क्रीमी लेयर (Creamy Layer) अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का वह संपन्न वर्ग है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुका है। इस श्रेणी में आने वाले लोगों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है। इसका उद्देश्य आरक्षण का फायदा केवल वास्तव में जरूरतमंद और पिछड़े लोगों तक पहुँचाना है।
मुख्य बातें और नियम
शुरुआत: इस सिद्धांत को वर्ष 1992 के प्रसिद्ध इंदिरा साहनी मामला (Indra Sawhney Case) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य किया गया था।
वार्षिक आय सीमा: वर्तमान नियमों के अनुसार, जिन परिवारों की सभी स्रोतों से कुल वार्षिक आय ₹8 लाख या उससे अधिक है, वे क्रीमी लेयर के अंतर्गत आते हैं।
सरकारी पद: उच्च पद (जैसे आईएएस, आईपीएस या ग्रुप-ए/ग्रुप-बी अधिकारी) पर कार्यरत माता-पिता के बच्चों को भी इस दायरे में रखा गया है।
नॉन-क्रीमी लेयर: जो लोग इस आय सीमा से नीचे आते हैं, वे 'नॉन-क्रीमी लेयर' में माने जाते हैं और आरक्षण का लाभ पाने के पात्र होते हैं।
क्रीमी लेयर काला कानून क्यों?
मैं अपने देश और देश के सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करता हूँ और उनके फैसलों का भी सम्मान करता हूँ। लेकिन मैं क्रीमी लेयर को काला कानून इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जब संविधान निर्माता भारत एवं विश्व रत्न डॉ बाबा साहब भीम राव अंबेडकर जी sc, st के लिए विशेष आरक्षण और ओबीसी के लिए अनुच्छेद 340 दिए। तब क्रीमी लेयर का प्रावधान नहीं किए। sc ST और obc इन तीनों वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान इसलिए किया गया क्योंकि ये तीनों आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति से पिछड़ गए थे। इन तीनों को मुख्य धारा में लाने तथा इनको भी सम्मान से जीने का हक मिल सके। जबकि इसके उल्टे क्रीमी लेयर जातिवाद को बढावा देता है। वो कैसे? यहाँ जातिवाद खत्म करने की बात की जा रही है। लेकिन क्रीमी लेयर से आरक्षण खत्म होगा। जबकि सबसे बड़ी बीमारी जातिवाद है, और उसकी दवा आरक्षण है। मतलब आप चाहते हैं कि बीमारी रहे पर उसकी दवा ना रहे।
डॉ. बी.आर. आंबेडकर का क्रीमी लेयर पर विचार-
संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षण में आर्थिक आधार पर क्रीमी लेयर (Creamy Layer) के सिद्धांत का कोई प्रावधान नहीं किया था। उनके अनुसार, इन वर्गों के साथ होने वाला भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार आर्थिक स्थिति पर नहीं, बल्कि गहरी जातिगत असमानता और अस्पृश्यता पर आधारित था।
डॉ. आंबेडकर के मुख्य विचार
1.सामाजिक और आर्थिक स्थिति अलग: डॉ. आंबेडकर का तर्क था कि सामाजिक मुक्ति और आर्थिक प्रगति दो अलग-अलग रास्ते हैं।
2.जातिगत पहचान का बने रहना: यदि कोई दलित व्यक्ति शिक्षित या अमीर भी हो जाता है, तब भी समाज में उसकी जातिगत पहचान और उससे जुड़ा सामाजिक अपमान खत्म नहीं होता।
3.गरीबी उन्मूलन नहीं, प्रतिनिधित्व: एससी/एसटी आरक्षण कोई गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह सदियों से वंचित समुदायों को राज्य व्यवस्था में पर्याप्त प्रतिनिधित्व और सामाजिक गरिमा दिलाने का साधन है।
4.भेदभाव का आधार: आर्थिक संपन्नता किसी व्यक्ति से जातिगत भेदभाव या छुआछूत को मिटा नहीं सकती, इसलिए क्रीमी लेयर का नियम इन समुदायों पर लागू नहीं किया जा सकता।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख सुश्री मायावती ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान पर तीखा पलटवार किया है। मायावती ने कहा कि आरक्षण का लाभ स्वेच्छा से छोड़ने की सलाह देना और एससी-एसटी आरक्षण में 'क्रीमी लेयर' की बात करना संघ की जातिवादी और आरक्षण विरोधी सोच को दर्शाता है।
आरएसएस चीफ मोहन भागवत जी का कहना है कि जिनके घरों में आईएएस/ आईपीएस बन गए हैं उनको आरक्षण छोड़ देनी चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि जातिवाद बरकरार रहना चाहिए। जो आईएएस/आईपीएस बन गए हैं अगर वो आरक्षण छोड़ते हैं, तो क्या आप गारंटी लेंगे कि कल उनके बच्चे गरीब होंगे तो उन्हें आरक्षण मिलेगा या उनके मूल जड़ से ही आरक्षण खत्म हो जाएगा?
बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व उत्तर प्रदेश की भूतपूर्व मुख्यमंत्री मायावती जी का पलटवार
मायावती के मुख्य बिंदु
संवैधानिक अधिकार: मायावती ने स्पष्ट किया कि एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के लिए आरक्षण केवल आर्थिक लाभ या गरीबी हटाने की योजना नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन, आत्मसम्मान और बराबरी का संवैधानिक अधिकार है।
जातिगत भेदभाव: उनका कहना है कि सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव के प्रभाव को केवल आर्थिक प्रगति के आधार पर नहीं मापा जा सकता।
राजनीति न करने की नसीहत: मायावती ने आरएसएस को सलाह दी कि वह आरक्षण के मुद्दे पर राजनीति करना और समाज में भ्रम फैलाना छोड़ दे।
Er.Vishal Kumar Dhusiya