golden memories in Hindi Children Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | यादों का खजाना

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यादों का खजाना

यादों का खजाना 

मोहन की शहर में नौकरी लगी तो वो अपने साथ परिवार को भी ले आया। दोनों ने एक कमरा किराए पर लिया और नए सिरे से गृहस्थी की शुरुआत की। दोनों के चार बच्चे हुए - दो लड़के और दो लड़कियां। बड़ा लड़का वरुण, फिर बड़ी लड़की विनीता, फिर छोटा लड़का अरुण और सबसे छोटी अनीता। चारों में तीन-तीन साल का अंतर था।

अनीता अभी बहुत छोटी थी। बाकी तीनों भाई-बहन पास के ही स्कूल में पढ़ने जाते थे। वरुण चौथी में, विनीता पहली में और अरुण एल.के.जी. में। तीनों साथ-साथ जाते। स्कूल पांचवी तक ही था इसलिए जब वरुण छठी में पहुंचा तो उसे बड़े स्कूल जाना पड़ा। अब विनीता और अरुण ही साथ जाते। 

पहले के समय में इतने क्राइम नहीं होते थे। बच्चे खुद पैदल स्कूल चले जाते थे। आज के समय में तो आठवीं के बच्चों को भी मम्मी लेने आती हैं। विनीता और अरुण रास्ते में पकड़-पकड़ाई खेलते, मस्ती करते जाते। कभी कोई बैलगाड़ी जाती तो उस पर बैठ भी जाते।

एक बार स्कूल में अरुण का झगड़ा हो गया। एक लड़का उसे पीट रहा था। विनीता ने देखा तो तुरंत भिड़ गई - "मेरे भाई को क्यों मारा?" घर आकर उसने मम्मी को गर्व से बताया कि कैसे उसने अरुण की जान बचाई। विनीता को आदत थी हर बात मम्मी को बताने की। स्कूल से आते ही शुरू हो जाती - "मम्मी आज मैम ने मेरी तारीफ की, मुझे कॉपी में गुड मिला।"

शाम का समय सबसे प्यारा होता था। जब बिजली चली जाती तो मम्मी चारों को पास बिठाकर मौखिक पढ़ातीं। पहाड़े सुनतीं, शब्द-अंताक्षरी करातीं। वरुण बड़ी क्लास में था इसलिए अक्सर पढ़ाई में व्यस्त रहता। कभी-कभी सब कैरम-लूडो खेल लेते। मम्मी को हराने के लिए विनीता और अरुण दिनभर डिक्शनरी से नए शब्द याद करते, पर हरा नहीं पाते थे।

विनीता के पापा कभी-कभी स्कूल जाते हुए 50 पैसे या 1 रुपया दे देते। उसमें एक ही आइसक्रीम आती थी। दोनों भाई-बहन उसे आधा-आधा बांट कर खाते। बारिश का मौसम आता तो सड़कों पर घुटनों तक पानी भर जाता। मैडम डांटतीं - "क्या जरूरी था स्कूल आना, घर नहीं बैठ सकते थे?" पर विनीता और अरुण फिर भी स्कूल जरूर जाते।

बचपन की सबसे मजेदार घटना तब हुई जब एक दिन दोनों स्कूल से घर आ रहे थे। रास्ते में एक गधा खड़ा था। अरुण बोला - "गधे के कान नहीं होते।" विनीता ने कहा - "कान तो होते हैं, पर उसे हमारी बात सुनाई नहीं देती।" 

बस, गधे ने मानो उनकी बात सुन ली। वो अपने सारे दोस्तों को बुला लाया। थोड़ी देर में जिधर देखो उधर गधे ही गधे। दोनों डर गए। भागते-भागते एक घर में जाकर छुपे। जब सारे गधे चले गए तब निकले और एक साथ बोले - "आज के बाद कभी नहीं कहेंगे कि गधे को सुनाई नहीं देता।" घर आकर दोनों ने हंसते-हंसते मम्मी को पूरी कहानी सुनाई।

विनीता और अरुण दोपहर में कभी नहीं सोते थे। मम्मी के सो जाने पर चुपके से घर का काम कर देते - सफाई, बर्तन धोना। अखबार पढ़कर नए-नए प्रयोग भी करते। कभी आम का पना बनाते, कभी ठंडी लस्सी। अनीता सबसे छोटी और थोड़ी आलसी थी क्योंकि विनीता दीदी उसका सारा काम कर देती थी।

समय बीतता गया। चारों भाई-बहन बड़े हुए। पर वो छोटा सा कमरा, वो पैदल स्कूल जाना, वो 50 पैसे की आइसक्रीम, वो गधों से डरकर भागना... सब यादें बनकर रह गईं।

आज जब विनीता अपने बच्चों को कार से स्कूल छोड़ने जाती है तो उसे अपना बचपन याद आ जाता है। वो सोचती है - पहले सुविधाएं कम थीं, पर खुशियां ज्यादा थीं। रिश्ते पास थे, दिल बड़े थे। 

बचपन सिर्फ एक उम्र नहीं होती। वो एक एहसास है। जहां झगड़ा भी प्यार से होता था, और माफी भी गले लगकर मिल जाती थी।

*सीख:* पैसा कम हो तो भी जीवन खुशहाल हो सकता है, अगर परिवार साथ हो। बचपन की यादें ही वो खजाना हैं जो बुढ़ापे में भी हमें जवान रखती हैं।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली