Pure love or curse? - 7 in Hindi Love Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 7

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पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 7

दिन बीतते गए…लेकिन हर दिन के साथ सिद्धिका कमजोर होती जा रही थी।
अब वो पहले जैसी नहीं रही…जिसमें कभी अंधकार की ताकत थी। अब वही शरीर थक चुका था। उसे चलने में भी तकलीफ होने लगी थी…कभी-कभी तो वो दो कदम चलकर ही रुक जाती।

उसका वो खूबसूरत चेहरा…जो कभी रहस्यमयी चमक से भरा रहता था अब धीरे-धीरे मुरझाने लगा था। आँखों की लाल चमक गायब थी…चेहरे की चमक फीकी पड़ गई थी…जैसे उसकी पहचान ही खो रही हो।

उसकी शक्तियाँ…जो कभी उसे सबसे अलग बनाती थीं अब धीरे-धीरे खत्म हो रही थीं। ना वो किसी को महसूस कर पा रही थी…ना ही अंधकार की वो ताकत अब उसके पास थी।
कृष्णा ये सब देख रहा था…हर दिन…हर पल…और अंदर ही अंदर टूट रहा था।

उसने खुद से कहा -
ये सब मेरी वजह से हो रहा है…,

सिद्धिका अब ज्यादा बोलती भी नहीं थी…वो बस चुपचाप बैठी रहती…या खिड़की के बाहर देखती रहती।जैसे उसे पता हो—
वो धीरे-धीरे खत्म हो रही है।

एक दिन…वो चलते-चलते लड़खड़ा गई।गिरने ही वाली थी कि—
कृष्णा ने तुरंत उसे पकड़ लिया।सिद्धिका ने उसकी तरफ देखा…
आँखों में थकान थी…

वो बोली - 
मैं… अब ज्यादा दिन नहीं रहूँगी शायद…

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।


कृष्णा बोला - 
चुप!

कृष्णा ने पहली बार ऊँची आवाज़ में कहा -
ऐसा कुछ नहीं होगा…
मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा…।

सिद्धिका हल्का सा मुस्कुराई…वो जानती थी उसकी हालत अब कृष्णा से छुपी नहीं है। अब वक्त आ गया था या तो कृष्णा उसे बचाने का रास्ता ढूंढेगा या फिर सिद्धिका उसकी आँखों के सामने खो जाएगी…।

 कहानी अब अपने सबसे भावुक मोड़ पर है—
 एक वैंपायर अपनी ताकत खो रही है…
और एक इंसान उसे हर हाल में बचाना चाहता है…

आधी रात का सन्नाटा…कमरे में सिर्फ हल्की साँसों की आवाज़ थी।
कृष्णा और सिद्धिका दोनों सो रहे थे…तभी सिद्धिका के सीने में तेज़ दर्द उठा।

वो कराह उठी -
आह…

उसका शरीर तड़पने लगा…कृष्णा तुरंत उठ बैठा।

वो बोला - 
सिद्धिका!

उसने उसे संभाल लिया…उसका सिर अपनी गोद में रखा…
लेकिन इस बार दर्द पहले से कहीं ज्यादा था।सिद्धिका की साँसें टूट रही थीं…उसके हाथ ठंडे पड़ चुके थे…उसका शरीर काँप रहा था…जैसे उसकी सारी ताकत एक-एक करके खत्म हो रही हो।कृष्णा बार-बार उसे थामे हुए था—

वो बोला - 
कुछ नहीं होगा… मैं हूँ यहाँ…

लेकिन उसकी आवाज़ में डर साफ था। सिद्धिका ने मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं…उसने कृष्णा की तरफ देखा…उसकी आँखों में अब अंधकार नहीं था सिर्फ दर्द… और एक अजीब सी शांति।

वो धीरे से बोली—
मुझे नहीं लगता…मैं ज्यादा दिन… जिंदा रह पाऊँगी…।

कृष्णा लगभग चिल्ला पड़ा -
नहीं! ऐसा मत बोलो…
मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा…।

सिद्धिका हल्का सा मुस्कुराई और बोली - 
तुम हर चीज़ नहीं रोक सकते कृष्णा…
ये… मेरे अंदर का अंधकार है…

उसकी साँसें और कमजोर हो रही थीं…और कृष्णा समझ चुका था अब वक्त आ गया है…या तो वो कुछ बड़ा करेगा…या वो उसे खो देगा…।

🔥 उस रात—
🩸 एक वैंपायर जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी…
❤️ और एक इंसान उसे हर हाल में बचाने की कसम खा चुका था…

कमरे में अब भी वही भारी सन्नाटा था…सिद्धिका दर्द से तड़पते-तड़पते थक चुकी थी।कृष्णा ने उसे अपने सीने से कसकर लगा लिया…धीरे-धीरे उसके बाल सहलाने लगा…

वो बोला - 
शांत हो जाओ… मैं हूँ…

उसकी आवाज़ काँप रही थी… लेकिन वो खुद को मजबूत दिखा रहा था। काफी देर तक वो उसे ऐसे ही थामे रहा…जब तक सिद्धिका की साँसें थोड़ी सामान्य नहीं हो गईं।
आखिरकार…दर्द से लड़ते-लड़ते सिद्धिका उसकी बाँहों में ही सो गई। उसका चेहरा शांत था…लेकिन कमजोरी साफ दिख रही थी।
कृष्णा की पकड़ और कस गई…जैसे वो उसे छोड़ना ही नहीं चाहता हो।उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं…और आँखों में आँसू भर आए। वो ऊपर देखने लगा…आँखों से आँसू बह निकले…।

और उसने धीमे लेकिन टूटती आवाज़ में कहा—
हे भगवान…मेरे पास इस दुनिया में आप और सिद्धिका के अलावा कोई नहीं है…।
Please… इसे मुझसे दूर मत करना…।

उसकी आवाज़ भर्रा गई—
मैं… इसके बिना जी नहीं पाऊँगा…मैं तो जीते जी मर जाऊँगा…।

उसकी बाँहों में सोई सिद्धिका को कुछ पता नहीं था…लेकिन उसकी उंगलियाँ हल्के से कृष्णा की शर्ट पकड़ चुकी थीं…जैसे वो भी उसे छोड़ना नहीं चाहती।
वहाँ कोई और नहीं था…
 सिर्फ एक इंसान…उसकी प्रार्थना… और उसकी बाहों में सिमटी उसकी दुनिया…

तभी खिड़की से हल्की हवा आई…और कमरे में रखी भगवान की मूर्ति के पास दीपक की लौ अचानक तेज़ जल उठी…जैसे किसी ने उसकी प्रार्थना सुन ली हो…।

🔥 अब कहानी अपने सबसे भावुक मोड़ पर है—
🩸 एक वैंपायर जिंदगी से लड़ रही है…
❤️ और एक इंसान उसे भगवान से मांग रहा है…

सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल चुकी थी…सिद्धिका की आँखें धीरे-धीरे खुलीं।
उसने सुना मंदिर की घंटी…तेज़… साफ… लगातार…वो एक पल के लिए रुक गई…

वो बोली - 
मुझे… तकलीफ क्यों नहीं हो रही…?

क्योंकि पहले ऐसी पवित्र आवाज़ें उसे बेचैन कर देती थीं…वो धीरे-धीरे उठी…कमजोर कदमों से चलते हुए हॉल में पहुँची।
वहाँ कृष्णा राम जी की पूजा कर रहा था।दीपक जल रहा था…
अगरबत्ती की खुशबू फैल रही थी…और उसके चेहरे पर वही शांति थी। सिद्धिका दरवाज़े पर खड़ी होकर उसे देखने लगी…अजीब बात ये थी उसे इस पवित्र माहौल से कोई डर… कोई जलन… कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था। बल्कि…थोड़ा सा सुकून मिल रहा था।
कृष्णा ने जैसे ही उसे देखा…वो हल्का सा मुस्कुराया।

कृष्णा बोला - 
आ गई तुम…

उसने पूजा खत्म की…और हाथ में प्रसाद लेकर उसकी तरफ बढ़ा।
सिद्धिका तुरंत एक कदम पीछे हट गई।

उसकी आँखों में डर आ गया वो बोली—
नहीं… ये मैं नहीं खा सकती…मैं… वैंपायर हूँ…
अगर मैंने इसे खा लिया तो… शायद मुझे जलन होगी…।

कृष्णा उसके पास आया…

धीरे से बोला—
तुम पहले जैसी नहीं रही…तुम बदल रही हो…

उसने उसका हाथ पकड़ा…

वो बोला - 
डरो मत…ये तुम्हें नुकसान नहीं देगा…

सिद्धिका कुछ पल उसे देखती रही…फिर धीरे से प्रसाद ले लिया।
उसका हाथ हल्का काँप रहा था…उसने आँखें बंद कीं…और प्रसाद खा लिया।कुछ सेकंड…पूरा सन्नाटा…लेकिन… कुछ नहीं हुआ।
ना जलन…ना दर्द…ना अंधकार की कोई प्रतिक्रिया…। सिद्दिका हैरान उसकी आँखें धीरे-धीरे खुलीं…वो खुद को महसूस करने लगी…

वो बोली - 
ये… कैसे possible है…?

कृष्णा मुस्कुराया और बोला - 
क्योंकि तुम सिर्फ अंधकार नहीं हो…तुम्हारे अंदर भी रोशनी है…।

उस पल सिद्धिका समझ गई वो अब वही नहीं रही जो पहले थी…
कुछ बदल रहा था…बहुत गहराई में…

🔥 अब कहानी ने नया मोड़ ले लिया है—
🩸 एक वैंपायर अब पवित्र चीज़ों से नहीं जल रही…
❤️ और उसका अंधकार धीरे-धीरे खत्म हो रहा है…

👉 क्या ये बदलाव उसकी जिंदगी बचाएगा?
या ये तूफान से पहले की शांति है…?