Pavitra Prem ya Abhishaap ? - 5 in Hindi Love Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 5

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पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 5

कुछ ही दिनों में हालात बदल गए…कृष्णा का फैसला पक्का था…
और सिद्धिका अब भी उलझी हुई थी पर किसी अजीब सी खामोशी में उसने हाँ कह दिया था।आज पहली बार…सिद्धिका एक मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी थी। चारों तरफ घंटियों की आवाज़…अगरबत्ती की खुशबू…और भक्तों की भीड़…

लेकिन सबसे अलग थी वो—
एक वैंपायर, जो सुहागन की तरह सजी थी।

लाल साड़ी…लंबे खुले बाल…माथे पर हल्का सा तिलक…लेकिन आँखों में अब भी वो रहस्यमयी गहराई थी।लोग उसे देखकर रुक गए…

लोग बोले - 
ये कौन है…?
क्या ये सच में मंदिर आई है…?

किसी ने फुसफुसाया—
इतनी सुंदर… पर इतनी अजीब भी…

कृष्णा उसके पास खड़ा था…उसके चेहरे पर शांति थी। उसने सिद्धिका का हाथ पकड़ लिया—

बोला - 
डरो मत…

मंदिर के अंदर…पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। हवन की आग जल रही थी…धुआँ ऊपर उठ रहा था…और उसी आग के सामने एक इंसान और एक वैंपायर सात फेरे ले रहे थे। हर फेरे के साथ…सिद्धिका के अंदर कुछ बदल रहा था। उसकी प्यास शांत थी…उसकी शक्ति कमजोर थी…लेकिन दिल… तेज़ धड़क रहा था।

आज इतिहास में पहली बार हुआ था…एक वैंपायर ने मंदिर में शादी की थी। जैसे ही आखिरी फेरा पूरा हुआ…घंटियाँ अपने आप तेज़ बजने लगीं…और हवा में एक अजीब सी शांति फैल गई…
दूर कहीं… उसी अंधेरे में…

एक आवाज़ गूंजी—
ये शादी… ज्यादा दिन नहीं चलेगी…

🔥 अब कहानी और गहरी हो चुकी है—
💍 मंदिर में शादी हो गई…
🩸 लेकिन असली जंग अब शुरू होगी…

शादी के बाद रात गहराती जा रही थी…मंदिर की घंटियों की आवाज़ अब भी कानों में गूंज रही थी। कृष्णा सिद्धिका को अपने घर ले आया…पहली बार वो उसके साथ उसके bedroom में थी।
कमरा शांत था…हल्की पीली रोशनी…और बाहर रात का सन्नाटा…
सिद्धिका खिड़की के पास खड़ी थी, जैसे उसे यकीन ही नहीं हो रहा हो कि वो यहाँ है।

कृष्णा ने धीरे से कहा—
जब तक तुम नहीं चाहोगी…
मैं तुम्हें हाथ तक नहीं लगाऊँगा।”

उसकी आवाज़ में सम्मान था…और एक गहरी सच्चाई भी सिद्धिका ने पीछे मुड़कर उसे देखा…उसकी आँखों में अब भी वैंपायर की गहराई थी…लेकिन उस गहराई में एक नई उलझन भी थी।

उसने धीरे से पूछा -
तुम मुझे समझते क्यों हो…?

कृष्णा थोड़ा मुस्कुराया—
क्योंकि डर से नहीं…मैं तुम्हें भरोसे से देखना चाहता हूँ।

ये सुनकर सिद्धिका चुप हो गई…उसके अंदर कुछ पिघलने लगा…
लेकिन उसी पल…उसकी आँखों में हल्की सी लाल चमक फिर से लौट आई। वो अपना चेहरा मोड़कर खिड़की की तरफ देखने लगी…जैसे कोई आवाज़ उसे फिर से बुला रही हो।

दूर कहीं उसी अंधेरे से आवाज़ आई—
तुम उसकी नहीं हो सकती…तुम हमारी हो…

उसका हाथ खिड़की के शीशे पर रख गया…चेहरा हल्का पीला पड़ गया…कृष्णा ने तुरंत नोटिस किया—

वो बोला - 
क्या हुआ?

सिद्धिका ने खुद को संभाला…

और धीमे से बोली—
कुछ नहीं…

लेकिन उसकी आँखें झूठ बोल रही थीं।कृष्णा उसके पास आया…

और शांत स्वर में बोला—
मैं यहाँ हूँ…तुम अकेली नहीं हो।

🔥 उस रात—
🏠 एक घर में दो लोग साथ थे…
❤️ एक इंसान जो प्यार करता था…
🩸 और एक वैंपायर जो खुद से लड़ रही थी…

रात गहरी हो चुकी थी…कमरे में हल्की सी रोशनी थी, और बाहर हवा धीरे-धीरे खिड़की से टकरा रही थी। सिद्धिका बिस्तर पर लेट गई थी…उसके ठीक बगल में कृष्णा लेटा था। दोनों के बीच दूरी बहुत कम थी…लेकिन महसूस हो रहा था जैसे कोई बहुत बड़ी दीवार हो।
सिद्धिका शांत दिखने की कोशिश कर रही थी…लेकिन उसके अंदर हलचल बढ़ती जा रही थी।उसकी साँसें कभी तेज़ हो जातीं… कभी रुक सी जातीं।  उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये डर है…या कुछ और।

कृष्णा उसकी तरफ मुड़ा…लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। उसने सिर्फ उसकी चुप्पी को महसूस किया।उसकी मौजूदगी सिद्धिका के लिए अजीब थी ना डरावनी…ना पूरी तरह सुकून देने वाली…बल्कि कुछ ऐसा… जो उसे उलझा रहा था। सिद्धिका कुछ कहना चाहती थी…लेकिन होंठ खुलकर भी आवाज़ नहीं निकल पा रही थी।

उसके मन में बहुत कुछ चल रहा था—
👉 “मैं यहाँ क्यों हूँ?”
👉 “मैं इस इंसान के साथ क्यों सुरक्षित महसूस कर रही हूँ?”
👉 “और फिर भी क्यों डर रही हूँ?”

कमरे में सिर्फ दो साँसों की आवाज़ थी…एक इंसान की…एक वैंपायर की…और दोनों के बीच अनकहे सवालों का तूफान।कृष्णा ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया…और सिद्धिका के पास रख दिया…ना उसे छुआ… ना पकड़ा…बस मौजूद रहा।

जैसे कह रहा हो—
मैं यहीं हूँ।

ये छोटी सी चीज़…सिद्धिका के अंदर कुछ तोड़ गई।उसकी आँखें हल्की नम हो गईं…लेकिन उसने जल्दी से चेहरा मोड़ लिया।
उस रात…सिद्धिका ने एक बात पहली बार महसूस की डर हमेशा ताकत से नहीं आता…कभी-कभी… सुकून भी डर बन जाता है।

🔥 और इसी खामोश रात में…
🩸 एक वैंपायर अपने अंदर की उलझन से लड़ रही थी…
❤️ और एक इंसान उसके पास सिर्फ भरोसे के साथ लेटा था…

रात पहले से भी ज्यादा भारी हो चुकी थी…कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ हवा की हल्की आवाज़ और दो साँसों की धड़कन।सिद्धिका की आँखें अचानक खुल गईं…और उसी पल—

उसके कान के पास एक धीमी, डरावनी फुसफुसाहट गूंजी—
सिद्धिका…!
मार दो उसे…बुझा लो अपनी प्यास…

सिद्धिका का शरीर कांप गया।उसकी आँखें हल्की लाल होने लगीं…
वो धीरे-धीरे करवट लेने लगी…और उसकी नज़र कृष्णा पर पड़ी—
जो शांत होकर सो रहा था…

वही आवाज़ फिर गूंजी—
तुम वैंपायर हो…इंसान के साथ रहकर कमजोर क्यों बन रही हो?
बस एक बार… और सब खत्म…

सिद्धिका ने अपने सीने पर हाथ रखा…उसका दिल तेज़ धड़क रहा था…उसकी साँसें टूट रही थीं… एक तरफ प्यास… दूसरी तरफ कृष्णा का भरोसा…

कृष्णा अभी भी सो रहा था…उसके चेहरे पर कोई डर नहीं…कोई अंदेशा नहीं…बस शांति…सिद्धिका धीरे-धीरे उसके करीब झुकी…
उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो चुकी थीं…दाँत बाहर आने लगे…लेकिन…उसका हाथ काँप गया।
अचानक कृष्णा ने नींद में हल्की सी मुस्कान दी…

और बुदबुदाया—
तुम सुरक्षित हो…

ये सुनते ही…सिद्धिका जैसे जम गई।उसकी आँखों से एक आँसू गिरा…👉 प्यास रुक गई…👉 अंधकार कांप गया…

आवाज़ गुस्से में बदल गई —
कमज़ोर मत पड़ो…!
वो इंसान है!
तुम वैंपायर हो!

😶 लेकिन सिद्धिका ने पहली बार जवाब दिया

धीमे लेकिन टूटती आवाज़ में उसने कहा—
मैं… उसकी जान नहीं लूंगी…

फुसफुसाहट अचानक गायब हो गई…कमरा फिर शांत हो गया…
सिद्धिका पीछे हट गई…और अपने आँसुओं को पोंछ लिया।
उसने पहली बार समझा प्यास सिर्फ खून की नहीं थी…ये दिल की लड़ाई भी थी…

🔥 उस रात—
🩸 अंधकार ने उसे फिर बुलाया…
❤️ लेकिन सिद्धिका ने पहली बार उसे मना कर दिया…

👉 क्या ये आवाज़ सच में अंधकार था?
या सिद्धिका के अंदर का कोई और रहस्य…?