Amrut Vaani in Hindi Spiritual Stories by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 21

Featured Books
Categories
Share

अमृत वाणी - संत वाणी - 21

हम अक्सर सोचते हैं कि बहुत बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान कर लेना, शरीर पर विशेष तरह के तिलक लगा लेना, या दिन-भर केवल मंदिर-मस्जिद के चक्कर काट लेना ही सबसे बड़ी भक्ति है। हम बाहर से तो बहुत बड़े भक्त दिखाई देते हैं, लेकिन हमारे भीतर दूसरों के लिए नफरत, ईर्ष्या, लालच और गुस्सा वैसा का वैसा ही बना रहता है। इस बाहरी दिखावे और असली आंतरिक भक्ति के अंतर को संत सिंगाजी ने अपनी मालवी/निमाड़ी मिश्रित भाषा में बहुत ही सीधे शब्दों में समझाया है:

“मन कूं न रंगाया, रंगाया तुम चोला।
कहैं सिंगाजी सुनो भाई साधो, तुम तो मुख से राम-राम बोला॥”
— संत सिंगाजी

इस वाणी को सुनकर लोग अक्सर एक अजीब विरोधाभास में उलझ जाते हैं। वे सोचते हैं कि क्या संत सिंगाजी हमें पूजा-पाठ करने, अच्छे कपड़े पहनने या प्रभु का नाम लेने से मना कर रहे हैं? क्या मंदिर जाना या माला जपना पूरी तरह व्यर्थ है?

लेकिन यहाँ साधना का विरोध नहीं है। सिंगाजी हमें पूजा छोड़ने के लिए नहीं कह रहे, बल्कि वे हमें उस ‘धोखे’ से बचा रहे हैं जो हमारा मन हमारे साथ ही करता है। वे समझा रहे हैं कि कपड़ों का रंग बदल लेना बहुत आसान है, लेकिन अपने ‘मन के रंग’ (कुविचारों) को बदले बिना की गई कोई भी पूजा केवल एक नाटक है। यह वाणी हमें दिखावे से हटाकर हमारे चरित्र को शुद्ध करने की प्रेरणा देती है।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप अपने दैनिक जीवन के एक बेहद सादे और व्यावहारिक उदाहरण से समझ सकते हैं। फर्ज़ कीजिए कि आपके घर में पानी का एक बहुत बड़ा मटका रखा है, जिसके भीतर का पानी सड़ चुका है, उसमें से बदबू आ रही है और कीड़े पड़ चुके हैं। अब यदि आप उस मटके को बाहर से बहुत सुंदर रंग-रोगन कर दें, उस पर सोने के वर्क लगा दें और उसे रेशमी कपड़े से ढक दें, तो क्या उसके भीतर का पानी पीने लायक हो जाएगा? क्या कोई भी समझदार इंसान उस पानी को पीकर बीमार होने से बच पाएगा? बिल्कुल नहीं। पानी को साफ़ करने के लिए मटके को बाहर से सजाने की नहीं, बल्कि उसे अंदर से पूरी तरह धोकर साफ़ पानी भरने की ज़रूरत होती है।

हमारा यह जीवन भी उस मटके की तरह है। हमारा मन यदि अंदर से दूसरों की बुराई, नफरत और धोखेबाज़ी के विचारों से सड़ रहा है, तो बाहर से हम चाहे जितने बड़े भक्त बन जाएं, हमारी आत्मा कभी पवित्र नहीं हो सकती। मनोविज्ञान भी यही कहता है कि जो लोग अपनी कमियों को छुपाने के लिए बाहर बहुत ज्यादा धार्मिक होने का दिखावा करते हैं, उनका मानसिक तनाव (Guilt) कभी कम नहीं होता। असली भक्ति तो मन की आंतरिक सफाई है।

मन की शंका का सीधा समाधान
अब यहाँ एक तार्किक सवाल उठता है : “यदि बाहरी पूजा-पाठ या नाम लेने से कुछ नहीं होता, तो फिर संतों ने नाम जप की इतनी महिमा क्यों गाई है? हम अपने मन को साफ़ कैसे करेंगे यदि हम शुरुआत ही नहीं करेंगे?”

विरोधाभास तब दूर होता है जब आप ‘साधन’ (Tool) और ‘साध्य' (Goal) का अंतर समझ लेते हैं। मंदिर जाना, नाम जपना या माला फेरना बहुत अच्छे साधन हैं— ये उस मटके को मांजने वाले साबुन की तरह हैं। लेकिन साबुन लगाने का मकसद मटके को साफ़ करना होता है, सिर्फ साबुन लगाकर छोड़ देना नहीं। ठीक वैसे ही, यदि आप सुबह उठकर आधे घंटे भगवान का नाम लेते हैं, तो उसका असर आपके पूरे दिन के व्यवहार में दिखना चाहिए। यदि नाम लेने के तुरंत बाद आप किसी से झूठ बोलते हैं या किसी का दिल दुखाते हैं, तो इसका मतलब आपने साधन का उपयोग तो किया, लेकिन मंज़िल तक नहीं पहुँचे। जब भक्ति आपके व्यवहार में दया और प्रेम बनकर बहने लगे, तब समझना कि भक्ति सच्ची है।

आज के जीवन के लिए व्यावहारिक सूत्र
★ भीतर का बदलाव : सुबह की पूजा के बाद जब आप घर से बाहर निकलें, तो यह ध्यान रखें कि आपकी वाणी से आज किसी को दुख न पहुँचे। यही आपकी असली पूजा होगी।
★ दिखावे से तौबा : भगवान को रिझाने के लिए बड़ी-बड़ी प्रदर्शनियों या दिखावे की ज़रूरत नहीं है। शांत कोने में बैठकर अपनी गलतियों को स्वीकार करना और उन्हें सुधारना ही सच्ची प्रार्थना है।
★ इंसानियत ही ईश्वर सेवा : किसी बेज़ुबान जानवर की मदद करना या किसी भूखे को भोजन कराना, मंदिर में सोने का छत्र चढ़ाने से हजार गुना बड़ी भक्ति है। 

आज का आत्म-संकल्प
“हे अंतर्यामी परमात्मा! मैं आज यह दृढ़ संकल्प लेता हूँ कि मैं केवल दिखावे का भक्त नहीं बनूँगा। मैं कपड़ों या बाहरी चोले को बदलने के बजाय अपने मन के भीतर छिपी नफरत और लालच को साफ़ करूँगा। आज से मेरी सबसे बड़ी भक्ति दूसरों के प्रति प्रेम, करुणा और ईमानदारी होगी।”