जिंदगी इतनी बुरी भी नहीं है
_लघुकथा - वंदना शर्मा_
रिमझिम सावन बरस रहा था। आसमान में काले बदरा छाए हुए थे। लगता था पूरे दिन बरसेगा आज। पर मीना के चेहरे पर उदासी थी।
पूरा दिन बिना मुस्कुराए बीत जाता था। बालकनी में बैठी मीना बाहर देख रही थी। मन में सवाल था - "क्या शादी के बाद सबकी जिंदगी बोरिंग हो जाती है या मेरे साथ ही ऐसा है?"
तभी दरवाजे की घंटी बजी। पड़ोसन नेहा सामने खड़ी थी। मीना ने उसे अंदर बुलाया।
सोफे पर बैठते हुए नेहा बोली, "मीना कभी घर से भी बाहर निकल। जिंदगी खूबसूरत नहीं होती, बनानी पड़ती है। हमारी सोसाइटी में हरियाली तीज का कार्यक्रम है। प्रति व्यक्ति फीस पांच सौ रुपये है। कोई भी आ सकता है। फीस दो और तीज मनाओ। तुम जैसे बोरिंग इंसानों के लिए ही तो ये कार्यक्रम है। लाओ झटपट फीस दो, मैं तुम्हें टोकन देती हूं। बस यही टोकन दिखाना है आयोजन स्थल पर।"
नेहा टोकन देकर चली गई। मीना टोकन लेकर बेडरूम में आई और आईने के सामने खड़ी हो गई। कभी टोकन को देखती, कभी खुद को।
टोकन पर्स में रख उसने अपनी पुरानी एल्बम निकाली। पन्ने पलटते-पलटते उसकी आंखें रुक गईं। अपनी पुरानी फोटो देख वो सोचने लगी - "कभी मैं भी इतनी चुलबुली और नटखट हुआ करती थी। झूला झूलने का कितना शौक था। शादी से पहले मम्मी से जिद करके एक हफ्ते पहले ही झूला डलवा लेती थी। स्कूल से आकर सारे दिन झूले पर बैठी रहती और किताब की कविताएं गाती रहती।"
तीज के दिन याद आ गए। मौसी, चाची, मामी सब इकट्ठा होतीं। सोलह श्रृंगार होता। सब हरे रंग के कपड़े पहनतीं। मेहंदी लगे हाथ दिखातीं। चूड़िया खनकती। घेवर की महक से सारा घर महक जाता।
आज तो आलम ये है कि तीज जैसे त्यौहार की उम्मीद ही नहीं होती। फ्लैट संस्कृति ने सारे त्यौहार खत्म कर दिए हैं। एक ही बिल्डिंग के लोग आपस में बात नहीं करते। एक ही परिवार के लोग दूर हो गए हैं। रिश्ते, दोस्त भी आजकल किराए पर मिलते हैं। पैसे दो, पार्टी करो और बाद में "तू कौन, मैं कौन"।
मीना ने गहरी सांस ली और वार्डरोब खोली। उसमें से एक हरी साड़ी निकाली। हरी चूड़ियां पहनीं। तैयार होकर फिर आईने के सामने खड़ी हुई।
आईने में दिख रही खूबसूरत शख्स को देखकर वो मुस्कुराई। मन में आवाज आई - "जिंदगी इतनी बुरी भी नहीं है।"
उसने खुद से कहा, "मीना, मैं जरूर जाऊंगी तीज के कार्यक्रम में।"
प्रिय सखियों, खुद से प्यार करना बहुत जरूरी है। समस्याएं तो सबके जीवन में हैं। संघर्ष तो सबको ही करना है। लेकिन खुद को एक बार आईने में जरूर निहारो और बोलो - "वाह! जिंदगी खूबसूरत है।"
अगर तुम खुश रहोगी तो दुनिया स्वतः ही सुंदर लगने लगेगी। सावन बाहर भी बरस रहा था और मीना के मन में भी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब बादलों के साथ उसकी आंखों में भी उम्मीद की रिमझिम थी।
वो हरी साड़ी में, हाथों में टोकन लेकर घर से निकली। आज वो सिर्फ तीज मनाने नहीं जा रही थी। वो अपनी पुरानी "मीना" को वापस लाने जा रही थी।
*|| सावन की बधाई ||*
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली