life is beautiful in Hindi Women Focused by Vandna Sharma books and stories PDF | जिंदगी खूबसूरत है

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जिंदगी खूबसूरत है



रीना ब्लड टेस्ट कराकर घर आई तो घर की हालत देखकर उसका मन और बैठ गया। रसोई में बर्तन जूठे पड़े थे, कपड़े इधर-उधर बिखरे थे। उसे देखकर रोना आ गया। 

कोविड के समय उसने बचाव के लिए जो इंजेक्शन लगवाए थे, उसके बाद से उसकी जिंदगी बदल गई थी। डॉक्टर ने बताया - थायराइड और जल्दी मेनोपॉज। जो बीमारी 45-50 की उम्र में होनी थी, वो 38 में ही हो गई।

दिन भर थकान। थोड़ा सा काम करते ही सांस फूल जाती। चिड़चिड़ापन इतना कि बात-बात पर गुस्सा आ जाता। रात को नींद नहीं आती और सुबह उठने का मन नहीं करता। सबसे बड़ी समस्या थी वजन। हर महीने 2 किलो बढ़ता ही जा रहा था। बाल झड़ने लगे थे। आईने में अपना चेहरा देखकर वो खुद पहचान नहीं पाती थी।

रीना अपने बेडरूम में आकर फूट-फूट कर रो पड़ी। "मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? अभी तो मैंने बहुत सपने देखे थे। चार धाम की यात्रा करनी थी। बच्चों की शादी धूमधाम से करनी थी। अब तो कुछ अच्छा ही नहीं लगता। ना सजने-संवरने का मन करता है, ना किसी से मिलने का मन। इतनी जल्दी बुढ़ापा आ गया और ऊपर से ये मोटापा। क्या करूं मैं?" 

रोते-रोते उसकी आंख लग गई। डॉक्टर ने मना किया था ज्यादा सोचने को, पर सोचती तो थी ही। जब वो अपनी सहेलियों को देखती - वही उम्र, पर कितनी फिट और सुंदर। तो उसका दुख दोगुना हो जाता।

शाम को उसने टीवी चलाया। चैनल बदलते-बदलते उसकी नजर एक अंतरराष्ट्रीय फैशन शो पर पड़ी। एक प्लस साइज मॉडल रैंप पर आत्मविश्वास से चल रही थी। तालियों की गड़गड़ाहट। वो मोटी थी, पर उसकी आंखों में कोई शर्म नहीं थी। कोई झिझक नहीं थी। 

रीना एकटक उसे देखती रही। अचानक उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी। "नहीं, मैं हार नहीं मान सकती। जो चीज मेरे हाथ में नहीं है, उसके लिए रोना कैसा? मेनोपॉज को मैं रोक नहीं सकती, पर अपने जीने का तरीका तो बदल सकती हूं। अब जो भी है, उसी को सुंदर बनाना है।"

उसी दिन उसने स्वयं से वादा किया - "मैं खुद को फिट करूंगी। खुद से प्यार करूंगी।"

अगले दिन से शुरुआत हुई। पहले उसने धीरे-धीरे साहित्यिक पत्रिकाएं और अच्छी किताबें मंगानी शुरू कीं। पढ़ने से उसका मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहने लगा। खाली दिमाग, शैतान का घर - ये कहावत सही थी। अब समय का सदुपयोग होने लगा।

रोज सुबह 6 बजे अलार्म लगा। सैर पर जाना शुरू किया। पार्क में और भी महिलाएं मिलतीं। धीरे-धीरे दोस्ती हुई। फिर एक घंटा योग क्लास ज्वाइन की। शुरू में बहुत दिक्कत हुई, पर हार नहीं मानी।

वजन कम नहीं हो रहा था तो निराश भी हुई। पर फिर एक फैशन पत्रिका में पढ़ा - "फिटनेस का मतलब सिर्फ पतला होना नहीं, स्वस्थ होना है।" उसने टिप्स लेकर अपना ड्रेसिंग सेंस बदला। ढीले-ढाले कपड़ों की जगह ऐसे कपड़े पहनने लगी जो उसके शरीर पर अच्छे लगें। शाम को डांस क्लास ज्वाइन कर ली। पसीना बहता, थकान होती, पर मन खुश रहता।

लगभग तीन महीने बाद उसकी मेहनत रंग लाई। वजन भले ही बहुत कम न हुआ हो, पर वो स्वस्थ रहने लगी थी। थकान कम हो गई। नींद आने लगी। चिड़चिड़ापन गया। सबसे जरूरी बात - वो खुद को आईने में देखकर मुस्कुराने लगी थी।

अब उसे अकेलापन भी अच्छा लगने लगा था। बच्चों के बड़े होने के बाद जो खाली समय बचता था, उसमें उसने अपनी पुरानी हॉबी फिर से शुरू की। कविता लिखना और पेंटिंग करना। डायरी के पन्ने भरने लगे।

तब रीना को समझ आया - "मोटापे से दुखी होने की जरूरत नहीं है। स्वस्थ रहना, सक्रिय रहना ज्यादा जरूरी है। खुद से प्यार करना सबसे जरूरी है।"

चालीस के बाद महिलाओं की जिंदगी का दूसरा अध्याय शुरू होता है। अगर हम इस समय को रो-रो कर निकाल देंगे तो जिंदगी निकल जाएगी। बेहतर है इस समय को अपनी हॉबी, सामाजिक काम और खुद के लिए जिया जाए। प्रकृति से जुड़ो, दोस्तों से मिलो, कुछ नया सीखो। 

डॉक्टर ने भी कहा - "तुम्हारा थायराइड अब कंट्रोल में है। दवाओं के साथ-साथ तुम्हारी लाइफस्टाइल ने कमाल किया है।"

आज रीना बालकनी में बैठी नई कविता लिख रही है। विषय है - "सावन का आना"। उसके चेहरे पर वही चमक है जो शादी के समय थी। उसने सीख लिया है कि जिंदगी में जो होना है वो होकर रहता है। पर उसके बाद हम क्या करते हैं, ये हमारे हाथ में है।

और रीना ने चुन लिया है - रोना नहीं, जीना है।

*समाप्त*
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली