Pavitra Prem ya Abhishaap ? - 2 in Hindi Horror Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 2

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पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 2

उस रात के बाद सब कुछ बदल गया था…सिद्धिका अपने ठिकाने पर लौट चुकी थी…लेकिन इस बार वो शांत नहीं थी। उसकी कलाई अब भी जल रही थी…जहाँ कृष्णा के लाल धागे का स्पर्श हुआ था।

वो गुस्से में चीज़ें तोड़ने लगी और बोली—
एक साधारण इंसान… मुझे रोक गया?

उसकी आँखें लाल हो गईं…लेकिन इस बार गुस्से के साथ कुछ और भी था डर और शायद… थोड़ा सा आकर्षण भी। उसे समझ नहीं आ रहा था क्यों वो कृष्णा के पास जाते ही कमजोर पड़ गई।

दूसरी तरफ…कृष्णा पूरी रात सो नहीं पाया। उसने जो देखा था… वो उसकी समझ से बाहर था। लेकिन डरने के बजाय उसने एक फैसला लिया वो सीधे सुबह मंदिर गया। घंटियाँ बज रही थीं…और कृष्णा भगवान के सामने खड़ा था।

उसने आँखें बंद कीं और कहा—
हे भगवान… अगर ये कोई बुरी शक्ति है,
तो मुझे उसे रोकने की ताकत दीजिए…

पंडित जी ने उसे देखा और बोले—
बेटा, तुम्हारे चारों तरफ कोई अंधेरा मंडरा रहा है…
लेकिन तुम्हारी आस्था उससे कहीं ज्यादा मजबूत है।

उन्होंने कृष्णा को एक रक्षा मंत्र और एक और पवित्र धागा दिया।

अगले दिन…ऑफिस में सब सामान्य दिख रहा था। लेकिन जैसे ही कृष्णा अंदर आया सिद्धिका की नजर उस पर पड़ी। इस बार वो पहले जैसी आत्मविश्वासी नहीं थी। उसकी नजर सीधे कृष्णा की कलाई पर गई…वही लाल धागा…दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।

कृष्णा ने गंभीर आवाज़ में पूछा—
तुम हो कौन…?

सिद्धिका हल्का मुस्कुराई…लेकिन उसकी मुस्कान में इस बार कमजोरी थी।

वो बोली—
अगर सच जान गए… तो डर जाओगे…

कृष्णा बिना पलक झपकाए बोला—
सच से कभी डर नहीं लगता।

उस पल सिद्धिका के अंदर दो आवाज़ें लड़ रही थीं—
🩸 एक कह रही थी — “इसका खून पी जाओ…”
❤️ दूसरी कह रही थी — “इसे नुकसान मत पहुंचाओ…”

वो खुद से ही लड़ रही थी…पहली बार…एक वैंपायर का दिल इंसान की तरफ झुक रहा था। अब कहानी सिर्फ डरावनी नहीं रही…अब ये बन चुकी थी एक ऐसी जंग… जहाँ प्यार और अंधकार आमने-सामने खड़े थे।

ऑफिस का वही माहौल…लेकिन अब हवा में कुछ बदल चुका था।
सिद्धिका दूर खड़ी थी…लेकिन उसकी नज़र सिर्फ कृष्णा पर टिकी हुई थी। जैसे ही कृष्णा उसके पास से गुज़रा उसकी साँसें तेज़ हो गईं…उसे ऐसा लगा जैसे कोई अनदेखी ताकत उसे अपनी ओर खींच रही हो। उसका दिल… जो सालों से सिर्फ अंधकार के लिए धड़कता था…आज अजीब तरह से बेचैन था।

उसकी आँखें धीरे-धीरे कृष्णा के गले की नसों पर टिक गईं…हर धड़कन…हर सांस…उसे साफ़ सुनाई दे रही थी।उसके होंठ हल्के से कांपे…

उसके मन में ख्याल आया -
बस एक बार…एक बार इसका खून…।

उसकी वैंपायर प्यास अब काबू से बाहर हो रही थी।पर उसी पल कुछ अजीब हुआ…जितना वो कृष्णा के करीब जाती…उतना ही उसके अंदर एक अजीब सा खिंचाव बढ़ने लगता। ये सिर्फ भूख नहीं थी…ये कुछ और था…जैसे उसकी आत्मा, कृष्णा की शांति से जुड़ रही हो। सिद्धिका ने खुद को रोकने की कोशिश की…उसकी आँखें लाल हो गईं…नुकीले दाँत बाहर आने लगे…लेकिन उसके कदम रुक गए।

उसने खुद से पूछा -
क्यों…?
मैं इसे खत्म क्यों नहीं कर पा रही…?

कृष्णा को कुछ अजीब महसूस हुआ…वो पलटा… और उसकी नजर सीधे सिद्धिका से टकराई। उसकी आँखों में डर नहीं था…सिर्फ शांति थी।

वो बोला—
तुम ठीक हो…?

ये सुनकर सिद्धिका एक पल के लिए हिल गई…जिस इंसान का वो खून पीना चाहती थी…वो उसकी फिक्र कर रहा था। उस दिन के बाद…सिद्धिका की प्यास और भी खतरनाक हो गई लेकिन उसके साथ-साथ… उसका दिल भी कमजोर पड़ने लगा। अब हर बार जब वो कृष्णा के पास जाती उसके अंदर दो चीज़ें लड़तीं खून की प्यास और एक अनजाना प्यार। कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर है…
जहाँ एक वैंपायर खुद से लड़ रही है…।

ऑफिस का समय खत्म हो चुका था…लेकिन आज फिर कृष्णा रुका हुआ था। बारिश हो रही थी…खिड़कियों पर गिरती बूंदें माहौल को और भी भारी बना रही थीं। सिद्धिका दूर खड़ी उसे देख रही थी…आज ऑफिस खाली था। कोई रुकावट नहीं… कोई डर नहीं…आज वो चाहती तो आसानी से कृष्णा को अपना शिकार बना सकती थी। उसकी आँखें लाल हो गईं…नुकीले दाँत धीरे-धीरे बाहर आ गए। वो धीरे-धीरे उसके पीछे पहुँची…कृष्णा अपनी फाइल में खोया हुआ था…

सिद्धिका अब बिल्कुल उसके पीछे खड़ी थी…उसकी सांसें कृष्णा की गर्दन को छू रही थीं…और उसकी नजर फिर उसी जगह टिक गई,  गले की धड़कती नसें…उसका हाथ धीरे से उठा…बस एक पल…और सब खत्म…जैसे ही वो झुकी—

अचानक कृष्णा ने बिना मुड़े कहा—
तुम फिर आ गई…

उसकी आवाज़ शांत थी…बिल्कुल बिना डर के। सिद्धिका ठिठक गई। कृष्णा धीरे से मुड़ा…उनकी आँखें मिलीं…उसकी आँखों में डर नहीं…बल्कि एक अजीब सा भरोसा था।

वो बोला—
अगर तुम मुझे नुकसान पहुँचाना चाहती…तो उस रात ही कर देती…पर तुमने नहीं किया…।

ये सुनते ही सिद्धिका के अंदर कुछ टूट गया…उसकी आँखों की लाल चमक धीमी पड़ने लगी…उसका हाथ… जो हमला करने के लिए उठा था…धीरे-धीरे नीचे गिर गया।

वो खुद से बुदबुदाई - 
मैं… क्यों नहीं कर पाई…

अचानक उसने अपने कदम पीछे खींच लिए…उसकी सांसें तेज़ थीं…चेहरे पर गुस्सा… दर्द… और उलझन सब एक साथ था।

वो धीमे से बोली - 
तुम समझ नहीं सकते…

और अगले ही पल वो वहाँ से गायब हो गई। कृष्णा उसे जाते हुए देखता रहा…अब उसे यकीन हो गया था।  सिद्धिका सिर्फ एक राक्षसी शक्ति नहीं है…उसके अंदर कुछ अच्छा भी बाकी है।
उस रात एक बहुत बड़ा बदलाव आया  पहली बार सिद्धिका अपनी प्यास से हार गई…और पहली बार उसके दिल ने जीत की शुरुआत की…।

कृष्णा अब सब समझ चुका था…सिद्धिका इंसान नहीं है। वो एक ऐसी शक्ति है जो किसी भी पल उसे नुकसान पहुँचा सकती है।लेकिन फिर भी…वो उससे डरता नहीं था। कृष्णा के अंदर एक अजीब-सी शांति थी।

उसे लगता था—
अगर मेरी नीयत साफ है…और भगवान मेरे साथ हैं…
तो कोई भी अंधकार मुझे छू नहीं सकता।

उसकी कलाई पर बंधा लाल धागा और दिल में बसा विश्वास…उसे हर पल मजबूत बना रहा था। अब कृष्णा खुद सिद्धिका के पास जाने लगा था…कभी काम के बहाने…कभी बिना वजह…उसे उसकी मौजूदगी अच्छी लगने लगी थी।

सबसे ज्यादा—
उसकी खुशबू। वो रहस्यमयी परफ्यूम जैसी महक…जो पहले डरावनी लगती थी…अब उसे सुकून देने लगी थी। कृष्णा जब भी उसके पास खड़ा होता एक पल के लिए दुनिया शांत हो जाती।
सिद्धिका ये सब देख रही थी…

वो हैरान थी—
जिसे मुझसे डरना चाहिए…वो खुद मेरे पास क्यों आ रहा है?

उसकी प्यास अब भी उतनी ही खतरनाक थी…लेकिन कृष्णा के करीब आते ही उसका दिल तेज़ धड़कने लगता…उसकी ताकत कमजोर पड़ जाती…। 

एक दिन…कृष्णा खुद उसके सामने आकर खड़ा हो गया। दोनों बहुत करीब थे…सिद्धिका की सांसें फिर से तेज़ हो गईं…उसकी नजर फिर कृष्णा की गर्दन पर गई…लेकिन इस बार—

कृष्णा मुस्कुराया और बोला—
तुम्हारी ये खुशबू… अजीब है…डराती भी है… और खींचती भी है…

ये सुनकर सिद्धिका एक पल के लिए जम गई…पहली बार किसी ने उसकी डरावनी पहचान को नहीं…बल्कि उसकी मौजूदगी को महसूस किया था। उसकी आँखों में हल्की नमी आ गई…लेकिन अगले ही पल उसकी प्यास फिर जाग उठी…वो धीरे-धीरे कृष्णा के और करीब आई…इतनी करीब कि  उसकी सांसें उसके चेहरे को छूने लगीं…उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो गईं…।

और उसने बहुत धीमे से कहा—
तुम्हें अंदाज़ा भी है…तुम किसके इतना करीब खड़े हो…?

कृष्णा बिना पीछे हटे बोला—
हाँ… और फिर भी खड़ा हूँ।

अब कहानी एक बेहद खतरनाक मोड़ पर है—
जहाँ 🩸 मौत जितनी खतरनाक नज़दीकियाँ
❤️ और भरोसे जितना मजबूत रिश्ता एक साथ जन्म ले रहे हैं…

क्या ये भरोसा सिद्धिका को बदल देगा…
या उसकी प्यास एक दिन सब खत्म कर देगी…?