रक्षाबंधन से 10 दिन पहले विनीता ने अपनी जेठानी सरिता को फोन किया - "नमस्ते भाभी। क्या प्रोग्राम है आपका रक्षाबंधन पर। कहां बंधवाओगी राखी।"
फोन के उस पार से विनीता की आवाज आई - "गांव में तो कोई है नहीं आठ माह से बंद पड़ा है घर। जब से पिताजी बीमार हुए हैं, परिवार बिखर गया है।"
सरिता बोली - "मेरा तो प्रोग्राम फिक्स है विनीता। दो दिन पहले गांव जाऊंगी। आठ माह से घर बंद है, उसकी सफाई करवाऊंगी। वहीं बंधवाऊंगी राखी। हमारे पूर्वज भी आस जोह रहे होंगे। घर में त्योहार नहीं पूजेगा तो पूर्वज नाराज होंगे। मैंने मीना ननद से बोल दिया है, वो वहीं आ जाएगी बांधने। तुझे आना हो तो आ जाना। नहीं तो मीना के घर जाकर बंधवा लेना।"
"ठीक है भाभी" कहकर विनीता ने फोन रख दिया, पर मन भारी हो गया।
विनीता मंझली बहू है। शादी के बाद 12 साल तक वो सारे त्योहार इसी गांव वाले घर में मनाती आ रही थी। आंगन में तुलसी, रसोई में मिट्टी की हांडी, और हर त्योहार पर पूरे परिवार का शोर। पर पिताजी को लकवा मारने के बाद सब बदल गया। इलाज के लिए सास-ससुर को छोटी बहू के पास चंडीगढ़ शिफ्ट करना पड़ा। गांव वाला घर आठ माह से बंद पड़ा है। ताले में जंग लग गई है।
फोन रखकर विनीता बालकनी में गई। गमलों में पानी देते हुए उसकी आंखें भर आईं। उसे याद आया पिछला रक्षाबंधन। कैसे पिताजी चौकी पर बैठते थे और सबके हाथ में मिठाई रखते थे। सरिता भाभी साथ हम पूरे दिन रसोई बनाती थीं। अब वही आंगन वीरान है।
विनीता सोचने लगी। रिश्तों का जाल रिवाजों की आड़ में स्वार्थ सिद्ध कर रहा है। अभी तो सास-ससुर जिंदा हैं। असली में पहले पूर्वज तो वो ही जिनकी वजह से हम हैं। हमें उनके पास जाना चाहिए। त्योहार मनाना था तो बंद घर में क्या रखा है? वो तो बस दीवारों से घिरा मकान है।
घर दीवारों से नहीं इंसानों से बनता है। जो इस दुनिया में हैं ही नहीं, उन पूर्वजों को खुश करने के लिए ,300 km दूर गांव जाना जरूरी है? या जो सास-ससुर अभी जिंदा हैं, बिस्तर पर पड़े हैं, उनके पास जाकर त्योहार मनाना जरूरी है। वो बीमार हैं गांव नहीं आ सकते, लेकिन हम सब तो जा सकते हैं। एक दिन का समय निकालकर।
शाम को जब विनीता के पति रोहन आए तो विनीता ने सारी बात बताई। "सुनिए, इस बार रक्षाबंधन हम चंडीगढ़ मनाते हैं। मम्मी-पापा अकेले हैं वहां।"
रोहन ने जूते उतारते हुए टालते हुए कहा - "तुम अपना देखो। मेरे परिवार की चिंता मत करो। बड़ी भाभी जो करेंगी सही करेंगी। वो घर की बड़ी हैं।"
"पर रोहन, मम्मी-पापा भी तो हमारे माता-पिता हैं। पिछले साल भी हम नहीं गए थे।" विनीता का गला भर्रा गया।
रोहन झुंझला गया - "विनीता, हर बात में बहस मत करो। भाभी नाराज हो जाएंगी तो रिश्ते खराब होंगे।"
विनीता चुप हो गई। घर का माहौल खराब न हो इसलिए वो रसोई में चली गई। पर मन में एक सवाल बार-बार गूंज रहा था।
अगले दिन सरिता का फिर फोन आया - "सुन, मैंने पंडित जी से मुहूर्त पूछ लिया। 11 बजे राखी बंधेगी। तू आएगी ना?"
विनीता ने हिम्मत करके कहा - "भाभी, इस बार मैं चंडीगढ़ जाऊंगी। मम्मी-पापा का हाल ठीक नहीं है।"
सरिता फोन पर चीखी - "वाह! मतलब रिवाज तोड़ रही है। पूर्वजों की बेइज्जती करेगी?"
विनीता ने धीरे से कहा - "भाभी, मेरे लिए सबसे बड़े पूर्वज वो हैं जो अभी सांस ले रहे हैं।"
फोन कट गया।
रक्षाबंधन वाले दिन विनीता और रोहन चंडीगढ़ पहुंचे। सास ने बेटे-बहू को देखकर रोते हुए कहा - "तुम आ गए। लगा था इस बार भी कोई नहीं आएगा।"
उस दिन अस्पताल के कमरे में ही थाली सजी। छोटी ननद ने राखी बांधी। ससुर ने कांपते हाथों से 500 रुपये दिए और कहा - "बेटी, तूने घर बचा लिया।"
उधर गांव में सरिता अकेले ताला खोलकर राखी बांधकर आ गई। फोटो खींचकर स्टेटस लगाया - "पूर्वजों की परंपरा निभाई।"
*प्रिय पाठकों अब आप ही बताइए घर दीवारों से बनता है या इंसानों से। विनीता का मत सही है या सरिता का। हमारे पूर्वज कौन हैं - पहले जो जिंदा हैं या वो जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। आपके अनुसार विनीता को कहां जाना चाहिए था।*
*सीख:* रिवाज निभाना अच्छी बात है, पर रिश्ते बचाना उससे भी जरूरी है। क्योंकि दीवारें फिर बन जाएंगी, पर टूटे रिश्ते नहीं।
*समाप्त*
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली