Pavitra Prem ya Abhishaap ? - 4 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 4

Featured Books
Categories
Share

पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 4

अगली सुबह…ऑफिस का माहौल सामान्य था…लोग अपने काम में लगे हुए थे…लेकिन हवा में एक अजीब भारीपन था। तभी मुख्य दरवाज़ा खुला…और अंदर आई सिद्धिका। आज वो पहले जैसी नहीं लग रही थी। उसने वही खूबसूरत रूप लिया हुआ था…लेकिन उसके चेहरे की मासूमियत कहीं खो गई थी। उसकी आँखों में ठंडापन था…और भीतर कुछ खतरनाक जाग चुका था। कई लोगों को अचानक घुटन होने लगी…कंप्यूटर स्क्रीन अपने आप झिलमिलाने लगीं…लाइट्स दो बार टिमटिमाईं…सब समझ गए—
👉 कुछ गलत है।
कृष्णा अपनी सीट से उठा… जैसे ही उसकी नजर सिद्धिका पर पड़ी वो ठिठक गया।

उसने मन ही मन कहा —
ये वही नहीं है…

आज उसके चारों तरफ एक काली ऊर्जा थी। कृष्णा धीरे-धीरे उसके पास गया।

उसने पुकारा —
सिद्धिका…

लेकिन सिद्धिका ने बिना भाव के उसकी तरफ देखा…

वो बोली - 
मुझे उस नाम से मत बुलाओ…

उसकी आवाज़ भारी और ठंडी थी।

बोली - 
वो कमजोर लड़की अब खत्म हो चुकी है…
अब सिर्फ भूख है… और विनाश…

ये शब्द सिद्धिका के होंठों से निकले…लेकिन आवाज़ किसी और की थी। कृष्णा समझ गया उस पर अंधकार का कब्ज़ा हो चुका है।
पलक झपकते ही सिद्धिका उसके सामने आ गई।उसने कृष्णा की गर्दन पकड़ ली…लोग डर के मारे चिल्ला उठे। उसकी आँखें लाल थीं…दाँत बाहर आ चुके थे…

वो गरजी -
आज… तुम्हारा अंत होगा…

लेकिन कृष्णा डरा नहीं।उसने बस उसकी आँखों में देखा…

और धीमे से कहा—
तुम नहीं… ये अंधकार बोल रहा है।
मेरी सिद्धिका अभी भी अंदर है…

ये सुनते ही सिद्धिका का हाथ कांप गया। उसकी पकड़ ढीली पड़ी।
आँखों की लाल चमक एक पल के लिए कम हुई…जैसे अंदर कहीं असली सिद्धिका लड़ रही हो।

बहुत धीमे… लगभग टूटती आवाज़ में निकला—
कृष्णा… भाग जाओ…

फिर अगले ही पल वो फिर गरजी—
चुप रहो!

अब ये सिर्फ इंसान और वैंपायर की लड़ाई नहीं थी…ये थी प्यार बनाम कब्ज़ा की लड़ाई।कृष्णा ने अपनी कलाई का लाल धागा कसकर पकड़ा…

और तय कर लिया—
आज मैं तुम्हें अंधकार से वापस लेकर जाऊँगा।

ऑफिस में सबके सामने जो हुआ…उसके अगले ही पल सिद्धिका की आँखों की लाल चमक अचानक बुझ गई। उसका शरीर ढीला पड़ गया…और वो वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी। लोग घबरा गए…
लेकिन कृष्णा बिना देर किए उसकी तरफ दौड़ा। उसने सिद्धिका को अपनी बाँहों में उठा लिया। पहली बार वो खतरनाक वैंपायर नहीं…एक कमजोर लड़की लग रही थी।

कृष्णा उसे जल्दी से अपने केबिन में ले गया।दरवाज़ा बंद किया…
और उसे सोफे पर लिटा दिया।कृष्णा बार-बार उसे जगाने की कोशिश करने लगा।

कृष्णा बोला - 
सिद्धिका… आँखें खोलो…सुन रही हो ना…

उसकी आवाज़ में पहली बार डर साफ था। कुछ देर बाद सिद्धिका ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। लेकिन इस बार उसकी आँखों में लाल चमक नहीं थी…सिर्फ दर्द था। वो तुरंत अपने सीने पर हाथ रखकर तड़प उठी।

वो चीखी -
आह…

उसके सीने में भयानक दर्द हो रहा था…जैसे कोई अंदर से उसकी रूह को नोच रहा हो।जैसे कोई उसकी शक्तियाँ खींच लेना चाहता हो।उसकी सांसें तेज़ थीं…चेहरा पीला पड़ चुका था…कृष्णा ने महसूस किया उसकी वो रहस्यमयी खुशबू भी हल्की पड़ चुकी थी…उसके चारों तरफ की ऊर्जा गायब हो रही थी…सिद्धिका सच में कमजोर हो रही थी।

सिद्धिका ने मुश्किल से कहा—
वो… मुझे सज़ा दे रहा है…

कृष्णा समझ गया—
कौन?

उसने काँपती आवाज़ में कहा—
जिस अंधकार ने मुझे बनाया…
वो मेरी शक्तियाँ वापस ले रहा है…

पहली बार कृष्णा की आँखों में आग उतर आई।

वो बोला - 
कोई तुम्हें तकलीफ नहीं देगा…

उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

फिर बोला - 
जब तक मैं हूँ…

सिद्धिका ने उसकी तरफ देखा…उसकी आँखों में आँसू आ गए।

वो बोली - 
अगर मेरी शक्तियाँ चली गईं…तो मैं बचूँगी नहीं…।

कृष्णा झुककर उसके करीब आया…

और बोला—
तो मैं तुम्हें बचाऊँगा…चाहे अंधकार से लड़ना पड़े… या मौत से।

अब कहानी नया मोड़ ले चुकी है—
वैंपायर अपनी शक्तियाँ खो रही है…
और एक इंसान उसकी जिंदगी बचाने को तैयार है…

कमरे में सन्नाटा था…सिर्फ सिद्धिका की धीमी साँसें और कृष्णा की बेचैनी।कृष्णा उसके पास बैठा था…उसकी आँखों में पहली बार झिझक नहीं थी…

उसने धीरे से कहा—
मुझे तुम्हें बचाने के लिए कुछ भी करना पड़े… मैं करूंगा।

थोड़ा रुककर उसने आगे कहा—
क्योंकि मैं तुमसे…

वाक्य बीच में ही टूट गया। कमरे की हवा जैसे भारी हो गई।

सिद्धिका ने कमज़ोर लेकिन साफ़ आवाज़ में पूछा—
क्योंकि…?

उसकी आँखें कृष्णा पर टिकी थीं। इस बार उसमें डर नहीं था…सिर्फ जवाब चाहिए था। कृष्णा चुप हो गया।उसकी आँखें नीचे झुक गईं…हाथ हल्का सा काँप गया। वो शब्द जो वह कहना चाहता था…उसके गले में अटक गया।कमरे में खामोशी फैल गई…
लेकिन उस खामोशी में बहुत कुछ कहा जा रहा था।सिद्धिका उसकी चुप्पी समझने की कोशिश कर रही थी…और कृष्णा खुद से लड़ रहा था।

सिद्धिका हल्की सी मुस्कुराई…

कमज़ोरी के बावजूद उस की आवाज़ नरम थी—
कह दो…जो भी है…

कृष्णा ने उसकी तरफ देखा…फिर धीरे से उसकी कलाई पकड़ ली।
लेकिन शब्द फिर भी नहीं निकले।

उस पल में एक वैंपायर कमजोर थी… और एक इंसान अपने दिल की सच्चाई से डर रहा था…

कमरे में अब भी वही भारी खामोशी थी…सिद्धिका धीरे-धीरे साँस ले रही थी, और कृष्णा उसके पास बैठा था—चिंतित, लेकिन स्थिर। कृष्णा ने उसकी तरफ देखा…इस बार उसकी आँखों में झिझक नहीं थी।

उसने साफ़ आवाज़ में कहा—
तुम मुझसे शादी करोगी।

एक पल के लिए सब रुक गया…सिद्धिका की आँखें चौड़ी हो गईं।

उसने धीमे से कहा -
क्या…?

कृष्णा ने तुरंत आगे कहा—
मुझे बस तुम्हारी safety चाहिए।
तुम्हारी हालत… वो अंधकार… मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकता।

कृष्णा की बातों में प्यार से ज्यादा चिंता थी…लेकिन उसके अंदर का भाव साफ था वो उसे खोना नहीं चाहता था। वो उसे अकेला छोड़ने से डर रहा था। सिद्धिका चुप हो गई…

उसकी आँखों में कई भाव एक साथ थे—
गुस्सा… हैरानी… और कहीं गहराई में एक हल्का सा सुकून भी।

उसने धीरे से पूछा -
तुम… मुझसे शादी सिर्फ इसलिए करना चाहते हो… ताकि मैं बची रहूँ?

कृष्णा थोड़ा झुका…

और शांत आवाज़ में बोला—
अगर तुम्हें सच चाहिए…
तो हाँ… मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।

कमरे में फिर सन्नाटा फैल गया…लेकिन इस बार वो सन्नाटा खाली नहीं था। उसमें एक नया रिश्ता जन्म ले रहा था… मजबूरी और सुरक्षा के बीच का रिश्ता।सिद्धिका ने कुछ देर कृष्णा को देखा…
फिर हल्के से अपने होंठ दबाए…

और धीरे से बोली—
तुम पागल हो…

लेकिन उसकी आँखों में पहली बार…गुस्से के साथ हल्की मुस्कान भी थी। अब कहानी एक नए मोड़ पर है एक इंसान ने वैंपायर को शादी का प्रस्ताव दिया है… और अंधकार ये सब देख रहा है…

क्या ये शादी सिद्धिका को बचाएगी?
या ये सबसे बड़ा जाल साबित होगी…?