Money Vs Me - Part 13 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 13

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Money Vs Me - Part 13

मैं उस दिन रात भर ठाकुर साहब के बंगले पर ही था। ठाकुर साहब बिल्कुल अकेले थे, बस एक गार्ड उनके साथ मौजूद था। डॉक्टर ने चिंता जताई थी कि रात में उनके पास किसी का होना ज़रूरी है, इसलिए मुझे वहीं रुकना पड़ा।

सुबह जैसे ही ठाकुर साहब को होश आया, तब औपचारिक रूप से मेरा उनसे परिचय हुआ। अब तक हम दोनों ही एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी थे। मुझसे मिलकर वे कुछ संतुष्ट और निश्चिंत नज़र आ रहे थे। शायद इसलिए कि अचानक ज़रूरत पड़ने पर मैंने उनकी मदद की थी, और वे इस बात से खुश थे।

कॉफी खत्म करने के बाद मैंने उनसे जाने की इजाज़त माँगी। तभी उन्होंने कुछ सोचते हुए मुझसे कहा,
"शितिज... तुम्हारी नौकरी तो इस तरह किसी को व्यक्तिगत रूप से अप्रोच करने की इजाज़त नहीं देती। कहीं मेरी वजह से तुम्हारी नौकरी तो खतरे में नहीं पड़ गई?"

उन्होंने चिंता भरे स्वर में पूछा।

मैं हल्का-सा मुस्कुराया और बोला,
"यही तो मुझे भी चिंता है... लेकिन उससे कहीं ज़्यादा खुशी मुझे इस बात की है कि मैं आपके काम आ सका।"

मेरी बात जैसे सीधे उनके दिल को छू गई, और यही तो मैं चाहता था।

उन्होंने अपनी जेब से एक विज़िटिंग कार्ड निकाला और मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा,
"ये मेरे ऑफिस का पता है। कल वहीं आकर मुझसे मिलना।"

मैंने हैरानी से उनकी ओर देखा तो वे मुस्कुरा दिए। फिर बोले,
"तुम्हारा करियर एक कॉल सेंटर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। तुम इससे कहीं बेहतर नौकरी के हकदार हो।"

उनकी बात सुनकर ऐसा लगा जैसे मेरे भीतर खुशियों की शहनाइयाँ बज उठी हों। मैंने खुशी-खुशी वह कार्ड ले लिया। मेरे लिए वह सिर्फ एक कार्ड नहीं था, बल्कि इस बंगले में दोबारा प्रवेश करने और शायद इस पूरी जायदाद का वारिस बनने की दिशा में पहला कदम भी हो सकता था।

मैंने बड़े उत्साह से कार्ड संभाला और वहाँ से निकल आया।

कमरे पर पहुँचकर सबसे पहले मैंने शॉवर लिया। उसके बाद अच्छा-सा खाना खाया। पिछली रात भले ही मैं एक आरामदायक बिस्तर पर सोया था, लेकिन अपना बिस्तर तो आखिर अपना ही होता है। आज मेरा इरादा चैन की नींद लेने का था।

अजय पहले से ही कमरे में सो रहा था। उसकी भी नाइट शिफ्ट थी।

मैं बिस्तर पर लेटकर अपना फोन चेक करने लगा। देखा तो मेरी टीम लीड की करीब बीस मिस्ड कॉल पड़ी हुई थीं। तभी मुझे याद आया कि पिछली रात मैं बिना किसी को बताए ही निकल गया था। यहाँ तक कि सिस्टम भी शटडाउन नहीं कर पाया था।

मैंने मन ही मन सोचा, "लगता है, अब तो ये नौकरी गई हाथ से।"

लेकिन अगले ही पल मेरे होंठों पर मुस्कान आ गई। मैंने अपनी जेब में रखा वह विज़िटिंग कार्ड हल्के से थपथपाया।

"कोई बात नहीं, शितिज... अब मुझे इस नौकरी की ज़रूरत भी नहीं।"

"सहारा कॉल एंड कस्टमर केयर... अलविदा।"

यह सोचकर मैंने संतोष भरी मुस्कान के साथ आँखें बंद कीं, चादर अपने ऊपर खींच ली और गहरी नींद में खो गया।

मैं पूरे दिन सोता रहा। जब मेरी आँख खुली तो देखा कि अजय अपनी शिफ्ट पर जाने के लिए तैयार खड़ा था। मुझे जागा हुआ देखकर उसने पूछा,

"क्यों भाई, कल रात अचानक कहाँ चला गया था? तेरा टीम लीड तो गुस्से से पागल हो रहा था। तुझे कितनी कॉल्स की उसने। क्या चक्कर है, बॉस? तेरी शिकायत भी कर दी है उसने। आज जाकर ज़रा प्यार से मामला संभाल लेना, कहीं नौकरी हाथ से न निकल जाए।"

"हाँ यार, तू ठीक कह रहा है। चल, तू जा... मैं आता हूँ।"

मैंने उदास-सा चेहरा बनाकर कहा। मैं नहीं चाहता था कि मेरी ज़िंदगी में जो कुछ चल रहा था, उसकी भनक भी किसी और को लगे। मैंने ऐसा दिखाया जैसे इस नौकरी के चले जाने से मेरी पूरी दुनिया उजड़ जाएगी।

अजय भी सिर हिलाते हुए अपनी शिफ्ट के लिए निकल गया।

महीने का आख़िरी समय था। सैलरी आने में अभी कुछ दिन बाकी थे। अगर मैं अभी नौकरी छोड़ देता, तो हो सकता था कि मेरी पूरी तनख़्वाह होल्ड कर दी जाती। जब तक ठाकुर साहब से मुलाक़ात नहीं हो जाती, तब तक खर्च चलाने के लिए इस महीने की सैलरी मेरे लिए ज़रूरी थी।

यही सोचकर मैं रात को समय पर अपनी शिफ्ट में पहुँच गया।

मेरा टीम लीड पहले से ही गुस्से में बैठा मेरा हिसाब खोलकर तैयार था। मैंने मासूम और परेशान-सा चेहरा बनाकर उससे कहा,

"सर, कल रात अचानक मेरे पेट में बहुत तेज़ दर्द उठ गया था। पूरी रात अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा।"

मेरी बात सुनकर उसका गुस्सा थोड़ा शांत हो गया। उसने मुझे चेतावनी भरी नज़र से देखा और फिर अपने काम में लग गया।

मैंने भी अपना कंप्यूटर ऑन किया, हेडफ़ोन कानों पर चढ़ाए और हमेशा की तरह मुस्कुराकर पहली कॉल रिसीव की।

"हेलो, सहारा कस्टमर केयर... हाउ कैन आई हेल्प यू?"

दो दिन बीत चुके थे।

मैंने तय किया कि अब ठाकुर साहब के दिए हुए पते पर जाकर उनसे मिल ही लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वक्त के साथ उन्हें मेरा चेहरा धुंधला पड़ जाए और मेरे हाथ आया यह सुनहरा मौका यूँ ही फिसल जाए।

लेकिन मैं जल्दबाज़ी करने वालों में से नहीं था। अगर अगले ही दिन उनके सामने पहुँच जाता, तो शायद उन्हें यही लगता कि मैंने उनकी मदद किसी स्वार्थ या पहले से बनाई गई योजना के तहत की थी। इसलिए मैंने जानबूझकर दो दिन का फ़ासला रखा... ताकि हर चीज़ बिल्कुल स्वाभाविक लगे।

सोमवार की सुबह मैं बड़े ध्यान से तैयार हुआ। आईने में खुद को एक बार देखा, जेब में रखा वह विज़िटिंग कार्ड उँगलियों से टटोला और गहरी साँस लेकर घर से निकल पड़ा।

करीब आधे घंटे बाद मेरी कैब एक विशाल इंडस्ट्रियल एरिया में आकर रुकी।

"सर... आपकी लोकेशन आ गई।"

ड्राइवर की आवाज़ सुनकर मैंने खिड़की से बाहर देखा... और अगले ही पल मेरी साँस जैसे थम गई।

मेरे सामने आसमान को छूती हुई एक आलीशान काँच की इमारत खड़ी थी। करीब दस मंज़िल ऊँची... जिसकी चमचमाती शीशे की दीवारों पर पड़ती धूप किसी हीरे की तरह चमक रही थी। सबसे ऊपर स्टील के बड़े-बड़े अक्षरों में कंपनी का नाम दमक रहा था—

"सिंह इंटरनेशनल।"

मेरे होंठ अनायास ही हल्के-से खुल गए।

"इतना... बड़ा?"

मैंने तो सिर्फ़ एक अमीर आदमी की कल्पना की थी... लेकिन यह तो एक पूरा साम्राज्य था।

दिल की धड़कनें अनायास तेज़ हो गईं। पहली बार मुझे एहसास हुआ कि जिस खेल में मैं कदम रखने जा रहा हूँ, उसकी बिसात मेरी सोच से कहीं ज़्यादा बड़ी है।

मैंने कैब वाले को पैसे दिए और कुछ पल उस इमारत को निहारता रहा। फिर खुद को संभालते हुए उसके मुख्य द्वार की ओर बढ़ गया।

जितना करीब जाता गया, उसकी भव्यता उतनी ही बढ़ती चली गई। चारों तरफ़ हाई-टेक सिक्योरिटी, कैमरे, इलेक्ट्रॉनिक एक्सेस गेट और अनुशासन का ऐसा माहौल था कि कोई भी पहली नज़र में समझ जाए—यह किसी साधारण कंपनी का दफ़्तर नहीं, बल्कि करोड़ों के कारोबार का मुख्यालय है।

मैंने शीशे का विशाल दरवाज़ा धीरे से खोला।

अगले ही पल ठंडी ए.सी. की हवा का तेज़ झोंका पूरे जिस्म से टकराया। उसके साथ ही एक महंगे परफ्यूम जैसी भीनी-भीनी खुशबू ने मेरा स्वागत किया।

एक पल के लिए लगा मानो मैं किसी कॉर्पोरेट ऑफिस में नहीं, बल्कि किसी पाँच सितारा होटल की लॉबी में आ गया हूँ।

सामने दूर तक फैला चमचमाता इटालियन मार्बल, ऊँची छत से झूलते भव्य झूमर, हर कोने में करीने से सजे विदेशी पौधे और कर्मचारियों की तेज़ लेकिन अनुशासित आवाजाही... हर चीज़ इस बात का ऐलान कर रही थी कि यहाँ सिर्फ़ पैसा नहीं, रुतबा भी रहता है।

मुख्य प्रवेश द्वार के दाईं ओर एक विशाल रिसेप्शन डेस्क था। उसके पीछे कंपनी की नीले रंग की स्मार्ट यूनिफॉर्म पहने दो बेहद खूबसूरत युवतियाँ पेशेवर मुस्कान के साथ अपने-अपने सिस्टम पर काम कर रही थीं।

मैंने एक बार अपनी साधारण-सी शर्ट की ओर देखा... फिर सामने फैली उस शानो-शौकत पर नज़र डाली।

अनजाने में ही मेरे कदम कुछ पल के लिए ठिठक गए।

यही वह दुनिया थी... जिसमें दाख़िल होने का सपना मैंने कभी देखा भी नहीं था।

मैंने हिम्मत जुटाई और रिसेप्शन डेस्क की ओर कदम बढ़ा दिए।

जैसे ही मैं करीब पहुँचा, दोनों में से एक लड़की ने स्क्रीन से नज़र उठाई। उसके चेहरे पर वही पेशेवर मुस्कान थी, जो शायद हर आने वाले मेहमान के लिए तय थी।

"गुड मॉर्निंग, सर। हाउ मे आई हेल्प यू?"

उसकी मधुर आवाज़ सुनकर मैं एक पल के लिए झिझक गया। इतने बड़े ऑफिस में आने का यह मेरा पहला अनुभव था। लेकिन अगले ही पल मैंने खुद को संभाला और जेब से वह विज़िटिंग कार्ड निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया।

"म... मुझे ठाकुर साहब से मिलना है। उन्होंने ही बुलाया है।"

लड़की ने कार्ड पर एक नज़र डाली। जैसे ही उसकी निगाह कार्ड पर लिखे नाम पर पड़ी, उसके चेहरे के भाव हल्के-से बदल गए। उसने तुरंत अपनी साथी की ओर देखा और फिर दोबारा मेरी तरफ़।

"डू यू हैव एन अपॉइंटमेंट, सर?"

उसके सवाल पर मैं एक क्षण के लिए चुप रह गया।

अपॉइंटमेंट?

उस बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था।

मैंने हल्की-सी मुस्कान के साथ जवाब दिया,
"नहीं... उन्होंने खुद मुझे आने के लिए कहा था।"

रिसेप्शनिस्ट ने विनम्रता से सिर हिलाया और तुरंत इंटरकॉम का रिसीवर उठा लिया।

"वन मोमेंट, सर।"

उसकी उँगलियाँ तेजी से कुछ नंबर डायल करने लगीं।

मैं सामने खड़ा पूरे ऑफिस को देख रहा था, लेकिन मेरा ध्यान बार-बार उसी फोन की तरफ़ जा रहा था।

कुछ सेकंड बाद दूसरी तरफ़ से कॉल रिसीव हुई।

"गुड मॉर्निंग, सर... यहाँ रिसेप्शन पर मिस्टर शितिज Uday sir से मिलने आए हैं।"

मेरे कान अनायास ही चौकन्ने हो गए।

कुछ पल तक वह दूसरी तरफ़ की बात सुनती रही।

और मेरी तरफ़ मुड़ी।

उसके चेहरे पर अब पहले वाली औपचारिक मुस्कान तो थी, लेकिन उसमें हल्की-सी झिझक भी शामिल हो चुकी थी।

"आई एम सॉरी, सर..."

मेरे कदम वहीं रुक गए।

"जी...?"

"उदय सर अभी ऑफिस में नहीं हैं।"

मेरे चेहरे की मुस्कान जैसे उसी पल गायब हो गई।

"क... कहाँ गए हैं?"

"सर, दो दिन पहले ही वे भारत से बाहर चले गए। उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए उनकी फैमिली उन्हें कुछ दिनों के लिए अमेरिका ले गई है।"

उसकी बात मेरे कानों से टकराई...

और ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे सीने के भीतर एक के बाद एक छोटे-छोटे धमाके कर दिए हों।

अमेरिका...?

यानी... ठाकुर साहब देश में ही नहीं थे।

एक पल में मेरे सारे सपने जैसे हवा में लटक गए।

मेरे दिमाग़ में सिर्फ़ एक ही सवाल घूम रहा था—

अगर... अगर उन्होंने वहीं अपनी फैमिली के साथ रहने का फैसला कर लिया तो...?

तो मेरा क्या होगा...?

मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला।

"अ... अच्छा... क्या आप बता सकती हैं कि वो वापस कब तक आएँगे?"

मेरी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे खुद अजनबी-सी लगी।

रिसेप्शनिस्ट ने अफसोस से सिर हिलाया।

"सॉरी, सर। अभी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। हाँ... अगर आप चाहें तो एक हफ्ते बाद फिर संपर्क कर सकते हैं। हो सकता है तब तक सर वापस आ जाएँ।"

एक हफ्ता...

उस वक्त मुझे वह एक हफ्ता नहीं, बल्कि एक पूरी उम्र जैसा लगा।

मैंने फीकी-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया।

"थैंक यू..."

बस इतना ही कह पाया।

मेरे कदम अपने-आप मुड़ गए।

कुछ देर पहले जिस रास्ते पर चलते हुए हर चीज़ मुझे किसी सपने जैसी लग रही थी, अब वही चमचमाते फर्श, वही शीशे की दीवारें और वही आलीशान ऑफिस मुझे जैसे मेरा मज़ाक उड़ाते हुए महसूस हो रहे थे।

मैं धीरे-धीरे बाहर निकल आया।

बिल्डिंग से बाहर कदम रखते ही तेज़ धूप मेरे चेहरे पर पड़ी, लेकिन उसके बावजूद मुझे भीतर एक अजीब-सी ठंड महसूस हो रही थी।

मैंने एक बार पलटकर उस विशाल इमारत की तरफ़ देखा।

कुछ मिनट पहले तक यही इमारत मुझे अपनी मंज़िल लग रही थी...

और अब वही मंज़िल मेरी पहुँच से हजारों किलोमीटर दूर, अमेरिका चली गई थी।

मैंने गहरी साँस छोड़ी और होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आ गई।

"लगता है... किस्मत को अभी भी मेरे साथ खेलना पसंद है।"

यह सोचकर मैंने दोनों हाथ जेब में डाले और भारी कदमों से सड़क की ओर बढ़ गया।

"यस, सर... राइट अवे।"