Bayaan - Part 18 in Hindi Love Stories by Radha rani Jha books and stories PDF | Bayaan - Part 18

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Bayaan - Part 18

Part 18  

डायरी का आखिरी पन्ना...

मेरे हाथ अब काँपने लगे थे। पता नहीं क्यों... ऐसा लग रहा था कि मैं सिर्फ़ किसी की कहानी नहीं पढ़ रही, बल्कि किसी की पूरी ज़िंदगी जी रही हूँ।

मैंने आखिरी पन्ना खोला...

"उस दिन के बाद..."

एक दिन अभिन्नव मेरे घर आए।

ज़्यादा देर तो नहीं रुक पाए, लेकिन जितनी देर रहे... मेरी पूरी दुनिया वहीं थम गई थी।

हमने बहुत सारी बातें कीं।

हँसे...

एक-दूसरे को देखा...

भविष्य के सपने देखे...

और कब समय निकल गया, पता ही नहीं चला।

लेकिन जब उनके जाने का समय आया...

न जाने क्यों मेरा दिल घबराने लगा।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरी सबसे प्यारी चीज़ मुझसे दूर जा रही हो।

मैं उन्हें बस जाते हुए देखती रही।

मेरी आँखों में आँसू आ गए।

मैं बार-बार यही सोच रही थी...

"अब पता नहीं अगली बार कब मिलेंगे..."

मैंने अपने आँसू छिपाने की बहुत कोशिश की...

लेकिन शायद...

प्यार में कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता।

उन्होंने सब देख लिया।

उस दिन उन्होंने कुछ नहीं कहा...

बस मुस्कुराकर चले गए।

लेकिन शायद...

उसी दिन कुछ बदल गया था।

उस दिन के बाद अभिन्नव पहले जैसे नहीं रहे।

अब उन्हें मेरी छोटी-सी छोटी बात की चिंता होने लगी।

मैंने खाना खाया या नहीं...

मैं ठीक हूँ या नहीं...

मैं रो तो नहीं रही...

मैं पढ़ाई कर रही हूँ या नहीं...

हर बात का ध्यान रखने लगे।

सबसे बड़ी बात...

उन्होंने अपनी हर गलती के लिए मुझसे माफ़ी माँगनी शुरू कर दी।

वो अक्सर कहते—

"मुझे माफ़ कर देना... मैंने तुम्हें बहुत रुलाया है।"

मैं हर बार हँसकर कहती—

"अब पुरानी बातें छोड़ दीजिए।"

लेकिन वो नहीं भूलते थे।

उन्हें हर उस आँसू का पछतावा था...

जो मेरी वजह से नहीं...

बल्कि उनकी वजह से निकला था।

अब वो मुझे अपनी दुनिया से अलग नहीं रखते थे।

मैं ही उनकी दुनिया बन गई थी।

हम अपनी हर खुशी...

हर परेशानी...

हर सपना...

एक-दूसरे से बाँटने लगे।

अब मुझे भी लगने लगा था...

जिस इंसान का मैंने सपना देखा था...

भगवान ने उसे सच में मेरे लिए बदल दिया है।

एक दिन मैंने उनसे पूछा—

"आप अचानक इतने बदल कैसे गए?"

उन्होंने बिना सोचे जवाब दिया—

"जिस दिन मैंने तुम्हारी आँखों में अपने लिए आँसू देखे थे... उसी दिन समझ गया कि इस दुनिया में तुमसे ज़्यादा मुझे कोई प्यार नहीं कर सकता। उस दिन से मैंने फैसला कर लिया कि अब तुम्हारी आँखों में आँसू आएँगे तो सिर्फ़ खुशी के। और आज... मैं तुमसे इतना प्यार करता हूँ, जितना शायद तुम कभी सोच भी नहीं सकती।"

उनकी यह बात सुनकर मैं बहुत देर तक कुछ बोल ही नहीं पाई।

बस उन्हें देखती रही...

और मन ही मन भगवान का धन्यवाद करती रही।

अब हमारा सिर्फ़ एक ही सपना था...

सफल होना।

क्योंकि हम दोनों जानते थे...

जब तक अपने पैरों पर खड़े नहीं होंगे...

हमारी शादी कभी नहीं हो पाएगी।

हमारा रिश्ता आसान नहीं था।

दुनिया हमें गलत समझती।

समाज सवाल उठाता।

लेकिन हमने फैसला कर लिया था...

पहले खुद को सफल बनाएँगे...

फिर अपने प्यार को दुनिया के सामने सम्मान से खड़ा करेंगे।

देखते ही देखते...

छह-सात साल गुजर गए।

इन सालों में हमारी बातें पहले से कम हो गईं।

मिलना लगभग बंद हो गया।

दोनों अपने-अपने काम और सपनों में जुट गए।

दिनभर मेहनत करते...

थक जाते...

लेकिन रात को चाहे पाँच मिनट ही सही...

एक-दूसरे की आवाज़ सुने बिना नींद नहीं आती थी।

अभिन्नव मुझे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते।

और मैं भी हर दिन यही सोचकर मेहनत करती...

कि एक दिन मैं उनकी पत्नी बनूँगी।

इस बीच मुश्किलें भी बहुत आईं।

लेकिन अब मैं पहले वाली पंद्रह साल की राधा नहीं रही थी।

ज़िंदगी ने मुझे समय से पहले बड़ा बना दिया था।

अब दर्द मुझे रोकता नहीं था...

मज़बूत बनाता था।

आखिरकार...

हम दोनों ने अपने-अपने लक्ष्य पूरे कर लिए।

हम दोनों अपने पैरों पर खड़े हो गए।

अब बारी थी...

उस सपने की...

जिसके लिए हमने इतने साल इंतज़ार किया था।

शादी।

सबसे कठिन काम था...

अपने परिवारों को मनाना।

लगभग एक महीना लग गया।

किसी ने हाँ नहीं की।

बहुत बातें सुननी पड़ीं।

बहुत आँसू बहे।

कई बार लगा...

शायद इस बार हार जाएँगे।

लेकिन हमने हार नहीं मानी।

आखिरकार...

दोनों परिवार मान गए।

और फिर...

जिस दिन का इंतज़ार हमने वर्षों तक किया था...

वह दिन आ ही गया।

मैं दुल्हन बनकर उनके सामने पहुँची।

उन्होंने मुझे देखा...

और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

वो रो रहे थे...

इतना कि मैं उन्हें संभाल ही नहीं पा रही थी।

उन्हें रोता देखकर...

मेरी आँखों में भी आँसू आ गए।

लेकिन इस बार ये आँसू दर्द के नहीं थे...

ये जीत के आँसू थे।

हमने एक-दूसरे का हाथ थामा...

और हमेशा के लिए एक हो गए।

डायरी की आखिरी पंक्तियाँ...

"अगर तुम यह डायरी पढ़ रहे हो... तो अपने प्यार से कभी हार मत मानना।

सिर्फ़ प्यार कर लेना बड़ी बात नहीं होती...

सिर्फ़ उसे निभा लेना भी बड़ी बात नहीं होती...

सबसे बड़ी बात होती है... उस प्यार के लिए खुद को बेहतर बनाना, अपने माता-पिता का सपना पूरा करना, अपने रिश्ते को सम्मान देना और सही समय का इंतज़ार करना।

अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है... तो भगवान तुम्हें मिलाने का रास्ता ज़रूर बनाएँगे।"

इतना पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखों से भी आँसू बहने लगे।

मैंने धीरे से डायरी बंद की।

तभी मुझे एहसास हुआ...

यह डायरी मुझे जहाँ मिली थी...

शायद राधा ने जानबूझकर वहीं छोड़ दी थी।

वह अपनी बीती हुई यादों को हमेशा के लिए वहीं छोड़ देना चाहती थी।

क्योंकि अब उसे नई यादें बनानी थीं...

अपने अभिन्नव के साथ।

यह डायरी मेरे लिए नहीं लिखी गई थी।

यह उस हर इंसान के लिए लिखी गई थी...

जो कभी सच्चा प्यार करेगा।

मैंने आज एक बात सीखी...

राधा ने सिर्फ़ प्यार नहीं किया...

उस प्यार के लिए खुद को बदला...

पढ़ाई की...

सफल हुई...

अपने माता-पिता का सपना पूरा किया...

और अपने रिश्ते को सम्मान दिलाया।

उधर अभिन्नव ने भी सिर्फ़ प्यार नहीं किया...

उन्होंने अपने गुस्से को बदला...

खुद को बदला...

अपने माता-पिता का सिर गर्व से ऊँचा किया...

और राधा के लायक इंसान बने।

शायद...

इसीलिए भगवान ने आखिरकार उन्हें मिला दिया।

डायरी के बिल्कुल आख़िर में, एक छोटी-सी मुस्कुराती हुई स्माइली बनी थी।

उसके नीचे सिर्फ़ एक आखिरी लाइन लिखी थी—

"जितना अभिन्नव मुझसे प्यार करता है... उतना शायद इस दुनिया में कोई नहीं कर सकता।" ❤️📖