Devil ki Daastaan - 24 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 24

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Devil की दास्तान - 24

(रात का सन्नाटा... हवाओं में ठंडक है।
आसमान काला, बिजली की चमक रह-रहकर चारों ओर फैल रही है।
करण के घर के दरवाज़े पर दस्तक होती है — “ठक... ठक...”)

(करण दरवाज़ा खोलता है — सामने सिमरन खड़ी है, भीगी हुई, थकी हुई, पर आँखों में वही सच्चाई।)

करण (गुस्से में) बोला - 
“तुम...? तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

(सिमरन काँपती हुई आवाज़ में जवाब देती है —)

सिमरन बोली - 
“करण की... मैं यहीं रहना चाहती हूँ...
मैं आपकी पत्नी हूँ...”

(करण की भौंहें तन जाती हैं। वो एक ठंडी, कटीली हँसी हँसता है।)

करण बोला - 
“पत्नी...?
मैने किसी से शादी की , ये तो मुझे याद ही नहीं...
मुझे तो अपना अतीत ही याद नहीं, और तुम कह रही हो पत्नी?”

(सिमरन आँसू पोंछते हुए उसके पास आती है —)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“भले ही आपको याद न हो... पर मैंने हर वादा निभाया है...
वो सात फेरे... वो कसमें... सब सच थे करण जी...”

(करण उसका चेहरा देखता है, पर उसके भीतर कुछ हलचल नहीं होती।)

करण (कठोर स्वर में) बोला - 
“मुझे इन झूठी कहानियों से कोई मतलब नहीं।
ये घर मेरा है, और इसमें किसी अनजान को जगह नहीं मिलती।”

(सिमरन की आँखों में आँसू भर आते हैं। वो धीमी आवाज़ में बोलती है —)

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
“रात का वक्त है करण जी...
मैं अकेली हूँ... कहाँ जाऊँगी मैं?
कृपया... बस आज के लिए रुक जाने दीजिए...”

(करण गुस्से में दरवाज़ा बंद करने को होता है —
पर तभी बाहर बिजली की चमक और ज़ोर की बारिश शुरू हो जाती है।
वो एक पल को रुकता है... उसकी नज़रों में झिझक झलकती है।)

करण (ठंडी आवाज़ में) बोला - 
“ठीक है... रहो... पर मेरे कमरे से दूर रहना।
सुबह होने पर चली जाना।”

(सिमरन चुपचाप सिर झुका लेती है।
करण अंदर चला जाता है —
वो पीछे मुड़कर देखती है, उसके चेहरे पर दर्द और उम्मीद दोनों हैं।)

“वो घर जो कभी उनके प्यार का गवाह था,
आज दो अजनबियों के बीच दीवार बन गया था...
एक ने प्यार भुला दिया था,
और दूसरी उसे याद दिलाने के लिए अब भी ज़िंदा थी।”

(सिमरन धीरे-धीरे कमरे के कोने में जाकर बैठ जाती है।
उसकी आँखें करण के कमरे की ओर देख रही हैं —
जहाँ वो अब भी वही है, पर पहले जैसा नहीं...)

(करण अपने कमरे की खिड़की से बाहर देख रहा है,
बारिश में सिमरन की परछाई दिखती है।
एक पल के लिए उसका दिल हल्का-सा काँपता है...
पर अगले ही क्षण वो नज़रें फेर लेता है।)

करण (अपने आप से) बोला - 
“मुझे इन जज़्बातों की आदत नहीं... अब नहीं...”

(वो आँखें बंद करता है।
और सिमरन दीवार के सहारे आँसू बहाती है —
धीरे से फुसफुसाती है —)

सिमरन बोली - 
“एक दिन आपको सब याद आ जाएगा करण जी...
क्योंकि प्यार कभी मिटता नहीं...”

(बारिश की बूँदें गिरती हैं,
और दोनों के बीच सिर्फ़ एक “दरवाज़ा” रह जाता है —
जिसके एक ओर शैतान और दूसरी ओर इंसानियत है।)

(रात का वक्त है... बाहर चाँदनी हल्के बादलों में छुपी हुई है।
घर में सन्नाटा है। हवाओं की सरसराहट खिड़कियों से टकरा रही है।)

(सिमरन रसोई में खड़ी है। चूल्हे की लौ धीमे-धीमे जल रही है।
वो थक चुकी है, पर फिर भी ध्यान से खाना बना रही है —
चना दाल, चपाती, और करण की पसंद की कढ़ी।)

(टेबल पर खाना रखकर सिमरन हल्के से मुस्कराती है — जैसे पुराने दिनों की झलक लौट आई हो।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“मुझे याद है... आपको कढ़ी कितनी पसंद थी...”

(करण चुपचाप टेबल पर बैठा है।
वो एक कौर खाता है... स्वाद पहचानता है...
पर चेहरे पर कोई भाव नहीं।)

करण (धीरे स्वर में) बोला - 
“तुम्हारा बनाया खाना... अच्छा है।”

(सिमरन के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“जी शुक्रिया...”

(करण तुरंत अपनी आवाज़ सख्त करता है —)

करण बोला - 
“पर याद रखना... ये सिर्फ़ आज की रात है।
सुबह होते ही... तुम चली जाओगी।”

(सिमरन के होंठ कांपते हैं, पर वो कुछ नहीं कहती।
वो सिर झुकाकर बर्तन समेटने लगती है।
आँखों में आँसू हैं — पर वो रोक लेती है।)

🌙 रात — 12 बजे...

(करण अपने कमरे में है। वो बिस्तर पर लेटा है, पर नींद कोसों दूर है।
तभी दरवाज़े पर धीमी-सी दस्तक होती है — “ठक... ठक...”)

करण (झुंझलाते हुए) बोला - 
“कौन है?”

(वो दरवाज़ा खोलता है — सामने सिमरन खड़ी है, हाथ में तकिया लिए।
उसकी आँखों में हल्का डर, और मासूमियत झलक रही है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“वो... मुझे रात में अकेले सोने से डर लगता है...
क्या मैं यहीं... सो सकती हूँ?”

(करण का चेहरा गुस्से से भर जाता है —)

करण (कड़क आवाज़ में) बोला - 
“ये क्या बचपना है! मैंने साफ़ कहा था — अपने कमरे में रहो!”

(सिमरन चुपचाप सिर झुका लेती है, उसकी आँखें नम हो जाती हैं।
वो मुड़ने लगती है, तभी करण एक पल के लिए रुकता है...
उसका दिल जाने क्यों पिघल जाता है।)

करण (गहरी साँस लेते हुए) बोला - 
“ठीक है... अंदर आ जाओ।
पर ज़्यादा बातें मत करना।”

(सिमरन धीरे से मुस्कराती है और कमरे में दाख़िल होती है।
वो तकिया लेकर बिस्तर के कोने में लेट जाती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“थैंक्यू करण जी...”

(करण बत्ती बुझाता है और अपने हिस्से में जाकर लेट जाता है।
दोनों के बीच एक खामोश दूरी है, पर उस खामोशी में अजीब-सा सुकून है।)

(कुछ पल बीतते हैं — सिमरन की साँसें हल्की-हल्की चलती हैं।
वो गहरी नींद में सो चुकी है।
उसका चेहरा शांति से भरा है।)

(करण करवट बदलकर उसे देखता है।
चाँदनी उसकी नींद में मुस्कुराते चेहरे पर पड़ रही है।
करण का चेहरा थोड़ी देर के लिए नरम पड़ जाता है...)

करण (अपने आप से फुसफुसाते हुए) बोला - 
“क्यों... तुम्हें देखकर ये दिल कुछ याद करने लगता है...”

(वो सिर झटका देता है, और गुस्से से मुँह फेर लेता है।)

करण (धीरे से) बोला - 
“मुझे इन जज़्बातों में नहीं पड़ना...”

(वो भी लेट जाता है, पर उसकी आँखों में नींद नहीं...
बल्कि एक अजीब-सी बेचैनी है।)

“एक बिस्तर पर दो लोग है - 
एक नींद में डूबी मासूमियत...
और एक बेचैन आत्मा...
जो यादों के धुएँ में खुद को खो देने से डर रही थी।”

(कमरे में चाँद की रोशनी और हवा की सरसराहट रह जाती है —
मानो रात भी ये कहानी सुन रही हो...)