kar lo baat in Hindi Poems by Vandna Sharma books and stories PDF | कर लो बात

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कर लो बात

मन की बात और सुनो'मैं सड़क हूँ' ने कहा था - "मैं सबकी हूँ, पर मेरी कोई नहीं।"  ठीक वैसे ही हास्य है।  हँसी सबकी है, पर हँसी की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता।  लोग कहते हैं - "अरे, मजाक था यार।"  पर मजाक ही तो सबसे बड़ा सच बोल जाता है।  ये कविताएँ चुटकुले नहीं हैं।  ये वो ठहाके हैं जो गले में अटक जाते हैं।  क्योंकि हँसते-हँसते आप पहचान जाते हैं कि बात तो आपके ही घर की हो रही है।  यहाँ 'हाथी और छह अंधे' सिर्फ जानवर की कहानी नहीं है।  ये सास-बहू, भाई-भाई, ननद-भाभी की वो रोज की 'व्याख्या' है, जहाँ हर कोई अपना सच पकड़कर बैठा है।  यहाँ 'कड़वा सच' इसलिए कड़वा नहीं कि उसमें जहर है,  बल्कि इसलिए कि हमने मीठे के नाम पर झूठ खाना सीख लिया है।  सड़क की तरह ही हास्य भी सबका बोझ ढोता है।  नेता का पाखंड, दफ्तर की राजनीति, रिश्तों का स्वार्थ, दिखावे का धर्म - सब इस पर से गुजरते हैं।  फर्क सिर्फ इतना है कि सड़क खामोश सहती है, हास्य बोल पड़ता है।  और जब हास्य बोलता है, तो ताली नहीं, चुप्पी गूँजती है।  ========================

सुनो दोस्तो एक दिन क्या हुआ  
एक दिन की मैं सुनाऊं दास्ताँ  
जब हम पांचवी में पढ़ते थे  
स्कूल से घर आ रहे थे  
रस्ते में दिखे दो गधे  
सामने से चले आ रहे थे  
भाई बोला कैसे गधे हैं
ये  रास्ता रोके जा रहे थे 
 मैं बोली भाई गधे सुनते ही नहीं  
शायद गधों के कान नहीं होते  
गधे ने सुन ली मेरी बात
  गधे तो बुरा मान गए  
और सुनो लो कर लो बात  
गधे ने हमें सबक सिखाने की सोची 
 चुपके से जाकर अपने दोस्तों को बुला लाए  
फंस गए हम चौराहे पर  
जिधर देखे उधर गधे  
सोचे हम किधर जाएं  
इधर जाएं उधर जाएं  
गधे ने दुलत्ती मारी तो 
 सीधे स्वर्ग ना पहुंच जाएं  
अब कैसे अपनी जान बचाएं  
भाई गधे कर दो माफ  
घर जाने का रास्ता कर दो साफ
  किस्मत अच्छी थी, बात सच्ची थी
दया गधे को आई  
थोड़ी सी दी जगह दिखाई  
भागे घर को  हम दोनों बहन भाई  
और इस तरह अपनी जान बचाई 
 कर ली तौबा, अब ना कहेंगे 
 गधे को ना दे सुनाई

डॉ वंदना शर्मा 22/6/26=============

कड़वा सचये है दुनिया का,  
'जरूरत' ही सबसे बड़ी होती है।  
मतलब निकलने पर भुला देते हैं लोग,
  सर्दी में धूप अच्छी लगती है,  
यही धूप गर्मी में बड़ी चुभती है  है। 
 सर्दी में पंखों को कोई नहीं पूछता,  
गर्मी होते ही इनकी याद आ जाती है। 
 भरा हो पेट तो पकवान भी अच्छे नहीं लगते,
  भूख जब सताए तो सूखी रोटी भी बड़ा स्वाद देती है।  गुणों की नहीं, धन की कदर होती है यहाँ,  
गरीब की तो किसी को याद नहीं आती है।  
कौन दोस्त, कैसे रिश्ते, सब दिखावा है,  
हो जरूरत तभी किसी की याद आती है।  
जो समय पर ना मिले, व्यर्थ है,  
समय बीत जाने पर अनमोल चीज भी बेकार होती है।  जब तक स्वास्थ्य अच्छा है,  दुनिया घूम लीजिए।  लाठी हाथ में लेकर थके शरीर से,  
कहाँ दुनिया की सैर होती है?  
छोड़ कर, सभी गिले शिकवे,  
जिंदगी जी लीजिए
हर किसी को कहाँ,  जिंदगी आसान होती है। 

 डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली =======.===========

शीर्षक: अष्टांग योग - जीवन का आधार
डॉ वंदना शर्मा21/6/26

डंका आजकल बज रहा है योग का  
अपना फोटो सब पोस्ट कर रहे जोर का  
पर योग है क्या नहीं सब जानते  
सिर्फ आसन को ही योग मानते  
अष्टांग योग एक प्रक्रिया है  
तीसरा चरण इसका आसन है  
मन को पहले पवित्र करो  
बुरे विचारों का त्याग करो  
दया, करुणा, क्षमा का अभ्यास  ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट से दूरी  
समय से उठना, समय से सोना  जिंदगी में अनुशासन, नियम जरूरी 
 स्वस्थ शरीर बने आसन से  
भोजन व स्वाद के लिए प्रत्याहार जरूरी 
 करें प्राणायाम, और ध्यान 
 इनसे होता मन स्वस्थ और प्रसन्न 
 मानसिक बीमारियों से बनी रहे दूरी  
इसीलिए जीवन में अष्टांग योग है जरूरी  
जो इसका करे नियमित पालन 
 उसकी डॉक्टर और दवाई से बनी रहेगी दूरी  
ऋषि-मुनियों का वरदान है ये  
भारत की जीवन शैली दुनिया की शान है ये
  देख सारा दिन मोबाइल,
कमर झुकी, दुनिया की  हुई आँखें खराब,
स्वास्थ्य बेहाल  मोबाइल से थोड़ी दूरी बनाओ 
 जिंदगी में जीना है तो अष्टांग योग अपनाओ  ---

*डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली =======================

सीटी बजा रही है, गाड़ी बुला रही है  
दौड़ो जल्दी-जल्दी,
छूट न जाए  ये गाड़ी न करेगी किसी का इंतजार  
प्लेटफार्म पर है लाखों की भीड़  
सबको अपनी बारी का इंतजार  
चलना ही जिंदगी है चलती ही जा रही है 
 गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है  
कितनी ही दुनिया देखो भागी ही जा रही है 
 जिंदगी की गाड़ी में सभी हैं यात्री 
 आ रहे हैं कुछ तो कुछ जा रहे हैं  
सबकी आंखों में हैं सपने  
अपनों से मिलने की आस बढ़ती ही जा रही है  
जाने कहाँ से, कैसे, क्यों ये भीड़  
दुनिया में बढ़ती जा रही है  
जनरल डिब्बे की भीड़, देख भीड़ की परेशानी 
 एहसास हुआ पैसा कमाना है जरूरी  
जानवरों की भीड़ में मानवता याद आ रही है  
कितनी बेबस है ये भीड़, सहती ही जा रही है 
 देखो अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ती ही जा रही है
  ना जाने कितनी कहानियां कहाँ जा रही हैं  
चलना ही जिंदगी है चलती ही जा रही है  
सीटी बजा रही है, गाड़ी बुला रही है।---

dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi====================
दृष्टिकोण  कविता  

गाँव में एक हाथी आया,  
सब जगह शोर मच गया।  '
हाथी आया, हाथी आया',  
उस भीड़ में छः अंधे  भी देखने आए।  
किसी ने सिर्फ पूँछ पकड़ी, 
 किसी ने सिर्फ सूँड पकड़ी, 
 किसी के हाथ आया कान। 
 तो सबने की अलग व्याख्या 
 हाथी कैसा,समझा जिसने जैसा।
  हमारी दुनिया भी ऐसी है,  
कुछ गलत या सही हो,  
वही एक के लिए गलत,  दूसरे के लिए सही हो।  
जहाँ आज सब व्यस्त हैं  एक-दूसरे की चुगली में -  सास-बहू की, बहू-सास की,  ननद-भाभी की, भाई-भाई की।  जिसकी जैसी सोच, उसे  वैसी ही दुनिया दिखती है।  
स्वार्थ के आगे अंधे हैं यहाँ,  
किसी को खूबी कहाँ दिखती है? 
 बस जरा सी सोच बड़ी करने से  
दुनिया सुंदर बन सकती है।  ---

dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi =================

मैं सड़क हूँ, 
मैं कहीं नहीं जाती  
दुनिया मुझ पर चलती है  
एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं  
और पूछते हैं कभी किसी से  
ये सड़क कहाँ जाती है  
मैं सबको ले जाती हूँ  
सबको मंज़िल तक पहुँचाती हूँ  
पर खुद कहाँ पहुँच पाती हूँ कहीं  
मैं तो ठहरी हूँ वहीं  
कैसी है ये दुनिया  
मतलब निकलने पर भूल जाती है  
ना कोई श्रेय ना कोई शुक्रिया 
मैं कौन तू कौन परिचय भी भूल जाती है  
जैसे अंधा कोई आंख सही होते ही  
सबसे पहले फेंकता है लाठी  
खाना खाते ही शादी में किसी की  
सबसे पहले भागते हैं बराती 
 सच है याद भी किसी की यहाँ 
 किसी को ज़रूरत पड़ने पर आती है  
मैं तो सड़क हूँ, 
मैं कहीं नहीं जाती  
सबको पहुँचाती, सबकी मंज़िल  
खुद स्वयं को हमेशा तन्हा पाती  
भीड़ में जग की मेरी आवाज़ 
 कहीं यूं ही गुम हो जाती  =
==================डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi 

ये जग को क्या हो गया है 
 कविता  
ये जग को क्या हो गया है, 
 हर कोई यहाँ अकेला हो गया है।  
ना कोई तीज-त्योहार अब सुख देता, 
 वो बचपन वाला उत्साह कहीं खो गया है।  
तीज के झूले खो गए,  
राखी का प्यार कहां खो गया है।  
रिश्तों में पैसों की दीवार आ गई,  
आज तो पड़ोसी भी पराया हो गया है।  
बात एक-दूसरे सेकरने में कतराता है आदमी,  
भरोसा किसी पर करना गुनाह हो गया है।  
ये जग को क्या हो गया है,  
भागती-दौड़ती दुनिया की भीड़ में,  
आज इंसान तन्हा हो गया है।  
घर आज फ्लैट हो गया,  
संयुक्त परिवार अब एकल हो गया है।  
खेलों की जगह मोबाइल ने ली,  
आज बचपन कितना बूढ़ा हो गया है।  
जाने किसकी नजर लगी रिश्तों को,
  हर कोई आज अकेला हो गया है।  
ये जग को क्या हो गया है।  ---  
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi '