Pavitra Prem ya Abhishaap ? in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 6

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पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 6

रात अब भी गहरी थी…कमरे में हल्की सी रोशनी थी, और बाहर हवा अब शांत हो चुकी थी। सिद्धिका धीरे-धीरे आगे बढ़ी…और बिना कुछ बोले…उसने अपना सिर कृष्णा के सीने पर रख दिया।
कुछ पल के लिए सब रुक गया…।
फिर सिद्धिका को सुनाई दी  कृष्णा के दिल की धड़कन…थक-थक… थक-थक…इतनी सच्ची… इतनी जीवित…ये पहली बार था जब उसने किसी इंसान की धड़कन महसूस की थी।

कृष्णा की गर्म साँसें उसके माथे से टकरा रही थीं…और सिद्धिका की अपनी साँसें ठंडी… बहुत ठंडी…जैसे वो किसी और दुनिया से आई हो…सिद्धिका की आँखें बंद हो गई।  उसके अंदर एक अजीब सा सन्नाटा फैल गया। ना प्यास थी…ना आवाज़ें…बस एक शांति… जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी।

उस पल में साफ फर्क था—
🩸 एक तरफ ठंडी, अंधेरी वैंपायर की दुनिया…
❤️ दूसरी तरफ गर्म, जीवित इंसान की दुनिया…

और सिद्धिका… दोनों के बीच फँसी हुई थी।

कृष्णा ने धीरे से उसकी तरफ देखा…उसने कुछ नहीं कहा…बस अपना हाथ उठाकर हल्के से उसके बालों को सहला दिया।सिद्धिका की आँखों में हल्की नमी आ गई…

उसने धीमे से सोचा—
ये एहसास क्या है…?
ये प्यास क्यों शांत है…?

उस रात पहली बार—
👉 सिद्धिका ने खून नहीं… इंसान की धड़कन को महसूस किया।
और वो डर गई…क्योंकि ये एहसास उसे कमजोर नहीं…इंसान बना रहा था।

🔥 अब कहानी और गहरी हो चुकी है—
🩸 एक वैंपायर पहली बार इंसानियत महसूस कर रही है…
❤️ और एक इंसान उसे बिना डर के अपनाए हुए है…

रात कब बीत गई…दोनों को पता ही नहीं चला।खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैलने लगी। सिद्धिका अब भी बिस्तर पर बैठी थी…उसके लिए ये सुबह अलग थी। सदियों जैसी लंबी रातों के बाद पहली बार उसे सुबह बुरी नहीं लगी। क्योंकि इस बार वो अकेली नहीं थी।
कृष्णा अभी भी सो रहा था…चेहरे पर वही शांति…सिद्धिका उसे चुपचाप देखती रही।

उसने सोचा—
ये इंसान इतना निडर कैसे है…
जिससे दुनिया डरती है…उसके साथ ये चैन से सो रहा है…।

अनजाने में सिद्धिका के होंठों पर मुस्कान आ गई।उसने धीरे से हाथ बढ़ाया…और कृष्णा के माथे पर आई एक लट हटा दी।
जैसे ही उसने उसे छुआ उसकी ठंडी उंगलियों को फिर वही गर्माहट महसूस हुई।
लेकिन उसी पल उसका चेहरा बदल गया।उसने जल्दी से हाथ पीछे खींच लिया।

वो बोली - 
मैं क्या कर रही हूँ…मैं… लगाव महसूस कर रही हूँ?

तभी उसके सीने में फिर हल्का दर्द उठा। वही एहसास जैसे अंदर कोई चीज़ नाराज़ हो। जैसे अंधकार अभी भी जिंदा हो…कृष्णा ने आँखें खोलीं…और सीधे उसे देखते हुए मुस्कुराया।

वो बोला - 
Good morning…

सिद्धिका घबरा गई…उसने चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। कृष्णा उठकर बैठ गया।

वो बोला - 
आज पहली बार तुम्हें सुबह देखकर अच्छा लगा…

सिद्धिका बोली—
मैं कोई प्यारी सी पत्नी नहीं हूँ…

कृष्णा हल्का हँसा और बोला—
मुझे पता है…तुम उससे कहीं ज्यादा खतरनाक हो…।

सिद्धिका पहली बार चुप हो गई…और उसके गालों पर हल्की लाली उतर आई। उसे खुद समझ नहीं आया  ये गुस्सा था… या शर्म।
सुबह शांत थी…लेकिन दोनों के दिलों में कुछ नया शुरू हो चुका था।
🩸 एक वैंपायर लगाव से डर रही थी…
❤️ और एक इंसान उसे अपनाने लगा था…

सुबह पूरी तरह जाग चुकी थी…घर में अगरबत्ती की हल्की खुशबू फैली थी। मंदिर के कोने में दीपक अब भी जल रहा था। सिद्धिका किचन में खड़ी थी…वो धीरे-धीरे चाय बना रही थी। उसके लंबे बाल कंधों पर बिखरे थे…चेहरे पर वही मासूमियत… और आँखों में अनकही उलझन।
उसे खुद हैरानी थी  जो कभी खून की प्यास जानती थी…आज वो किसी के लिए चाय बना रही थी।

तभी पीछे से किसी ने उसे धीरे से बाहों में भर लिया। सिद्धिका एक पल को ठिठक गई…फिर उसे पहचानने में देर नहीं लगी। वो कृष्णा था। अभी-अभी पूजा करके आया था…उसके कपड़ों में चंदन और अगरबत्ती की खुशबू थी।

सिद्धिका ने धीमे स्वर में पूछा—
तुम… मुझसे डरते क्यों नहीं हो?

वो कुछ पल रुकी…

फिर बोली—
जिससे सारी दुनिया डरती है…तुम उसके साथ सोते हो…
उससे प्यार करते हो…क्यों…?

कृष्णा ने अपना चेहरा उसकी गर्दन में छिपा लिया…जैसे उसे वहीं सुकून मिलता हो।

फिर धीमी आवाज़ में बोला—
क्योंकि…तुमको भी उसी भगवान ने बनाया है…जिसने मुझे बनाया। तो मैं क्यों डरूँ?

ये सुनते ही सिद्धिका की साँसें रुक सी गईं। किसी ने पहली बार उसे राक्षस नहीं… भगवान की बनाई हुई चीज़ कहा था।उसकी आँखें भर आईं…कृष्णा ने उसे और करीब कर लिया।

वो बोला - 
तुम्हारे अंदर अंधेरा हो सकता है…लेकिन तुम्हें बनाने वाला उजाला है।

उसके हाथ से चम्मच गिर गई…आँखों से आँसू बह निकले।

वो धीमे से बोली—
अगर मैं सच में इतनी बुरी हुई तो…?

कृष्णा ने उसके कान के पास कहा—
तो मैं तुम्हें याद दिलाऊँगा…कि तुम बुरी नहीं हो।

चाय की भाप उठ रही थी…लेकिन उस रसोई में कुछ और गर्म हो चुका था—
🩸 एक वैंपायर का जमी हुआ दिल…
❤️ और एक इंसान का अटूट भरोसा।

रसोई में कुछ पल पहले जो भावनाएँ उमड़ी थीं…उनकी गर्माहट अब भी हवा में थी। सिद्धिका की आँखें नम थीं…लेकिन वो अपने आँसू कृष्णा को दिखाना नहीं चाहती थी।उसने धीरे से कृष्णा की बाँहों से खुद को आज़ाद किया। ना गुस्से से…ना झटके से…बस हल्के से…जैसे अगर एक पल और रुकी…तो खुद पर काबू नहीं रख पाएगी।

कृष्णा पीछे खड़ा उसे देखता रहा…उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।वो समझ गया था—
सिद्धिका दूर नहीं जा रही…बस अपने एहसास छुपा रही है।सिद्धिका जल्दी से अलमारी की तरफ बढ़ी…

और बोली—
चाय में चीनी डालनी है…

उसकी आवाज़ सामान्य दिखाने की कोशिश कर रही थी…लेकिन हाथ हल्के काँप रहे थे।कृष्णा धीरे-धीरे उसके पीछे आया…

और मुस्कुराकर बोला—
चीनी चाय में डालोगी…या खुद इतनी मीठी बन चुकी हो?

सिद्धिका तुरंत पलटी…उसकी आँखें बड़ी हो गईं।

वो बोली - 
कृष्णा!

वो नाराज़ दिखने की कोशिश कर रही थी…लेकिन उसके गालों पर हल्की लाली उतर आई। जो लड़की कभी लोगों को डराती थी…
आज एक इंसान की बातों से घबरा रही थी।उसे खुद पर गुस्सा भी आ रहा था…और अजीब सा सुकून भी। उसने जल्दी से चीनी उठाई…चाय में डाली…

और बिना उसकी तरफ देखे बोली—
जाकर बैठो… मैं लेकर आती हूँ।

कृष्णा वहीं खड़ा रहा…

धीरे से बोला—
मैं यहीं ठीक हूँ…जहाँ तुम हो।

सिद्धिका कुछ नहीं बोली…लेकिन उसकी उंगलियाँ कप पकड़ते हुए और काँप गईं।

🔥 उस सुबह—
☕ चाय बन रही थी…
❤️ और दो दिल धीरे-धीरे एक-दूसरे के स्वाद के आदी हो रहे थे…

क्या सिद्धिका अपने दिल की बात मानेगी?
या फिर हमेशा दूरी बनाकर रखेगी…?