मैंने उत्सुकता से उनकी ओर देखा।
"आज के बाद तुम जो भी देखोगे, सुनोगे या जानोगे... वह इस कमरे से बाहर नहीं जाना चाहिए। कई बार तुम्हें ऐसे फ़ैसले पता होंगे, जिनकी जानकारी कंपनी के बड़े-बड़े अधिकारियों को भी नहीं होगी। कई बार तुम्हें मेरे परिवार की सुरक्षा, मेरी यात्राओं और मेरे निजी जीवन से जुड़े मामलों में भी साथ रहना पड़ेगा।"
उन्होंने कुछ पल रुककर कहा,
"क्या तुम यह ज़िम्मेदारी निभा पाओगे?"
मैं बिना एक पल गँवाए अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया।
"सर... मैं वादा तो नहीं कर सकता कि मुझसे कभी कोई ग़लती नहीं होगी। क्योंकि मैं इंसान हूँ। लेकिन एक बात पूरे विश्वास से कह सकता हूँ—मेरी नीयत कभी आपके भरोसे को ठेस नहीं पहुँचाएगी।"
मेरे जवाब के बाद कमरे में कुछ पल की ख़ामोशी छा गई।
अचानक ठाकुर साहब अपनी कुर्सी से उठे और मेरे सामने आकर खड़े हो गए।
उन्होंने अपना दाहिना हाथ मेरी ओर बढ़ाया।
"वेलकम टू द फैमिली, क्षितिज।"
'फैमिली'...
यह शब्द सुनते ही मेरे भीतर जैसे कुछ टूटकर फिर से जुड़ गया।
बचपन से लेकर आज तक मैंने कई जगह काम किया था। हर जगह मुझे एक कर्मचारी की तरह देखा गया था। लेकिन पहली बार किसी ने मुझे अपने परिवार का हिस्सा कहा था।
मैंने बिना देर किए उनका हाथ थाम लिया।
उनकी पकड़ मज़बूत थी... और शायद उसी पकड़ के साथ मेरी ज़िंदगी भी एक नई दिशा पकड़ चुकी थी।
ठीक उसी समय मिस्टर शर्मा कमरे में वापस आए। उनके हाथ में एक फ़ाइल, एक पहचान-पत्र और कंपनी का आधिकारिक विज़िटर पास था।
"सर, सारे डॉक्यूमेंट तैयार हैं।"
ठाकुर साहब ने मुस्कुराकर कहा,
"अब विज़िटर पास की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"
उन्होंने पास उठाकर मेरी तरफ़ देखा और फिर मुस्कुराते हुए उसे मेज़ पर ही रख दिया।
"क्योंकि आज से यह लड़का मेहमान नहीं... इस कंपनी का हिस्सा है।"
मेरे चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई।
संघर्ष अभी ख़त्म नहीं हुआ था...
लेकिन इतना ज़रूर था कि आज, कई वर्षों बाद, किस्मत ने पहली बार मेरा हाथ थामा था।
मिस्टर शर्मा सारी औपचारिकताएँ पूरी करवाकर कमरे से बाहर जा चुके थे। अब कमरे में सिर्फ़ मैं और ठाकुर उदय प्रताप सिंह रह गए थे।
उन्होंने कुर्सी पर थोड़ा आगे झुकते हुए कहा,
"क्षितिज, मैं चाहता हूँ कि तुम अगले दो दिन अपने सारे अधूरे काम निपटा लो।"
"जी..."
"कॉल सेंटर में जाकर ठीक से इस्तीफ़ा दे देना। वहाँ अगर तुम्हारे कोई बकाया हिसाब हों, तो उन्हें भी पूरा कर लेना। और जहाँ तुम किराए पर रहते हो, वहाँ का किराया और बाकी देनदारियाँ भी चुकता कर देना।"
मैं ध्यान से उनकी हर बात सुन रहा था।
उन्होंने आगे कहा,
"उसके बाद अपने ज़रूरत का सामान लेकर सीधे हवेली चले आना। तब तक मैं तुम्हारे रहने का कमरा और बाकी सारी व्यवस्थाएँ करवा दूँगा।"
फिर उन्होंने बड़े स्नेह से मेरी ओर देखा।
"और हाँ... अगर इन दो दिनों में किसी भी तरह की कोई परेशानी आए, चाहे छोटी हो या बड़ी, बिना झिझक मुझे फ़ोन करना। उसे अपनी समस्या मत समझना... हमारी समस्या समझना।"
उनके शब्दों में इतना अपनापन था कि मैं कुछ पल के लिए नि:शब्द हो गया।
मैंने बस हल्के से सिर हिलाकर कहा,
"जी..."
उन्होंने अपनी डायरी पर नज़र डालते हुए कहा,
"सोमवार सुबह से तुम्हें मेरे साथ रहना होगा। उसके बाद तुम्हारा पूरा शेड्यूल मेरे शेड्यूल के हिसाब से चलेगा।"
"ठीक है, सर।"
मैं कुर्सी से उठने ही वाला था कि उन्होंने मुस्कुराकर मुझे रोक लिया।
"एक मिनट..."
मैंने हैरानी से उनकी ओर देखा।
"क्षितिज... मुझे 'सर' मत कहा करो।"
मैं कुछ समझ नहीं पाया।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
"ऑफिस के बाहर तुम मुझे 'अंकल' कह सकते हो।"
मेरे चेहरे पर आश्चर्य साफ़ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने आगे कहा,
"याद रखना... ये सारी औपचारिकताएँ—'सर', 'चेयरमैन', 'बॉस'—बस ऑफिस और दुनिया को दिखाने के लिए हैं। वहाँ हर किसी को अपने पद की मर्यादा निभानी पड़ती है। लेकिन उस दरवाज़े के बाहर..." उन्होंने अपने केबिन की ओर इशारा किया, "...हमारा रिश्ता सिर्फ़ मालिक और कर्मचारी का नहीं रहेगा।"
कुछ क्षण रुककर उन्होंने धीमे लेकिन बेहद आत्मीय स्वर में कहा,
"मैंने अपना बेटा खोया नहीं है... लेकिन मुझे हमेशा एक ऐसे बेटे की कमी महसूस हुई, जिस पर मैं आँख बंद करके भरोसा कर सकूँ। और अगर तुम चाहो... तो आज से मुझे अंकल नहीं, अपने पिता जैसा मान सकते हो।"
उनकी आवाज़ में बनावट नहीं थी। हर शब्द सीधे दिल से निकल रहा था।
मेरी आँखें अनायास ही नम हो गईं।
सुबह तक मैं एक साधारण कॉल सेंटर कर्मचारी था, जो महीने के अंत में किराया और राशन का हिसाब लगाता था।
और अब...
देश के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में से एक इंसान मुझे अपना विश्वास, अपना साथ... और अपने परिवार का हिस्सा बनने का निमंत्रण दे रहा था।
मैं उन्हें बस देखे जा रहा था।
मन बार-बार यही कह रहा था—
क्या सचमुच यह सब मेरे साथ हो रहा है?
ऐसा लग रहा था जैसे कोई बेहद ख़ूबसूरत सपना चल रहा हो... और मुझे डर था कि कहीं कोई अचानक मेरे कंधे पर हाथ रखकर यह न कह दे—
"उठो क्षितिज... सुबह हो गई।"
मैंने अनजाने में अपने हाथ की उँगलियों को ज़ोर से दबाया।
हल्का-सा दर्द हुआ।
मैं मुस्कुरा दिया।
नहीं...
यह सपना नहीं था।
मेरी ज़िंदगी सचमुच बदलने लगी थी।