समय का चक्र_ एक रियासत के अंत की कहानी
बात उस समय की है जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था। छोटी-छोटी रियासतें हुआ करती थीं। रियासतें क्या साहब यूं कहिए अंग्रेज जिस कर्मचारी से खुश हो जाते उसे जमीन के एक बड़े भू-भाग का स्वामी बना देते।
ऐसे ही एक थे रामप्रसाद आर्य। उन्होंने एक डूबते अंग्रेज बच्चे की जान बचाई थी। वो बच्चा था किसी अंग्रेज गवर्नर का। तो उन्होंने उपहार स्वरूप बहुत सी जमीन देकर रामप्रसाद को जमीदार बना दिया एक गाँव का।
अब पूरे गाँव में उसका दबदबा था। सब्जी मंडी का भाव भी वही महाशय तय करते। गाँव के सभी फैसले वही सुलझाते। गाँव में एक प्राइमरी विद्यालय भी खोल दिया अपने नाम पर रामप्रसाद प्राथमिक विद्यालय।
समय का चक्र तो चलता रहता है। एक जगह कहाँ रुकता है। समय ही तो है, गुजर जाता है, चाहे अच्छा हो या बुरा। विधि का लेख तो सिर्फ विधाता ही जानता है।
रामप्रसाद की पहली बीवी बच्चा होते ही मर गई। उसने बच्चा पालने के लिए दूसरी शादी की, वो भी कुछ ही महीने बाद मर गई। बच्चा अभी छोटा था, तो फिर तीसरी शादी की, वो भी डेढ़ साल बाद चल बसी। शायद रामप्रसाद के नसीब में बीवी का सुख नहीं था।
रामप्रसाद ने बच्चे की देखभाल के लिए एक आया को नियुक्त किया। गाँव वाले बताते हैं कि रामप्रसाद के परिवार को किसी साधु का श्राप लगा हुआ है, कई पीढ़ियों से बस एक ही संतान हो रही है। देखभाल के लिए रखा था पास के ही गाँव की शोभा चाची को।
समय बीतता गया। रामप्रसाद के लड़के का नाम था भानु प्रसाद। घर में और कोई प्राणी नहीं था और न ही कोई रिश्तेदार। शोभा चाची ने राम प्रसाद से थोड़ी सी जगह गाय बांधने के लिए मांग ली। राम प्रसाद ने सोचा ज़रा सी जगह ही तो मांग रही है तो उसने हां कर दी । रामप्रसाद ने शोभा चाची से कहा, कि वो अपने परिवार को ले आएं। चाची ने भी अपने बेटे, पति के साथ अपना बोरिया-बिस्तर उठाया और आ गईं। कुछ दिन बाद शोभा चाची ने कहा कि जमीदार साहब मुझे भी थोड़ी सी जमीन दे दीजिए। रामप्रसाद ने भी बिना सोचे हाँ कर दी।
और क्या था। चाची ने उसी जमीन पर पूरे खानदान को बुला लिया। पूरा परिवार उसी जमीन पर बस गया। शोभा चाची का परिवार बढ़ता गया और राम प्रसाद की जमीन घटती गई। बड़े होने पर भानु प्रसाद की शादी हुई। उनके भी बस एक ही लड़का हुआ। उसका नाम रखा गया ब्रजभानु। रामप्रसाद की मृत्यु तक शोभा चाची ने उनकी आधी जमीन कब्जा ली। और अपना कुनबा बसा लिया।
भानुप्रसाद बड़े आलसी थे। सारा दिन बैठक में पड़े सोते रहते और गपशप करते। परचून की एक दुकान खोल ली और उस पर नौकर बैठा दिया। खुद सारे दिन चौपाल लगाते, पंचायतें बैठते और अपनी झूठी शान के किस्से सुनाते। कभी जाकर नहींदेखा कि उनके बाप दादा की कितनी जमीन थी और अब कितनी बची
एक दिन ऐसी ही किसी शाम अचानक हृदय गति रुकने से भानु प्रसाद की भी मृत्यु हो गई। किसी चुटकुले पर बहुत देर तक हंसते ही जा रहे थे ।हंसी रुक ही नहीं रही थी । हंसते ही जा रहे थे हंसते ही जा रहे थे ।लेकिन उनकी जिंदगी की सांस जरूर रुक गई थी। हंसते-हंसते बेचारे भानु प्रसाद ईश्वर को प्यारे हो गए।अब विधि के विधान को कौन डाल सकता है।
ब्रजभानु बहुत ही धार्मिक व्यक्ति थे उनकी बीवी केलावती भी बहुत ही धर्म परायण और पूजा पाठी थी।ब्रजभानु तड़के ही 3:00 बजे ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते और नाम जप करने लगते। सफाई के मामले में बहुत सनकी थे। अपने ही गिलास से पानी पीते। जहां भी जाते अपना ग्लास साथ लेकर जाते। कभी किसी के घर खाना नहीं खाते ।तीनों समय नाम जप करते। नहाते समय नल के पास किसी को नहीं आने देते ।खुद नल की चबूतरी की सफाई करते ।अपनी बाल्टी लोटा धोते और एक घंटा उनका स्नान व साधना का कार्यक्रम चलता ।खाना भी कांसे के बर्तन में ही खाते और उनके बर्तनों में कोई नहीं खा सकता था ।हमेशा सफेद धोती कुर्ता पहनते ।आठवीं पास करने के बाद अपने स्कूल में प्राध्यापक हो गए।
बृजभानु की शादी हो गई। कुछ समय बाद उनका एक बेटा हुआ। नाम रखा गया सुरेश। सुरेश लाड प्यार मे पला तो वो भी बहुत आलसी था। 12वीं पास करते ही घर वालों ने सुरेश की शादी कर दी। सुरेश की बीबी अनपढ़ थी लेकिन हिसाब की बहुत तेज थी एक-एक रुपए का बहुत हिसाब रखती थी ।उसकी बीवी का नाम शारदा था। बहुत ही तेज थी। हिसाब-किताब में बड़ी तेज।
बृजभानु अब बूढ़े हो चले थे। घर का काम काज सब शारदा देखती थी। बृजभानु को भगवान का नाम जपने के अलावा कोई काम नहीं था। बृजभानु को रसमलाई खाने का बड़ा शौक था। गाँव में एक हलवाई के यहाँ रसमलाई बनती थी। बृजभानु अक्सर वहाँ जाते और एक प्लेट रसमलाई खाते थे। शारदा को ये बात पसंद नहीं थी। शारदा ने अपने पति से कहकर ससुर का बाजार जाना बंद करवा दिया।
बृजभानु बहुत उदास रहने लगे। ब्रजभानु आजाद पछी थे । वह बहू की पराधीनता न स्वीकार कर सके। और कुछ समय बाद ही इसी सदमे में बृजभानु भगवान को प्यारे हो गए।
सुरेश और शारदा के दो बेटे हुए। कई पीढ़ियों के बाद एक साथ दो बेटे हुए थे। घर में खुशी का उत्सव मनाया गया। बहुत दान पुण्य किया गया।सुरेश अब गाँव में नहीं रहता था। शहर में नौकरी करने चला गया था। उसने अपनी बची-खुची जमीन बेचकर शहर में छोटा सा घर ले लिया था।
कहते हैं कि किसी खानदान की अमीरी तीन पीढ़ियों तक ही रहती है। चौथी पीढ़ी सारा धन लूट देती है और गरीब हो जाती है। गरीबी से अमीरी का संघर्ष पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।
सुरेश के दोनों बेटे लाड़-प्यार में बिगड़ गए। पुरखों की सारी जमीन बिक गई ।सुरेश की चिंता बढ़ती जा रही थी। और इसी चिन्ता के कारण चिंता करते-करते सुरेश भी चल बसा।
शारदा अकेली रह गई। वो उस घर को निहारती रहती जिसमें कभी रियासत हुआ करती थी। समय के चक्र ने एक रियासत का अंत कर दिया।
समय का पहिया चलता है
दिन ढलता है रात आती है
सारी रियासत फ्री में चली गई
मिट गए सारे वंश, साथ नहीं कुछ जाता है
समय का पहिया चलता है
पीढ़ी दर पीढ़ी ये कथा चलती आती है
बिना मेहनत सब लुट जाता है
करो परिश्रम, धरोहर बच जाती है
समय का पहिया चलता है _
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली