Heer-Ranjha in Hindi Love Stories by Shaziya Khan books and stories PDF | हीर-रांझा: द मॉडर्न थ्रिलर - 6

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हीर-रांझा: द मॉडर्न थ्रिलर - 6

एपिसोड 6: साज़िश का दस्तावेज़ और कैदो का अल्टीमेटम



"ज़मीर जिसका सो चुका हो, वो रिश्तों का सौदा करता है... पर उसे क्या पता कि वक़्त हर एक का हिसाब करता है।"
— समीर ख़ान


शिकागो शहर पर शाम ढल रही थी, लेकिन इस बार की शाम अपने साथ कोई सुकून नहीं, बल्कि एक अजीब सी बेचैनी लेकर आई थी। गगनचुंबी इमारतों के शीशों पर टकराती सूरज की आख़िरी लाल किरणें ऐसा लग रही थीं मानो आसमान से खून टपक रहा हो। काशिफ के जाने के बाद रहमान के अपार्टमेंट में एक भारी सन्नाटा पसर गया था। हीर खिड़की के पास खड़ी बाहर की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी को देख रही थी, लेकिन उसका दिमाग कहीं और था। वह जानती थी कि कैदो शांत नहीं बैठा है। वह उस शेर की तरह था जो चोट खाने के बाद और ज़्यादा खूंखार हो जाता है।


रहमान उसके पीछे आया और धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा। "हीर, तुम क्या सोच रही हो? जब से थाने से आई हो, तुम्हारी आँखों में एक अजीब सी हलचल है। मुझे तुम्हारी इस खामोशी से डर लग रहा है," रहमान ने अपनी धीमी और गंभीर आवाज़ में कहा। हीर ने पलटकर रहमान का हाथ अपने हाथों में लिया। उसकी उंगलियाँ ठंडी थीं, लेकिन आँखों में वही अंगारे सुलग रहे थे। उसने कहा, "रहमान, मैं डर नहीं रही हूँ। मैं बस यह सोच रही हूँ कि चचा कैदो का अगला वार क्या होगा। वह अपनी बेइज़्ज़ती कभी नहीं भूलेगा। उसने पुलिस को पैसे खिलाकर तुम्हें फंसाने की कोशिश की, और जब वह नाकाम हो गया, तो वह कुछ ऐसा करेगा जो हमारे पैरो तले से ज़मीन खींच ले।"


और हीर का यह अंदेशा बिल्कुल सच था। ठीक उसी वक़्त, शिकागो के सबसे महंगे बिज़नेस डिस्ट्रिक्ट में स्थित एक आलीशान केबिन में कैदो बैठा था। उसके सामने टेबल पर कुछ बेहद गोपनीय दस्तावेज़ रखे थे। कैदो के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो किसी शैतान के चेहरे पर ही शोभा दे सकती है। उसने हीर के पिता के सीधे-साधे स्वभाव का फ़ायदा उठाकर उन्हें एक ऐसे बिज़नेस जाल में फंसा दिया था, जहाँ से निकलने का मतलब था उनका पूरी तरह से बर्बाद हो जाना। कैदो ने चालाकी से करोड़ों के कर्ज़ और घाटे का सारा ज़िम्मा हीर के पिता के सर मढ़ दिया था। अब उनके पास सिर्फ एक ही रास्ता बचा था—कैदो की हर शर्त को मानना।


अगली सुबह, कैदो पूरी ठसक के साथ हीर के पुश्तैनी बंगले पर पहुँचा। हीर के पिता हॉल में परेशान बैठे थे। कैदो ने आते ही सोफे पर पैर फैलाए और वह काले रंग की फाइल टेबल पर पटक दी। "ये क्या है कैदो?" हीर के पिता ने कापते हाथों से फाइल उठाते हुए पूछा।


कैदो ने सिगार का धुआँ हवा में उड़ाते हुए कहा, "यह आपकी बर्बादी का परवाना है, भाई साहब। आपकी कंपनी इस वक़्त पूरी तरह दिवालिया होने की कगार पर है। अगर एफबीआई को इस घाटे और टैक्स चोरी की भनक लगी, तो आपकी बाकी की ज़िंदगी जेल की सलाखों के पीछे गुज़रेगी। लेकिन... मैं आपका पार्टनर हूँ, और पुराना वफ़ादार भी। मैं आपको बचा सकता हूँ।"


"कैसे? तुम जो चाहो मुझसे ले लो कैदो, बस मेरे खानदान की इज़्ज़त बचा लो," हीर के पिता ने लाचारी से कहा। कैदो की आँखें चमक उठीं। उसने झुककर कहा, "मुझे आपकी जायदाद नहीं, आपकी बेटी हीर चाहिए। इस कागज़ पर लिखा है कि अगले तीन दिनों के अंदर हीर का निकाह मेरे साथ होगा। जैसे ही यह निकाह मुकम्मल होगा, मैं अपनी दूसरी कंपनियों से आपकी फर्म में करोड़ों डॉलर ट्रांसफर कर दूँगा। आप भी आज़ाद, और आपका बिज़नेस भी महफ़ूज़।"


ठीक उसी पल हीर ने हॉल में एंट्री ली। उसने कैदो की आखिरी लाइन साफ़ सुन ली थी। उसका खून खौल उठा। वह तेज़ी से आगे बढ़ी और उस फाइल को उठाकर कैदो के मुँह पर दे मारा। कागज़ात पूरे फर्श पर बिखर गए। "तुम्हारी जुर्रत कैसे हुई चचा कैदो! तुम एक लालची, गिद्ध की तरह मेरे पापा की मजबूरी का सौदा कर रहे हो?" हीर की कड़क आवाज़ से पूरा हॉल गूँज उठा।


कैदो धीरे से खड़ा हुआ। उसने अपने चेहरे से धूल झाड़ी और हीर के बेहद करीब आ गया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा खौफनाक ठंडापन था।


"हीर... तुम्हारी यह बेबाकी मुझे बहुत पसंद है। लेकिन अब खेल तुम्हारी पसंद-नापसंद से ऊपर उठ चुका है। तुम्हारे पिता के पास केवल तीन दिन हैं। या तो तुम दुल्हन के लिबास में मेरे घर आओगी, या फिर अपने पिता को हथकड़ी में जेल जाते देखोगी। और हाँ... वह जो सड़क छाप गिटार बजाने वाला तुम्हारा आशिक है न, रहमान... अगर तुमने चालाकी करने की कोशिश की, तो उसकी लाश शिकागो की किसी गुमनाम गली में पड़ी मिलेगी। यह मेरा आख़िरी अल्टीमेटम है।" कैदो ने अपनी ऐनक लगाई, एक शातिर मुस्कान बिखेरी और अपने गार्ड्स के साथ वहाँ से बाहर निकल गया।


हीर वहीं खड़ी रह गई। उसके पिता घुटनों के बल बैठकर रो रहे थे। हीर ने आसमान की तरफ देखा और अपने दांत भींचते हुए मन ही मन कहा, "तुमने जंग का ऐलान किया है न कैदो... तो अब अंजाम भी तुम ही भुगतोगे। मैं अपनी मोहब्बत का सौदा किसी कीमत पर नहीं होने दूँगी।" (जारी है )
लेखक _समीर खान