Devil ki Daastaan in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 34

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Devil की दास्तान - 34

(आसमान में बादल छाए हुए हैं। गुफा के बाहर रात का अँधेरा गहराता जा रहा है।
करण अभी भी थोड़ा कमज़ोर है, उसकी आँखों में थकान है, पर सिमरन के चेहरे को देखकर वो मुस्कुरा देता है।)

करण (धीरे से) बोला - 
“अब सब ठीक है... बस थोड़ी ताकत लौट आए तो सब ठीक हो जाएगा…”

(सिमरन हल्की मुस्कान देती है, लेकिन तभी गुफा के बाहर ज़मीन काँपती है। हवा तेज़ हो जाती है।
गुफा की दीवारों से अजीब सी परछाइयाँ फिसलती हैं — और एक गूंजती हुई आवाज़ आती है…)

आवाज़ (गूंजती हुई) बोली - 
“तू जितना भाग ले करण… मौत से नहीं छिप सकता…”

(करण चौंकता है। वो बाहर की तरफ दौड़ता है। और सामने खड़ा है — रुद्र, उसकी लाल चमकती आँखें, दाँत निकले हुए, चेहरे पर गुस्सा और पागलपन।)

रुद्र (हँसते हुए) बोला - 
“फिर मिले हम, भाई…
तूने मेरे साथ धोखा किया था — और अब सज़ा तेरी और तेरी पसंदीदा इंसानी औरत दोनों को मिलेगी…”

(करण पीछे हटता है, लेकिन सिमरन पीछे से आती है। वो डरते हुए करण का हाथ पकड़ लेती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“करण जी… ये वही है ना… जिसने हमें अलग किया था?”

(रुद्र के होंठों पर शैतानी मुस्कान फैलती है।)

रुद्र बोला - 
“अलग नहीं किया… अब तो हमेशा के लिए मिटा दूँगा!”

(इतना कहकर रुद्र हवा में कूदता है और अपनी तेज़ नाखूनों से सिमरन पर हमला करता है।
सिमरन चीखती है — “करण जी!” 
और ज़मीन पर गिर पड़ती है। उसके माथे से खून बहता है।)

करण (चीखते हुए) बोला - 
“सिमरन!!!”

(वो ग़ुस्से से काँपता है, लेकिन उसका शरीर अभी कमज़ोर है।
वो रुद्र पर झपटने की कोशिश करता है, पर उसका शरीर साथ नहीं देता।
रुद्र ज़ोर से उसे धक्का देता है — करण दीवार से टकराकर गिर जाता है।)

रुद्र (हँसते हुए) बोला - 
“अब देखता हूँ, तेरा इंसानी प्यार कैसे बचाता है तुझे…”

(करण अपनी पूरी ताकत जुटाता है। उसकी आँखों में फिर से लाल चमक लौटने लगती है।
वो सिमरन के पास रेंगते हुए जाता है, उसे अपनी गोद में उठाता है — उसकी साँसे बहुत धीमी हैं।)

करण (टूटे स्वर में) बोला - 
“नहीं… इस बार मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा…”

(वो रुद्र की तरफ देखता है, लेकिन लड़ने के बजाय सिमरन को अपनी बाहों में उठाकर
गुफा के पीछे के रास्ते से भागने लगता है।

रुद्र ज़ोर से चिल्लाता है — “भाग ले करण! पर अगली बार मैं तेरे साथ उसकी रूह भी ले जाऊँगा!”)

(करण तेज़ हवा में उड़ता हुआ सिमरन को लेकर निकल जाता है।
रात का अँधेरा और गहराने लगता है। बादलों के बीच बिजली चमकती है —
और करण की आँखों में डर, ग़ुस्सा और प्यार तीनों झलकते हैं।)

(रात बहुत गहरी हो चुकी थी। हवा में अजीब सी ठंडक घुली थी।
करण उड़ते-उड़ते एक सुनसान पुराने मकान तक पहुँचा।
मकान जंगल के बीच था, टूटी-फूटी दीवारें, झूलती खिड़कियाँ, और अंदर सन्नाटा।)

(वो जल्दी से अंदर आता है, और सिमरन को धीरे से ज़मीन पर बैठाता है।
फिर उसे एक दीवार के सहारे टिकाता है। सिमरन बेहोश है, चेहरा ज़र्द, साँसें बहुत धीमी।)

करण (थके हुए स्वर में) बोला - 
“सिमरन… उठो ना… देखो मैं हूँ तुम्हारे पास…”

(वो उसके गाल पर हाथ फेरता है। उसकी उंगलियाँ काँप रही हैं।)

करण (धीरे-धीरे) बोला - 
“तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा… मैंने बहुत लोगों को खोया है, पर अब नहीं… सिमरन! Please उठो ना।”

(सिमरन का सिर हल्का सा झुक जाता है। करण घबराता है। वो उसका माथा छूता है — ठंडा।
वो काँप उठता है।)

करण (तेज़ आवाज़ में) बोला - 
“सिमरन!! सुनो ना! आँखें खोलो!! देखो अब मैं तुमको कभी परेशान नहीं करूंगा। कभी तुम्हारा खून पीने की कोशिश नहीं करूंगा। कभी तुमको नहीं रुलाऊंगा। मैं तुमसे बहुत प्यार करूंगा। Please सिमरन आँखें खोलो ना।”

(कोई जवाब नहीं। करण की आँखें लाल हो जाती हैं।
वो अपनी नाखूनों से अपने हाथ पर हल्का सा ज़ख्म करता है, खून निकलता है।)

करण (धीरे से फुसफुसाते हुए) बोला - 
“अगर मेरा खून तुम्हें ज़िंदा रख सकता है… तो ये भी मंज़ूर है।”

(वो अपने खून की कुछ बूंदें सिमरन के होंठों के पास लगाता है।
वो हर बार उसका नाम लेता है — “सिमरन… सिमरन…”
पर वो नहीं जागती।)

(करण का गुस्सा और दर्द आपस में घुल जाते हैं। वो सिर झुकाकर दीवार से टिक जाता है।
उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं, जो ज़मीन पर लाल बूंदों में मिल जाते हैं।)

करण (धीरे से खुद से) बोला - 
“क्यों… हर बार जब मैं किसी से प्यार करता हूँ, तो उसे खोने का डर साथ आता है?”

(बाहर बिजली कड़कती है। हवा से दरवाज़ा चरमराने लगता है।
एक छाया दरवाज़े के बाहर से गुज़रती है — कोई वहाँ आ चुका है।)

(करण चौकन्ना होकर सिर उठाता है। उसकी आँखों में चमक लौटती है,
वो सिमरन के सामने आकर खड़ा हो जाता है, रक्षक बनकर।)

करण (गहरी आवाज़ में) बोला - 
“जो भी हो… अब इसे छूना भी मत।”

सिमरन बेहोश दीवार से लगी है, करण उसके सामने बैठा है —
और बाहर अँधेरे में फिर से किसी की परछाई हिलती है…)

रात पूरी तरह से अँधेरी थी। हवाओं की आवाज़ पुरानी दीवारों से टकराकर गूंज रही थी।
करण अब भी सिमरन के सामने बैठा था — उसकी साँसें बहुत धीमी हो चुकी थीं, आँखें बंद थीं।)

करण (धीरे से, टूटे स्वर में) बोला - 
“सिमरन… तुम ऐसे नहीं जा सकती… मैं हार नहीं मानूँगा…”

(वो सिमरन के बालों को चेहरे से हटाता है। अचानक, कमरे की हवा ठंडी हो जाती है।
मोमबत्तियाँ अपने आप बुझ जाती हैं। एक अदृश्य ऊर्जा कमरे में फैलती है।)

(धीरे-धीरे, हवा में धुंआ-सा बनता है… और उस धुंए से एक अदृश्य आत्मा की परछाई उभरती है —
आवाज़ भारी, रहस्यमयी, पर शांत।)

आत्मा (गहरी आवाज़ में) बोली - 
“तुम्हें अपनी प्रिय को बचाना है… है ना, करण सूर्यवंशी?”

(करण चौकन्ना हो जाता है, आँखें लाल चमकने लगती हैं।)

करण बोला - 
“कौन हो तुम? सामने आओ!”

आत्मा (हँसते हुए) बोली - 
“मुझे सामने आने की ज़रूरत नहीं। मैं वो शक्ति हूँ जो जीवन और मृत्यु के बीच का रास्ता तय करती है।
तुम्हें अगर सिमरन को बचाना है… तो एक सौदा करना होगा।”

(करण की सांसें तेज़ हो जाती हैं।)

करण (गुस्से से) बोला - 
“किस तरह का सौदा?”

आत्मा (धीरे से) बोली - 
“सौदा आसान है… सिमरन ज़िंदा रहेगी… उसकी साँसें फिर चलेंगी…
पर वो सब कुछ भूल जाएगी — यहाँ तक कि तुम्हें भी।”

(करण स्तब्ध रह जाता है। उसके चेहरे पर भाव बदलते हैं — डर, दर्द, और असमंजस।)

करण (धीरे से) बोला - 
“मतलब… उसे याद नहीं रहेगा कि मैं कौन हूँ?”

आत्मा बोली - 
“न सिर्फ़ इतना… उसे अपना नाम तक याद नहीं रहेगा।
वो नई ज़िंदगी शुरू करेगी।”

(करण की आँखों में आँसू तैरते हैं। वो सिमरन के बेहोश चेहरे की ओर देखता है।
फिर धीरे से उसका हाथ पकड़ लेता है।)

करण (काँपती आवाज़ में) बोला - 
“अगर ये ही रास्ता है उसकी ज़िंदगी का… तो मैं ये सौदा मंज़ूर करता हूँ।”

(आसपास की हवा अचानक और ठंडी हो जाती है।
आत्मा का धुंआ-सा रूप धीरे-धीरे सिमरन के ऊपर उतरने लगता है।)

आत्मा बोली - 
“याद रखना करण सूर्यवंशी…
हर सौदे की एक कीमत होती है… और ये कीमत तुम दिल से चुकाओगे… अगर सिमरन को सब याद आ गया तो वो काली शक्तियां फिर से तुम दोनों के पीछे पड़ जाएंगी ।”

(क्षण भर में पूरा कमरा सुनहरी रोशनी से भर उठता है।
सिमरन के शरीर में हलचल होती है — उसकी उंगलियाँ हिलती हैं, साँसें लौटती हैं।
पर उसकी आँखें खुलती हैं — उनमें कोई पहचान नहीं, कोई याद नहीं।)

करण (टूटे स्वर में फुसफुसाते हुए) बोला - 
“सिमरन…?”

(वो उसकी ओर देखती है — पर उसके चेहरे पर कोई पहचान नहीं।
वो बस हैरानी से पूछती है…)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“आप… कौन हैं?”

(करण का दिल जैसे रुक जाता है।
वो मुस्कुराने की कोशिश करता है, मगर उसकी आँखों में आँसू छलक जाते हैं।)

करण (धीरे से) बोला - 
“कोई नहीं… बस वो जिसने तुम्हें ज़िंदगी दी।”

(आत्मा की आवाज़ पीछे से गूंजती है —)

आत्मा बोली - 
“अब सौदा पूरा हुआ… वो जिएगी, पर तुम्हारी यादें मर चुकी हैं…”

(हवा में ठंडी लहर दौड़ जाती है।
करण सिमरन को देखता है — वो अब बिल्कुल नई दुनिया में है…
और करण सिर्फ़ एक परछाई बनकर रह गया है उसकी ज़िंदगी के बाहर। सिमरन फिर से बेहोश हो गई और करण के सीने पे गिर गई।)