Heer-Ranjha - 1 in Hindi Love Stories by Shaziya Khan books and stories PDF | हीर-रांझा: द मॉडर्न थ्रिलर - 1

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हीर-रांझा: द मॉडर्न थ्रिलर - 1

एक अनकहा पन्ना...
"सदियों से इतिहास ने हीर-रांझा को सिर्फ तड़पते और बिछड़ते देखा है... लेकिन क्या होता अगर हीर लाचार होने के बजाय निडर होती? आइए देखते हैं आज के दौर के हीर-रांझा का एक अलग रूप..."
— समीर ख़ान

एपिसोड 1: धूप, धुन और वो अजनबी

शिकागो की उस बहुमंज़िला इमारत के 14वें माले पर बने अपार्टमेंट की बड़ी सी काँच की खिड़की से सुबह की गुनगुनी धूप अंदर आ रही थी। धूप की वो सुनहरी किरणें सीधे फर्श पर बिखरी म्यूज़िक शीट्स और एक पुराने गिटार पर पड़ रही थीं। हवा में हल्की सी ठंडक थी, लेकिन खिड़की से छनकर आती उस धूप में एक अजीब सा सुकून था।
रहमान... जिसे लोग उसकी सादगी और फन की वजह से प्यार से 'रांझा' कहते थे, अपनी आँखें मूँदे खिड़की के पास बैठा था। उसकी लंबी, कलात्मक उँगलियाँ गिटार के तारों पर बहुत धीरे से रेंग रही थीं, जिससे एक बेहद दर्दभरी, रूहानी और गहरी धुन निकल रही थी। रहमान इस शहर की भाग-दौड़ और मतलबी दुनिया से दूर, अपनी ही एक तन्हा दुनिया में रहता था। वह एक ऐसा फनकार था जिसके पास दौलत तो नहीं थी, पर उसके जज़्बात उसकी धुनों में बहते थे, जो किसी भी सुनने वाले का दिल मोम कर दें।
ठीक उसी वक्त, नीचे सड़क पर एक महंगी, चमचमाती काली गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और उसमें से जो बाहर निकली, उसे देखकर ऐसा लगा मानो उस ठंडे और अजनबी शहर में अचानक किसी ने गर्माहट और ज़िंदगी भर दी हो। वो हीर थी। एक बेहद अमीर और रसूखदार खानदान की वो लड़की, जिसके हुस्न की चर्चा हर तरफ थी। लेकिन हीर सिर्फ खूबसूरत नहीं थी, उसकी आँखों में एक अजीब सी बेबाकी, समझदारी और निडरता थी। वह उन लड़कियों में से नहीं थी जो बंदिशों के आगे झुक जाएं। वह इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि आज की यह धूप वाली सुबह उसकी ज़िंदगी का रुख हमेशा के लिए बदलने वाली है।
गाड़ी से उतरकर हीर ने एक पल के लिए अपनी महंगी ऐनक हटाई और आसमान छूती उस इमारत की तरफ देखा। वह यहाँ अपने पिता के एक बड़े बिज़नेस सिलसिले में कुछ कागज़ात पहुँचाने आई थी। लेकिन उसका दिल इन बेजान कॉरपोरेट फाइलों और कंक्रीट के जंगलों में कभी नहीं लगता था। वह आज़ाद हवाओं में सांस लेने वाली लड़की थी, जिसे बंदिशों से नफरत थी।
जैसे ही उसने इमारत के शांत कॉरिडोर में कदम रखा, हवा में तैरती हुई गिटार की एक बेहद खूबसूरत धुन उसके कानों से टकराई। उस धुन में इतना दर्द, इतनी तड़प और एक अजीब सा खिंचाव था कि हीर के बढ़ते कदम अपने आप ठहर गए। उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। वह किसी जादुई सम्मोहन में बंधी हुई उस दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगी, जहाँ से वो आवाज़ आ रही थी—कमरा नंबर 1402।
अपार्टमेंट का दरवाज़ा हल्का सा खुला हुआ था, शायद हवा के झोंके से। हीर ने जैसे ही धड़कते दिल के साथ अंदर झाँका, उसने खिड़की की सुनहरी धूप में डूबे हुए रहमान को देखा, जो दुनिया से बेखबर अपनी ही धुन में खोया हुआ था। ठीक उसी पल, जैसे किसी आहट को महसूस करके रहमान ने अपनी आँखें खोलीं।
दोनों की नज़रें मिलीं। एक तरफ धुनों का गहरा समंदर था, तो दूसरी तरफ आँखों में छिपी वो निडर चमक। कुछ कहे बिना भी उस एक पल में जैसे सदियों पुराना कोई अधूरा रिश्ता दोबारा ज़िंदा हो गया था। दोनों मौन थे, पर धड़कनें सब कह रही थीं।
लेकिन वो दोनों इस बात से बिल्कुल अनजान थे कि इसी शहर के दूसरे कोने में, एक आलीशान और अंधेरे केबिन में बैठा एक शख्स, हाथ में हीर की तस्वीर लिए हुए अपनी उँगलियों से टेबल थपथपा रहा था। वह था कैदो। उसकी आँखों में कोई हमदर्दी नहीं थी, सिर्फ नफ़रत और शातिरपन था। उसने चबाती हुई आवाज़ में फोन उठाया और कहा, "लड़की पर पैनी नज़र रखो। वह अपनी हद पार न करे, वरना अंजाम वह खुद भुगतेगी..." (जारी है )
लेखक_ समीर खान