अपना-घर
जिंदगी की कहानी बस इतनी सी है, जो चीज हमारे पास नहीं होती, उसे पाने के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष करते हैं। और आखिर में जब वो चीज मिल भी जाए तो क्या... तो जिंदगी खत्म हो जाती है। हर किसी की सभी इच्छाएं पूरी कहां होती हैं। बहुत कम खुशनसीब होते हैं जिन्हें अपनी जिंदगी में सब कुछ मिल जाता है। कोई इच्छा ही नहीं रहती कुछ पाने की।
यह कहानी भी एक ऐसी लड़की की है जिसका सपना था, एक घर हो ऐसा जिसकी नेमप्लेट पर उसका नाम हो।
विनीता नाम की एक लड़की बचपन से ही सशक्त महिला बनने का सपना देखती थी। क्योंकि उसने शुरू से ही अपने आस-पास महिलाओं के साथ अन्याय होते हुए देखा। महिलाओं को अपने ही घर में अपमानित होते देखा। उसके दादा के घर में उसके दादाजी बहुत रूढ़िवादी थे। पत्नी को सिर्फ अपनी गुलाम समझते थे। बाकी सबके लिए बहुत अच्छे थे। गरीबों को दान करते, भंडारा करवाते, अपने भाई-बहनों सबकी सहायता करते। लेकिन अपनी बीवी को बस नौकरानी समझते।
विनीता एक संयुक्त परिवार में रहती थी। चाची, ताई, बुआ सब एक ही घर में रहते। अक्सर बड़े परिवारों में सीधी महिलाओं के हक के लिए कोई आवाज नहीं उठाता। उनका मानसिक शोषण हर रोज ही होता। विनीता की मां जी बहुत धार्मिक महिला थीं। वो किसी से कोई शिकायत न करतीं। विधि का विधान मान अपनी जिंदगी में सबको खुश रखने की कोशिश करतीं।
विनीता को शादी के नाम से चिढ़ हो गई। उसे सजना-संवरना पसंद नहीं था। वो सादगी से रहना पसंद करती। विनीता ने सोचा मैं शादी नहीं करूंगी। अकेले रहकर ही अपनी माँ जैसी महिलाओं की सेवा करूंगी। उसने बहुत मेहनत की पढ़ाई में और पास के ही डिग्री कॉलेज में अध्यापिका बन गई। वहां वो अपनी छात्राओं को महिला सशक्तिकरण का ज्ञान देती। उन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए प्रेरित करती। कॉलेज में सभी छात्राओं की प्रिय अध्यापिका बन गई।
लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। उसकी शादी भी एक रूढ़िवादी परिवार में हो गई। अपने घर में ही अब उसे परायापन महसूस होता। ससुराल वाले भी कभी-कभी ताना मार ही देते - "ये तो पराए घर से आई है।" पति भी घर वालों का ही समर्थन करता। धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि आखिर भारतीय महिलाएं क्यों अपनी गृहस्थी बचाने के लिए पुरुषों का अत्याचार सहती रहती हैं। कुछ अपने बच्चों की खातिर तो कुछ मां-बाप की झूठी शान की खातिर चुप रहना सीख जाती हैं।
उसे बुरा तो बहुत लगता जब उसका पति उसे पैसों के लिए या घर के लिए ताने देता। उसने ठान लिया था अपना घर जरूर बनाएगी जो उसकी मेहनत की कमाई से बनेगा। जिस पर उसका पूर्णतः अधिकार होगा।
समय तेजी से गुजरता है। उसका एक बेटा हो जाता है। वो बेटे को पालने के लिए अपनी नौकरी छोड़ देती है। लेकिन उसे एक गृहिणी, एक मां बनने की कीमत रोज पति के द्वारा अपमानित होकर चुकानी पड़ती।
विनीता को छोटी-छोटी चीजों के लिए अपने पति के आगे हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता। जब भी वो अपने पति से घर के खर्चे के लिए पैसे मांगती, उसका पति महंगाई का रोना रोने लगता। कमरे का किराया, बाइक का पेट्रोल, बिजली का बिल, राशन... इन सब में ही सैलरी खत्म हो जाती। कहते - "पढ़ी-लिखी हो खुद कोई नौकरी कर लो। घर को सहारा ही लगेगा।"
विनीता का बेटा जब 10 साल का हो जाता है तो वो एक स्कूल में फिर से अध्यापिका की नौकरी करने लग जाती है। लेकिन अब उसके पति ने घर का किराया और बच्चे की फीस भी उसी के जिम्मे डाल दी। वो सारा दिन स्कूल में मेहनत करती, घर आकर बच्चे को पढ़ाती, घर का सारा काम करती और रात को थककर सो जाती।
खुद पैसा कमाने के बाद भी उसे अपनी मर्जी से खर्च करने का अधिकार नहीं था। पति को सारा हिसाब देना पड़ता। वो अपने लिए और अपने घर के लिए पैसे नहीं बचा पाती। उसका एक ही सपना था कि उसका अपना घर हो। वो उसी अपने घर में कोचिंग सेंटर चलाएगी और नौकरी छोड़ देगी। क्योंकि घर और नौकरी के बीच में वो पिस गई थी। खुद का ध्यान रखना ही भूल गई थी। उसे चिंता के कारण थायराइड हो गया था।
एक रात वो अपने पति से कहने लगी कि "हम कब तक किराए के घर में रहेंगे, कब हमारा अपना घर होगा। चाहे छोटा हो पर अपना हो।"
उसके पति ने झल्लाते हुए कहा कि "कर तो रहा हूं ना रात-दिन मेहनत। पर नहीं बचते पैसे। क्या करूं?"
विनीता अपनी आंखों में अपने घर का सपना लिए सो जाती है।
समय तेज रफ्तार से गुजरता है। विनीता का बेटा 12वीं के बाद पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चला जाता है। अब विनीता 50 वर्ष की हो चुकी थी। लेकिन अभी तक उसका अपना घर नहीं बना। समय के साथ-साथ महंगाई भी बढ़ी है और खर्चे भी। समस्या वही रहती है। बच्चे की पढ़ाई के चलते उसके घर का सपना अभी भी अधूरा रहता है।
अब विनीता का शरीर थक गया था। बीमारी के चलते वो बहुत कमजोर हो गई। उसके पति ने शहर में ही एक प्लॉट ले लिया था। लेकिन उस पर घर न बना सका। किराए पर रहते-रहते उम्र बीत रही थी। विनीता जब भी प्लॉट पर जाती यही सोचती - "कभी तो मेरा अपना घर बनेगा। उस पर मेरा नाम लिखा होगा।"
लेकिन सबके सपने पूरे कहां होते हैं। सबके पास अपना घर होता है। विनीता का भी सपना अधूरा रह गया। अपना घर बनने से पहले ही वो अपनी आंखों में अपने घर का सपना लिए 55 वर्ष की अवस्था में चल बसी।
उस प्लॉट में अब उसके बेटा-बहू रहते हैं और घर के बाहर उसके बेटे-बहू का ही नाम लिखा है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली