जा चुकी है... और जब किसी की इस तरह एक्सीडेंट में या खुदकुशी से मौत हो जाती है तो उनकी आत्माएं इस इलाके में भटकती रहती है..."


 तभी उदय ने कहा.
 " तुम समझा रही हो या और घबरा रही हो... वैसे भी भूत-वूत कुछ नहीं होते, बस मन का वहम होता है..."

 प्रियंका ने उसकी ही बात काटते हुए कहां.

 "हां बिल्कुल... मैं भी नहीं मानती,भूत वूत जैसा कुछ भी होता हैं... बस इंसानी दिमाग की उपज है, एक तरह का पागलपन और कुछ नहीं.."

 पर सचिन बिल्कुल शांत था... वह अभी सोच रहा था कि थोड़ी देर पहले जिस इंसानी आकृति को उसने देखा था वह कौन था...

 प्रियंका ने सचिन की तरफ देखते हुए कहा,
"सचिन तुम्हारा इसके बारे में क्या ख्याल है..."

 पर सचिन अभी अपने ही ख्यालों में खोया हुआ था..

" सचिन......सचिन.....? "

 सचिन हड़बड़ा कर होश में आ गया.

 "हां... क्या.... क्या हुआ.. क्या कह रहे थे तुम लोग..."

 प्रियंका ने सचिन की तरफ देखते हुए माजाकीया अंदाज में कहा... 

 "हम तो भूतों के बारे में बात कर रहे थे. तू किस चुड़ैल के ख्यालों में खोया था..."

 और सब ठहाका मारकर हंसने लगे...

इसपर विनोद ने कहा..
 "जाने दो, मैं तो नॉनवेज नहीं खाने वाला.. मुझे अगर कुछ वेज है तो दे दो."

और सब खाने का लुत्फ उठाने लगे...
 उदय ने कहा.
"यह लो मुर्गी की टांग की बची हुई हड्डी यहां पर मंडरा रहे किसी भूत को..."

 और उसने वह हड्डी अपने पीछे अंधेरे में फेंक दी.. तभी निकिता ने भी हड्डी का एक टुकड़ा हंसते हुए अपनी तरफ से भूतों के लिए अंधेरे में फेंका... ऐसा करते-करते हर एक दोस्त ने अपनी तरफ से खाने के बाद बची कुची हड्डियां अंधेरे में फेंकना शुरू किया... पर विनोद उनकी इस हरकत से थोड़ा नाराज था...

      खाना खाने के बाद काफी देर तक वह बात करते बैठे रहे...फिर सब लोग अपने अपने टेंट में जा चुके थे.

 निकिता और प्रियंका दोनों एक टेंट में सोई थी तो सचिन विनोद और उदय पास ही दूसरे टेंट में... 

 निकिता और प्रियंका कंबल ओढ़ लेटे लेटे ही एक दूसरे के साथ बातें करने में मशगुल थी... रात के करीब ढाई बजने वाले थे... प्रियंका ने निकिता से कहा

 "यार मैं अभी जॉब छोड़ रही हूं... कुछ अच्छा नहीं लग रहा... सोच रही हूं पापा से बात करके खुद का रेस्टोरेंट शुरू करू.."


  निकिता ने कहा...
 "मैं भी तुझे यही बोलने वाली थी. इतना बढ़िया और टेस्टी खाना बनाती हो, क्यों दूसरों के होटल में जॉब कर रही हो.. अगर खुद का रेस्टोरेंट खोलोगी तो बहुत पैसे कमा सकती हो.."

 तभी प्रियंका के कानों पर कुछ आवाज आने लगी.. उसने निकिता को चुप रहकर आवाज सुनने के लिए कहा.. दोनों आवाज सुनने लगी. आवाज तो आ रही थी लग रहा था जैसे कोई चिकन की हड्डियां दांतों से तोड़कर चबाकर खा रहा था...
 निकिता ने कहा...
 "देखा... तुम्हारे हाथों की टेस्ट कितनी अच्छी है. वे तीनों भूखे अभी भी बाहर बचा हुआ खाना खत्म कर रहे हैं..."

 उस पर प्रियंका ने कहा..
"चलो, बाहर जाकर उनकी खींचते हैं..."

 दोनों अपने टेंट से बाहर आई और देखा तो बाहर कोई नहीं था...

 निकिता ने कहा..
" अच्छा जी, तो टेंट के भीतर सारा तामझाम समेट कर पार्टी चल रही है..."

 प्रियंका दबे कदमों से लड़कों के टेंट की तरफ चलने लगी... उसने धीरे से टेंट का पर्दा सरकाया और भीतर झांक कर देखा...

और...
 एक गहरे सदमे से वह पीछे की तरफ गिर पड़ी.... वह इतनी घबरा गई थी के वैसे ही जमीन पर घसीटते घसीटते उठने की कोशिश करने लगी.. निकिता भी उसकी हालत देखकर सहम गई. वह समझ नहीं पा रही थी कि प्रियंका को हुआ क्या है... प्रियंका डरी सहमी आंखों से निकिता की तरफ ही देख रही थी मानो उसे बोल रही हो के
 यहां से भागो, जितना जल्दी हो सके उतना, और जितना दूर हो सके उतना..

 पर वह हड्डियां चबाने की आवाज अब भी आ रही थी, पर वो आवाज अब जैसे कानों में दर्द कर रही थी वह घिनौनी आवाज सुनकर निकिता ने टेंट के पास जाकर देखना चाहा... पर बगैर कुछ बोले प्रियंका ने हाथों के इशारों से ही उसे रोकना चाहा, बावजूद इसके निकिता ने धीरे से पर्दा सरकाया और भीतर देखा....
 तो.. 
तीनों दोस्तों की खून से सनी हुई लाशे टेंट के भीतर पड़ी थी... उनके भीतर के अंग पूरे टेंट में फैले हुए थे.. और एक काला डरावना इन्सानी साया वहीं पर बैठा उनकी हड्डियां चबाकर खा रहा था... हाथ में पकड़ी एक हड्डी चबाते हुए वह शैतानी साया बोला...
" हमें किसी का झूठा खाना पसंद नहीं.. "

 अंदर का खौफनाक नजारा देख निकिता का तो खून ही सूख गया.. वह कुछ बोलती तभी उस डरावनी आकृति की लाल आंखें निकिता पर टिक गई. और.. प्रियंका जमीन पर पड़ी निकिता की तरफ देख रही थी जिसका आधा शरीर टेंट के भीतर था तो आधा टेंट के बाहर था... और एक झटके से निकिता का शरीर टेंट के भीतर खिंच लिया गया... प्रियंका घबरा गई जैसे तैसे खड़ी होकर गाड़ी की तरफ दौड़ने लगी... तभी उसे लगा के जैसे कोई बड़ी तेजी से उसकी तरफ दौड़ता हुआ आ रहा है... प्रियंका पूरी जान लगाकर दौड़ने लगी कुछ ही कम पर उनकी गाड़ी खड़ी थी.. अब वह चीज कुछ ही पल में प्रियंका के ऊपर झपटने वाली थी के तभी उसने गाडी का दरवाजा खोला और भीतर चली गई... दरवाजा बंद करते हुए उसने खिड़की की तरफ देखा पर वहां कुछ नहीं था.. 
बिल्कुल शांत, सुनसान, भयानक अकेलापन... उसकी सांसे तेज हो गई थी... अपने दोस्तों की वह हालत देख प्रियंका फूट-फूट कर रोने लगी... 
कुछ पल वो वैसे ही रोती रही और फिर एक नजर अपने टेंट की तरफ देखा... 
वो आवाज गाडी तक आ रही थी... 
आवाज,..
कोई सख्त चिज टूटने की...
 फुटने की...
चबाने की...

 सामने टेंट के भीतर उसके चारों दोस्तों की लाशे थी और वहा एक शैतान उनकी हड्डियां तक चबाकर खा रहा था.. और यह सबसे खौफनाक था.

 वह बुरी तरह से घबराई थी..
 उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें..
 उसने अपनी जिन्स के पॉकेट टटोले पर खाली थे, मोबाइल टेंट के भीतर रह गया था और गाड़ी की चाबी उदय के पास थी और उदय अब इस दुनिया में नहीं था...

 वह अपना सिर पकड़ कर रोने लगी... वह टेंट के पास तो नहीं जा सकती थी...

रात के करीब 3:30 बज चुके थे अब सूरज निकलने तक उसे यही इंतजार करना था.. क्योंकि मोबाइल और गाड़ी की चाबी टेंट के भीतर थी, और टेंट के पास जाना मतलब मौत के मुंह में जाने के बराबर था... उसने खुद को शांत किया और सामने उस टेंट की तरफ देखने लगी... चांद की माध्यम रोशनी में कुछ दूरी पर बनाया उनका टेंट साफ-साफ नजर आ रहा था पर उसमें कुछ हलचल हो रही थी... उसने गौर से देखा.. 
लग रहा था कोई बाहर आने की कोशिश कर रहा है... प्रियंका ने अपनी सांसे थाम ली.. 
बिना पलक झपकाए वह सामने टेंट की तरफ देखने लगी... टेंट से कोई बाहर निकाला, एक काली परछाई, इन्सानी... छह साडेछह फिट लंबी परछाई जैसे हवा में तैरते काले धुएँ की तरह... अंधेरा काफी होने की वजह से साफ नजर तो नहीं आ रहा था, डर के मारे उसके मुंह से चिख निकलने वाली थी पर उस ने अपने एक हाथ से मुंह दबा लिया ताकि उसकी चिख ना निकले और सहमी सी आंखों से सामने उस टेंट की तरफ देखने लगी... वह काली परछाई अब दूसरे टेंट की तरफ जाने लगी.. मतलब प्रियंका और निकिता के टेंट की तरफ... 
और तभी एक अजीब बात उसने नोटिस की... उनके टेंट के भीतर से 2, 3 और वैसी ही काली परछाइयां बाहर निकली... प्रियंका के रोंगटे खड़े हो गए मतलब अगर प्रियंका कुछ देर और अपने टेंट में रहती तो इस वक्त उसकी हड्डियां तक वह शैतानी शक्तियां चबा डालती... कुछ देर टेंट के करीब मंडराने के बाद वे कई धुएं जैसी परछाइयां अंधेरे में गायब हो गई... 
खुद को जिंदा देख प्रियंका फूट फूट कर रोने लगी... जो कुछ भी हुआ था, या हो रहा था वह उसकी कल्पना से परे था. अपना सिर पीछे सीट पर टिकाए वह आंखें बंद करके वैसे ही बैठी रही... जो भी उसने देखा था उससे वो अब भी सदमे में थी.. रात के उस खौफनाक जानलेवा सन्नाटे के बीच जंगल में गूंजने वाली रात के कीड़ों की आवाज़ लगातार उसके कानों पर पड रही थी.. तभी कुछ अलग आवाजे उस रात के गहरे सन्नाटे के बीच गूंजती हुई महसूस हुई...
 उसने आंखें खोली सिर भारी हो गया था, आंखों पर नींद का बोज था.. उसने बोझिल आंखों से गाडी की खिड़की से बाहर झांककर देखा तो टेंट के पास कोई खडा था... उसने ठीक से देखा और हैरान हो गई क्योंकि टेंट के पास निकिता खड़ी थी और वो उसी को आवाज लग रही थी...
 उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है...
 उसने दोबारा गौर से देखा तो सच में निकिता उसे आवाज लग रही थी.. आवाज लगाते हुए निकिता दूसरे टेंट के भीतर गई और कुछ ही पल में तीनों लडके टेंट से बाहर निकले साथ में निकिता भी थी... सब हैरान परेशान से लग रहे थे... प्रियंका को आवाज लगाते हुए अंधेरे में चलने लगे...

 प्रियंका को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था..
' यह सब हो क्या रहा है, क्या यह सपना है..?, या कुछ देर पहले मैंने अपने दोस्तों की लाशे देखी थी वह सपना था..?'

 कुछ ही देर में सारे दोस्त उसकी नजरों से ओझल हो गए पर उनकी आवाज़ लगातार आ रही थी जो अब भी प्रियंका को आवाज लगा रहे थे...

 वह गाड़ी की बंद कांच से बाहर की तरफ ही झांक रही थी. तभी एकदम से खिड़की पर निकिता दोनों हाथों से थपथपाते हुए प्रियंका को पुकारने लगी... एकदम से हुई इस हरकत से प्रियंका का दिल जोर से धड़क उठा...
 निकिता गाडी के बाहर थी और प्रियंका को बाहर आने के लिए बोल रही थी... वह जोर-जोर से अपने हाथ गाडी की कांच पर पटक रही थी... पर निकिता का चेहरा काफी भयानक लग रहा था... वह गुस्से से प्रियंका की तरफ देखते हुए बोली...

"हम यहां से किसी को नहीं लौटने देते... तुम भी जिंदा नहीं लोटोगी"
 और निकिता जोर-जोर से अजीब सी आवाज में हंसने लगी... इस घटना से घबराई प्रियंका अपना सिर घुटनों में छुपाए फूट-फूट कर रोने लगी... अपना शरीर समेटकर वह गाड़ी की सीट पर वैसे ही लेटी रही... दोबारा सब कुछ शांत हो गया... पर आंखें खोलकर गाड़ी की खिड़की की तरफ देखने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी... काफी देर तक वो वैसे ही पड़ी रही... कितना वक्त गुजर गया उसे खुद नहीं पता था...


" hello.... Madam.. "
 उसने आंखें खोल कर देखा तो सुबह हो चुकी थी.. गाडी की कांच पर दो पुलिस वाले थपथपा कर उसे जगाने की कोशिश कर रहे थे... उसे अभी यह छलावा लग रहा था... अपने जिंदा बच निकलने पर उसे अभी यकीन नहीं था... वह सीट के ऊपर उठकर बैठ गई और गाडी का दरवाजा खोला बाहर कुछ लोग नजर आ रहे थे जो उनके उस टेंट के इर्द गिर्द खड़े थे...

 उसमें से एक पुलिस वाले ने कहा...

" तुम गाड़ी के अंदर सो रही थी... तुम्हें पता है तुम्हारे दोस्तों के साथ क्या हुआ है...? "

 प्रियंका फूट-फूट कर रोने लगी... 

 तभी दूसरे पुलिस वाले ने कहा.

"किस्मत वाली हो जो कार के अंदर सो गई... रात के वक्त कुछ जंगली जानवर तुम्हारे दोस्तों को खत्म करके उनकी हड्डियां तक चबा गए हैं... उनकी आधी खाई लाशों के बस कुछ ही अंग बच गए है. "

 प्रियंका को एक एंबुलेंस में बिठाया गया और दूसरी एंबुलेंस में उसके दोस्तों की लाशे रखी गई...प्रियंका एंबुलेंस में बैठी खिडकी से बाहर अपने टेंट की तरफ देख रही थी... पुलिस वाले छानबीन करने मे जुटे थे तो एंबुलेन्स के ड्राइवर भी वहा पर खडे इलाके को देख रहे थे... 

"Finally मै बच गई..."

उसकी खुशी का ठिकाना नही रहा. 
 तभी एक तेज धमाके जैसी आवाज आई. उसका दिल जोर से धड़क उठा... उसने आवाज की तरफ देखा तो सामने सड़क पर से एक ट्रक सडक किनारे बनी रेलिंग तोडकर बडी तेजी से आ रहा था. कोई कुछ समझ पाता इससे पहले उस तेज रफ्तार ट्रक ने एंबुलेंस को एक जबरदस्त ठोकर मार दी... एम्बुलेंस लुढ़कते हुए सड़क से नीचे खाई में उतरी और तेज ढलान से नीचे जाने लगी.. वहां पर मौजूद सारे लोग एंबुलेंस को इस तरह खाई में गिरते बेबसी से देख रहे थे.. आखीर एक पत्थर के पास जाकर वो रुक गई... एंबुलेंस पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी... और भीतर जख्मी हालत में पडी प्रियंका को वह बात याद आ गई...

"नरभक्षी साये, यहां से किसी को जिंदा लौटने नहीं देते... "


समाप्त....