कहानी बड़ी बेटी* *लेखिका: वन्दना शर्मा*
आज पार्क में ज्यादा भीड़ नहीं थी। बारिश होने का मौसम हो रहा था। ठंडी हवाएँ चल रही थी। कुछ बच्चे झूला झूल रहे थे। कुछ महिलाएँ बेंच पर बैठी अपनी-अपनी कहानी सुना रही थी।नेहा अभी पार्क में आई थी, आज उसका मन बेचैन हो रहा था तो सोचा पार्क होकर आती हूँ, मूड सही हो जाएगा। एक खाली बेंच देखकर वहीं बैठ गई। बच्चों को खेलता देख कुछ हल्का महसूस हो रहा था। नेहा का मन नहीं था किसी से बात करने का। कुछ देर वो शांत बैठना चाहती थी। सामने बच्चों को खेलता देख उसे भी अपने बचपन की याद आ गई। पाँच-भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। शुरू से उसे त्याग करना, छोटों की देखभाल करना, बड़ों की सेवा करना कुदरती आ गया था। घर की बड़ी बेटी थी ना। ऐसा नहीं कि उसके मम्मी-पापा उसे प्यार नहीं करते थे। प्यार तो बहुत करते थे लेकिन जताना नहीं आता था। जैसा कि अक्सर मध्यमवर्गीय परिवार में होता ही। खर्चे अधिक, आमदनी सीमित। कमाने वाला एक और खाने वाले छः। पैसे की तंगी हमेशा बनी ही रहती। नेहा की मम्मी अक्सर बीमार रहती थी, उन्हें दिल की बीमारी थी तो नेहा को कम उम्र से ही घर का सारा काम सीखना पड़ा। घर में अनुशासन बहुत था। हर काम समय से करो। जल्दी उठो। खुलकर मत हँसो। उसे याद है वह कोई दस साल की ही होगी। उसने सफेद रंग कर रबर बैंड लगा लिया था, बालों में। उसके पापा ने देखा तो उसके बाल पकड़ कर उसे एक थप्पड़ लगा दिया। पढ़ने में मन लगाओ, फैशन में नहीं। काले रंग का ही बैंड सिर में लगाया करो।एक बार उसके घर में पुताई-पेंट का काम हो रहा था। पेंट वाले भैया अंत में सफाई करके नहीं गए थे। नेहा भी बालमन से आलस कर सो गई। उसने भी सफाई नहीं की। रात को लगभग ग्यारह बजे जब उसके पिताजी आए उन्होंने कमरे में जगह-जगह पेंट के निशान देखे तो गुस्से से आग बबूला हो गए। उसे सोते हुए ही को उठाया, एक थप्पड़ मारा, ये सफाई क्यूँ नहीं हुई अभी तक। उठ पहले सफाई कर फिर सोना। उसे बहुत रोना आ रहा था, पर मार के डर से तुरंत सफाई करने लगी।नेहा पढ़ाई में अच्छी थी। हमेशा अच्छे अंकों से पास होती। जब भी वो अपने पापा को बताती कि आज क्लास में उसकी बहुत तारीफ हुई। उसके पिताजी कहते - और मेहनत करो, इतना उड़ने की जरुरत नहीं है। नेहा घबराती नहीं और मेहनत करती। वो चाहती थी बस अपने पिता से प्रशंसा के दो बोल। वो चाहती थी कि उसके पिता उस पर गर्व करें।नेहा अपने पिता का सम्मान करती थी। वो अपने पिता की तरह स्वाभिमानी और कर्मठ बनना चाहती थी। लेकिन शुरू से ही नेहा को घर के कार्यों में रुचि कम थी। उसे लड़कों जैसे बाहर के काम, सब्जी लाना, प्रेस की मरम्मत करना, दरवाजों पर पेंट करना, कुछ नया करना अच्छा लगता।दसवीं कक्षा में बहुत मेहनत करने के बाद भी उसकी द्वितीय श्रेणी ही आई। वो थोड़ा उदास थी कि पिताजी खुश नहीं होंगे। लेकिन इस बार पिताजी ने खुश होकर उसे नई साइकिल दिलाई स्कूल जाने के लिए। क्योंकि उस समय दसवीं क्लास में पास हो जाना भी बहुत बड़ी उपलब्धि होती थी। उस समय बहुत कम बच्चे ही बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते थे।बड़ी बेटी होने के कारण बचपन से ही गंभीर और अनुशासित थी। अपने छोटे भाई-बहन को बहुत प्यार करती थी। उनका काम भी खुशी-खुशी करती। नेहा की एक छोटी बहन और तीन छोटे भाई थे। नेहा अपनी छोटी बहन को बहुत प्यार करती, उसकी सारी इच्छाएँ पूरी करने की कोशिश करती। जब उसके पिताजी दोनों बहनों के लिए कपड़े लाते तो वो पहले छोटी बहन को पसंद करने देती। बाद में बचा हुआ खुद रख लेती।दसवीं क्लास से ही उसे ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। चौथी क्लास की दो लड़कियाँ आती थी पढ़ने। पहली बार जब उसने अपनी मेहनत की फीस ली तो बहुत खुश हुई। कुल छः सौ रुपए मिले उसे। दो सौ रुपए का खाने का सामान ले आई बाजार से सबको पार्टी देने के लिए और चार सौ रुपए की दो मैक्सी दिला दी अपनी माँ को। आज वो बहुत खुश थी। उसने अपनी मेहनत से कमाकर कुछ दिया था अपनी मम्मी को।नेहा हाउसवाइफ बनना नहीं चाहती थी। वो एक वर्किंग वुमेन बनना चाहती थी। अखबार में जो लेख आते, व्यक्तित्व निखार के, कैरियर के, उन्हें खूब ध्यान से पढ़ती और अपने आचरण में उतारती। वो शादी नहीं करना चाहती थी। उसे अपनी पहचान बनानी थी। 12 वीं कक्षा में राहुल सांकृत्यायन का यात्रा वृत्तांत अथाह घुमक्कड़ जिज्ञासा,अरे यायावर याद रहेगा आदि पढ़ा तो उसमें घुमक्कड़ी के फायदे बताए गए थे। लिखा था - लड़कियों को भी घुमक्कड़ी करनी चाहिए। यात्रा करने से नई सोच विकसित होती है। स्वामी विवेकानन्द, गौतम बुद्ध आदि महान संत एक जगह नहीं रुकते थे। यात्रा करते रहते थे। नेहा बड़ी प्रभावित हुई, एक छोटे से शेर से "सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहाँ।"तब उसने सोचा मैं भी घुमक्कड़ बनूँगी। पूरे भारतवर्ष की यात्रा करूँगी। प्रकृति को, उसके नजारों को देखूँगी। पर उसके लिए तो पैसों की जरूरत होगी। ऐसा करती हूँ अध्यापिका बन जाती हूँ। 11 महीने नौकरी करूँगी और एक महीने घूमकर आऊँगी। पर ये सब इतना आसान कहाँ था। उसके घर में बहुत पाबंदी थी। लड़कियों के लिए इतनी स्वतंत्रता नहीं थी। उसके पिताजी ऐसे गाँव से आते हैं जहाँ लड़कियों का ज्यादा नहीं पढ़ाया जाता। जल्दी शादी कर दी जाती है।समय तेजी से बदल रहा था। अब उसके दो छोटे भाई बारहवीं के बाद बाहर दूसरे शहर चले गए थे, पढ़ाई करने। नेहा की एक डिग्री कॉलेज में प्राध्यापिका की जॉब लग गई थी। नेहा कॉलेज में भी सबकी सहायता करती। हँसते-हँसते सबका काम फ्री में ही कर देती। उसका व्यवहार बहुत अच्छा था। वो कोई भेदभाव नहीं करती। चपरासी से लेकर प्राचार्या तक सबको मुस्कराकर अभिवादन करती। सबको नमस्ते करती। कॉलेज में सब उसकी प्रशंसा करते।समय का कुछ पता नहीं रहता कब क्या हो जाए कौन जानता है। नेहा के पापा की तबीयत अचानक खराब हो गई। डॉक्टर ने बेडरेस्ट बता दिया। उसके पिताजी ने दोनों बेटों की पढ़ाई में कोई बाधा ना आए इसीलिए दोनों को मना कर दिया आने से। अब सारी जिम्मेदारियां नेहा के कंधों पर आ गई। आटा पिसवाकर लाना, साग-सब्जी लाना, बिजली का बिल जमा करना, गैस बुकिंग की लाइन में लगना, अपने दो छोटे भाई-बहन को पढ़ाना और अपनी नौकरी भी करना। नेहा ने सारी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। उसे खुशी होती सारा काम दौड़कर करती। कभी अपने लिए नहीं सोचा। उसे अपने ऊपर गर्व होता कि मैं एक बेटे की तरह घर की सारी जिम्मेदारियां निभा रही हूँ।ईश्वर की कृपा से उसके पिताजी एक वर्ष बिस्तर पर रहने के बाद अब स्वस्थ हो चुके थे। उनकी सोच भी अब बदल चुकी थी। उन्हें नेहा पर गर्व था कि नेहा आत्मनिर्भर है।नेहा अब 27 वर्ष की हो चुकी थी। अब उसके पिताजी को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। वो रोज लड़का देखने जाते। नेहा शादी करना नहीं चाहती थी, जब भी वो मना करती शादी करने के लिए तो उसके पिता जी उसे बहुत सुनाते। कभी-कभी बहुत बुरा कहते। रोज-रोज के तानों से दुखी हो नेहा ने शादी के लिए हाँ कह दी। उसने सोचा कि शादी के बाद जो होगा देखा जाएगा, पर ये रोज-रोज के कलेश से तो मुक्ति मिलेगी।स्वाभिमानी नेहा की परेशानियां शादी के बाद भी कहाँ कम हुई थी। उसकी शादी एक रूढ़िवादी परिवार में हुई थी। जहाँ बहू को अधिक स्वतंत्रता नहीं थी। बेचारी सारे दिन काम में लगी रहती, किसी से कुछ ना कहती। एक साल बाद ही उसके एक बेटा हो गया। बच्चे की परवरिश में वो अपना कैरियर तो भूल ही गई। कि उसके भी कुछ सपने थे। लेकिन वो ये त्याग अपने बेटे के लिए कर रही थी। उसे लगा अभी बच्चे को मेरी ज्यादा जरूरत है, उसे समय देना अधिक जरूरी है।लेकिन जैसा हम सोचते हैं वैसा कहाँ होता है। उसने बचपन से अपने खर्चे खुद उठाए थे, उसे अब अपने खर्चों के लिए पति से पैसे माँगते हुए शर्म आती थी। वो सोचती जब उसने अपनी जरूरत के लिए कभी अपने पिता से कुछ नहीं माँगा तो पति से क्यूँ माँगू। उसके पति थोड़ा बहुत घर खर्च के लिए रुपए देते थे। लेकिन वो पैसे घर में ही खर्च हो जाते। उसका कभी किसी ड्रेस के लिए मन करता तो उसे मन मारकर रहना पड़ता।नेहा को अपने ऊपर पैसा खर्च करने में शर्म महसूस होती। वो सोचती कि मेरा पति रात-दिन मेहनत करके पैसे कमाता है, उसे मैं अपने कपड़ों पर या अपने शौक पूरा करने के लिए क्यूँ खर्च करूँ। लेकिन आज तो हद ही हो गई। उसकी छोटी बहन की शादी में उसे अपने मायके जाना था। उसने कभी अपने पति से कुछ नहीं माँगा था। पहली बार उसने अपने पति से शादी में खर्च करने के लिए रुपए माँगे तो उसके पति ने उसको बहुत सुनाया। बोला - घर के खर्च ही इतनी मुश्किल से पूरे होते हैं। कहाँ से लाऊँ रुपए।अब तो बेटा भी बड़ा हो गया। पढ़ी-लिखी हो, कोई जॉब क्यूँ नहीं करती। खुद कमाओ और खर्च करो। मैंने कोई ठेका नहीं ले रखा है। उसका पति तो ऐसा कहकर ऑफिस चला गया। लेकिन नेहा तब से ही परेशान है, बेचैन है। उसका मन रोने को कर रहा था। बड़ी मुश्किल से आँसू रोके थी। बसी इसी बेचैनी को दूर करने पार्क में आई थी। सोच रही थी क्या पैसे कमाना इतना जरूरी है। एक हाउसवाइफ की कोई कद्र नहीं। वो कमाती नहीं लेकिन खुद को खर्च करती है पति के घर को सँवारने के लिए। अपनी पूरी जिंदगी लगा देती है घर बनाने के लिए लेकिन उसके काम की कोई कीमत नहीं। कोई कद्र नहीं। वो पूछना चाहती है इस समाज से कि ऐसा अन्याय क्यूँ। एकएक गृहिणी, एक हाउसवाइफ के त्याग, उसके कार्यों का कोई सम्मान नहीं। नहीं यह गलत है। उसे अपने हक के लिए बात करनी ही होगी। समाज को हाउसवाइफ को सम्मान देना ही होगा। वो गर्व के साथ उठती है और घर की ओर चल देती है।प्रिय पाठकों आपको नेहा की कहानी कैसी लगी, अपनी प्रतिक्रिया जरुर बताएं। क्या आपको नहीं लगता कि हमें आस पास ऐसी जितनी भी नेहा हैं उनको धन्यवाद बोलना चाहिए।---*