Devil ki Daastaan in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 37

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Devil की दास्तान - 37

(सांझ का समय। आसमान में हल्का सूरज डूब रहा है।
सुनहरी रोशनी मंदिर की सीढ़ियों पर बिखरी हुई है।
मंदिर के बाहर कबीर (असल में करण) और सिया (असल में सिमरन) खड़े हैं।
दोनों के चेहरों पर हल्की मुस्कान है, पर दिल में अलग-अलग भाव —
एक के लिए ये पहली शादी थी… दूसरे के लिए, वही अधूरी कहानी का दूसरा अध्याय।)
(मंदिर की घंटियाँ बज रही हैं, हवा में अगरबत्ती की खुशबू फैली है।
सिया ने लाल साड़ी पहनी है, माथे पर हल्का सिंदूर —
बिना जाने कि वही रंग उसके भाग्य का चक्र पूरा करने वाला है।)

सिया (मुस्कुराते हुए) बोली - 
“कबीर जी… अचानक मंदिर क्यों लाए हो? कुछ खास बात है क्या?”

कबीर (धीरे से, गंभीर स्वर में) बोला - 
“हाँ… बहुत खास बात है।”

(वो उसकी आँखों में देखता है, उसकी नज़रों में डर और प्यार दोनों हैं।)

कबीर (धीरे-धीरे) बोला - 
“तुम कहती हो ना कि तुम्हें अपना घर, अपना रिश्ता नहीं याद…
तो आज से… मैं वो रिश्ता बनना चाहता हूँ।”

(सिया की आँखें चमक उठती हैं।)

सिया (हैरान होकर) बोली - 
“मतलब…?”

कबीर (हल्की मुस्कान के साथ) बोला - 
“मतलब ये कि… क्या तुम मुझसे शादी करोगी, सिया?”

(सिया कुछ पल के लिए सन्न रह जाती है।
फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरती है —
जैसे किसी खोई आत्मा को अपनी मंज़िल मिल गई हो।)

सिया (धीरे स्वर में) बोली - 
कबीर जी… मुझे नहीं पता मैं कौन हूँ… पर जो भी हूँ…
दिल कहता है कि आप मेरे अपने हो।”

(वो हाँ में सिर हिला देती है।
कबीर के चेहरे पर राहत की झलक आती है, पर उसकी आँखों में नमी भी है।)
(पंडित मंत्र पढ़ रहे हैं।
दीपक की लौ हवा में कांप रही है।
कबीर और सिया सात फेरे ले रहे हैं —
पर कबीर की आँखों के आगे फ़्लैशबैक चल रहा है।)

🎥 फ्लैशबैक:
सिमरन (उसी तरह की साड़ी में) करण के साथ सात फेरे ले रही है।
वही वचन, वही आग, वही व्रत…
बस फर्क इतना कि इस बार वो सब कुछ भूल चुकी है।

(कबीर के चेहरे पर आँसू गिरता है, पर वो छिपा लेता है।)

पंडित बोला - 
“अब वर, वधू को मंगलसूत्र पहनाएँ।”

(कबीर सिया के गले में मंगलसूत्र पहनाता है।
सिया की आँखों में मासूम खुशी है, जबकि कबीर की आँखों में अधूरा सुकून।)

सिया (धीरे से, मुस्कुराकर) बोली - 
“अब तो मैं सच में आपकी हो गई…”

(कबीर उसके माथे पर सिंदूर लगाता है —
उसी जगह, उसी अंदाज़ में… जैसे उसने पहली बार किया था।
पर इस बार उसके मन में एक भारीपन है।)

कबीर (मन ही मन) बोला - 
“शायद किस्मत ने हमें फिर जोड़ा है…
पर इस बार बिना यादों के…”

(घंटियों की आवाज़ गूंजती है।
सिया मुस्कुराती है, कबीर उसकी मुस्कान में अपनी सज़ा देखता है।)

मंदिर के बाहर - 
(सिया उसके कंधे पर सिर रखे हुए है।)

सिया (धीरे से) बोली - 
“कबीर जी… मुझे लगता है जैसे ये सब मैंने पहले भी जिया है…
कहीं देखा है… कहीं सुना है…”

(कबीर उसकी तरफ देखता है, मुस्कुराने की कोशिश करता है — पर उसकी आँखें बोल उठती हैं कि वो सच्चाई जानता है।)

कबीर (मन में सोचते हुए) बोले - 
“हाँ सिया… ये तुम्हारी पहली नहीं, हमारी आखिरी शादी थी…"

(जहाँ दो आत्माओं ने फिर से एक अधूरी कहानी को नया नाम दिया।)
(कहानी अब और गहरी हो चुकी थी।
अब सिया (जो असल में सिमरन थी) और कबीर (जो असल में करण था) पति-पत्नी थे।
मगर इस रिश्ते की जड़ें अंधेरे में थीं — क्योंकि जिसे सिया अपना भगवान मान रही थी…
वो असल में एक शैतान था — एक ऐसा शैतान जो किसी रूह को खोना नहीं चाहता था।)

हवेली – रात का समय

(हवेली के भीतर मंद-मंद रोशनी है।
दीवारों पर पुरानी तस्वीरें हैं, जिन पर समय की धूल जमी है।
सिया लाल जोड़े में सजी है, बालों में गजरा, और गले में मंगलसूत्र झूल रहा है।
कबीर उसे कमरे में लाता है, उसके चेहरे पर मुस्कान है —
पर आँखों में एक रहस्यमय अंधकार।)

कबीर (धीरे स्वर में) बोला - 
“अब तुम सिर्फ मेरी हो, सिया…
कभी किसी और की नहीं हो सकती…”

सिया (मुस्कुराकर) बोली - 
“आप भी तो सिर्फ मेरे हो ना?”

(कबीर पल भर को कुछ नहीं बोलता।
उसके चेहरे पर एक ठंडी-सी छाया दौड़ जाती है।)

कबीर (धीरे, लगभग फुसफुसाते हुए) बोला - 
“मैं तुम्हारा हूँ… और तुम मेरी…
हर जन्म में… हर मौत में…”

(सिया समझ नहीं पाती कि वो इतना गहरा बोल क्यों रहा है।
वो मुस्कुरा कर उसका हाथ पकड़ती है।)

सिया बोली - 
“आप बहुत अजीब बातें करते हो कबीर जी… जैसे कोई रहस्य छुपा रहे हो।”

कबीर (धीरे से, नज़रों को झुकाते हुए) बोला - 
“कुछ बातें बताने से डर लगता है…
कहीं तुम मुझसे नफरत न करने लगो।”

सिया (हँसकर) बोली - 
“आपसे नफरत? कभी नहीं…”

(वो उसके गले लग जाती है।
कबीर की आँखों में आँसू आते हैं, मगर साथ ही उनमें एक लाल चमक झिलमिलाती है —
जैसे किसी परछाई ने उसकी रगों में फिर से अंधेरा भर दिया हो।)

वही रात – आधी रात का समय

(सिया गहरी नींद में है।
अचानक हवा का झोंका आता है, परदे फड़फड़ाते हैं।
कमरे में ठंडी लहर फैलती है।
सिया करवट लेती है…
और तब उसे दिखता है — कबीर खिड़की के पास खड़ा है,
आँखों में अजीब लाल चमक, और उसके आसपास हवा धुंधली-सी काँप रही है।)

सिया (धीरे, नींद में) बोली - 
“कबीर जी… आप वहाँ क्या कर रहे हो?”

(कबीर उसकी ओर मुड़ता है।
उसका चेहरा अब इंसानी नहीं लगता —
पलभर को उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो जाती हैं,
चेहरा भयावह, फिर तुरंत सामान्य हो जाता है।)

कबीर (धीरे से, मुस्कुराते हुए) बोला - 
“कुछ नहीं सिया… बस ठंडी हवा खा रहा था…”

(वो उसके पास आता है, उसके माथे को छूता है।
सिया फिर से नींद में चली जाती है।
कबीर उसके बालों में हाथ फेरता है —
पर जैसे ही उसका हाथ सिया के सिंदूर पर आता है,
धुआँ उठता है — और उसकी आँखों में पीड़ा भर जाती है।)

कबीर (अपने आप से फुसफुसाते हुए) बोला - 
“इस बार मैं तुम्हें नहीं खोऊँगा सिमरन…
भले मुझे फिर से शैतान ही क्यों न बनना पड़े…”

(कबीर का चेहरा हल्का-सा बदल जाता है,
और पृष्ठभूमि में घंटियों की जगह अब एक भयावह सरसराहट सुनाई देती है।)

दृश्य : अगली सुबह

(सिया उठती है। कबीर कमरे में नहीं है।
वो आईने के सामने जाती है —
उसके माथे पर सिंदूर की जगह एक हल्की-सी काली छाया दिखाई देती है।
वो घबराकर उसे पोंछती है, पर वह छाया मिटती नहीं।)

सिया (घबराई हुई) बोली - 
“ये… ये क्या है?”

(तभी पीछे से आवाज़ आती है —)

कबीर (धीरे स्वर में) बोला - 
“वो मेरी निशानी है…”

(सिया पलटती है — कबीर दरवाज़े पर खड़ा है, चेहरे पर शांत पर डरावनी मुस्कान। वो सिया के पास आता हैं।)

सिया (डरी हुई) बोली - 
“क कबीर जी…आप कौन हो?”

कबीर (धीरे से आगे बढ़ते हुए) बोला - 
“वो, जिसे तुमने दो बार अपना पति बनाया…
वो, जिसे मौत ने भी तुमसे जुदा नहीं किया…”

(सिया पीछे हटती है। उसकी आँखों में डर है।
कबीर उसके पास आता है,उसकी आँखों में लाल रोशनी फिर से चमक उठती है।)