Amrut Vaani in Hindi Anything by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 18

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अमृत वाणी - संत वाणी - 18

हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे जीवन में दुख इसलिए है क्योंकि हमारे पास साधनों की कमी है। लेकिन अगर हम ईमानदारी से अपने मन की जांच करें, तो हमें पता चलेगा कि हम अपने दुखों से उतने दुखी नहीं हैं, जितने दूसरों के सुखों को देखकर दुखी होते हैं। पड़ोसी की नई गाड़ी, दोस्त का नया प्रमोशन या सोशल मीडिया पर किसी की चकाचौंध देखकर हमारा मन अंदर ही अंदर सुलगने लगता है। इस मानसिक बीमारी को संत सुंदरदास जी ने बहुत ही करारे शब्दों में समझाया है:

“पर सुख देखि न सकत जिय, जरि-बरि होवत छार।
सुंदर ऐसे मनुष को, धिक्कार है संसार॥”
— संत सुंदरदास

(अर्थ: जो मनुष्य दूसरों के सुख को देखकर अपने जी (मन) में जल-भूनकर राख (छार) हो जाता है, सुंदरदास जी कहते हैं कि ऐसे ईर्ष्यालु मनुष्य के जीवन पर इस संसार में धिक्कार है।) 

इस तीखी वाणी को सुनकर लोग अक्सर एक अजीब विरोधाभास में उलझ जाते हैं। वे सोचते हैं कि “कॉम्पिटिशन (प्रतियोगिता) के इस दौर में यदि हम दूसरों को देखकर आगे बढ़ने की होड़ नहीं रखेंगे, तो हम तो पीछे छूट जाएंगे। क्या दूसरों से आगे निकलने की चाहत रखना या उनके जैसा बनना गलत है? क्या सुंदरदास जी हमें आगे बढ़ने की इच्छा रखने से मना कर रहे हैं?”

लेकिन यहाँ आगे बढ़ने की इच्छा (Ambition) का विरोध नहीं है। सुंदरदास जी हमें अपनी प्रगति रोकने के लिए नहीं कह रहे, बल्कि वे हमें उस ‘जलन और ईर्ष्या’ से बचा रहे हैं जिसे आधुनिक मनोविज्ञान में ‘मैलिसियस एनवी’ (Malicious Envy) कहा जाता है। यह एक ऐसी मानसिक सड़न है जहाँ इंसान खुद आगे बढ़ने की मेहनत नहीं करता, बल्कि सिर्फ यह दुआ करता है कि सामने वाले का सब कुछ बर्बाद हो जाए। यह वाणी हमें दूसरों को गिराने की दौड़ से हटाकर, खुद को उठाने की प्रेरणा देती है।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप अपने दैनिक जीवन के एक बेहद सीधे और व्यावहारिक उदाहरण से समझ सकते हैं। फर्ज़ कीजिए कि दो धावक (Runners) एक रेस ट्रैक पर दौड़ रहे हैं।

पहला धावक अपनी पूरी ताकत लगाता है, सीधे अपनी मंज़िल की ओर देखता है और अपनी रफ्तार बढ़ाता है। वह आगे निकल जाता है।

दूसरा धावक दौड़ते समय बार-बार अपनी गर्दन मोड़कर पहले धावक को देखता है। वह मन ही मन जलता है कि “यह मुझसे आगे कैसे है?” और गुस्से में आकर पहले वाले को पैर फंसाकर गिराने की कोशिश करता है। इस चक्कर में उसका खुद का संतुलन बिगड़ जाता है, वह मुंह के बल गिरता है और रेस से बाहर हो जाता है।

हमारा यह जीवन भी उस रेस ट्रैक की तरह है। जब आप अपनी ऊर्जा को दूसरों से जलने में या उन्हें नीचे खींचने में बर्बाद करते हैं, तो आपके खुद के बढ़ने की रफ्तार खत्म हो जाती है। विज्ञान और न्यूरोसाइंस भी यही कहता है कि जब मन में ईर्ष्या पैदा होती है, तो दिमाग में ‘कोर्टिसोल’ और ‘एड्रेनालिन’ जैसे तनाव के हार्मोन्स का सैलाब आ जाता है। यह ज़हर आपकी रातों की नींद, आपका हाजमा और आपकी निर्णय लेने की क्षमता को नष्ट कर देता है। आप खुद को अंदर ही अंदर ‘राख’ (छार) करने लगते हैं। 

शंका का तार्किक समाधान
अब यहाँ एक व्यावहारिक और न्यायसंगत सवाल उठता है जो हमारी पिछली चर्चा से जुड़ा है : “यदि कोई बुरा इंसान बेईमानी करके, दूसरों को लूटकर या गलत रास्ते से बहुत अमीर या कामयाब हो गया हो, और उसे देखकर हमारे मन में गुस्सा या असंतोष आए, तो क्या वह भी ईर्ष्या है? क्या वहाँ भी हमें शांत रहना चाहिए?”

विरोधाभास तब दूर होता है जब आप ‘ईर्ष्या’ और ‘विवेक’ का अंतर समझ लेते हैं। यदि कोई गलत रास्ते से आगे बढ़ा है, तो उसके प्रति मन में जलन पालना मूर्खता है, क्योंकि कर्म का अटल सिद्धांत और देश का कानून देर-सबेर उसे उसके कर्मों का दंड निश्चित रूप से देगा। किसी पापी के वैभव को देखकर कुढ़ना नहीं है।

संतों का मार्ग यहाँ दो बातें सिखाता है :
• अन्याय का विरोध करें, जलन नहीं : यदि कोई बेईमानी कर रहा है, तो कानून के दायरे में रहकर उसका डटकर विरोध करना आपका कर्तव्य है। लेकिन रात को बिस्तर पर लेटकर उसके सुखों के बारे में सोच-सोचकर अपनी नींद खराब करना बेवकूफ़ी है।

• सच्ची प्रेरणा (Benign Envy) : यदि कोई व्यक्ति अपनी ईमानदारी, मेहनत और अच्छे चरित्र के बल पर आगे बढ़ा है, तो उससे जलने के बजाय उसे अपना गुरु या प्रेरणा स्रोत बनाइए। खुद से कहिए कि “यदि यह मेहनत करके सफल हो सकता है, तो मैं भी पूरी ईमानदारी से पसीना बहाऊँगा और आगे बढ़ूँगा।”

आज की ज़िंदगी के लिए व्यावहारिक सूत्र
★ सोशल मीडिया डिटॉक्स: यदि किसी की तस्वीरें या चकाचौंध देखकर आपके मन में अशांति या हीनभावना आती है, तो ऐसी प्रोफाइल्स को देखना तुरंत बंद करें। अपनी शांति सबसे पहले है।

★ अपनी थाली पर ध्यान दें: रोज़ सुबह उठकर उन चीज़ों की सूची मन में दोहराएं जो ईश्वर ने आपको दी हैं। जब आप अपनी खुशियों के प्रति कृतज्ञ (Gratitude) होंगे, तो दूसरों का वैभव आपको परेशान नहीं करेगा।

★ सराहना करना सीखें: यदि आपका कोई दोस्त या सहकर्मी अपनी मेहनत से कामयाब होता है, तो आगे बढ़कर उसे दिल से बधाई दें। दूसरों की खुशी में खुश होना, मन को अंदर से बहुत बड़ा और शांत बना देता है।

आज की पावन प्रार्थना
“हे करुणामय परमात्मा! मुझे ऐसा निर्मल मन दीजिए कि मैं किसी के भी सुख, धन या ऊंचे पद को देखकर कभी भी अपने भीतर ईर्ष्या का ज़हर पैदा न होने दूँ। मुझे अपनी तरक्की के लिए पूरी ईमानदारी से मेहनत करने का सामर्थ्य दीजिए। प्रभु, ऐसी कृपा बनाए रखना कि मेरी प्रतियोगिता केवल खुद से हो और मैं हर आने वाले दिन के साथ एक बेहतर इंसान बन सकूँ।”