"थोड़ा पानी से दूर खड़ा रहा कीजिए..."
शिवाय की बात सुनते ही शक्ति ने उसे घूरकर देखा।
"जब तैरना नहीं आता तो risk नहीं लेना चाहिए।"
शिवाय ने ये बात जानबूझकर तंज कसते हुए कही थी।
और शक्ति उसके चेहरे का वो तंज साफ़ समझ गई थी।
शिवाय इतना कहकर वहाँ से जाने के लिए मुड़ा ही था कि पीछे से शक्ति ने गुस्से में उसका हाथ पकड़ लिया।
शिवाय रुक गया।
उसने पलटकर शक्ति की ओर देखा।
शक्ति की आँखों में साफ़ गुस्सा था।
"आप होते कौन हैं मुझे ये बताने वाले कि मुझे क्या करना चाहिए?"
शिवाय ने उसकी आँखों में देखते हुए बिना किसी झिझक के जवाब दिया—
"Your savior."
शक्ति की भौंहें तन गईं।
"बकवास बंद करो।"
"तुमने मेरी जान बचाई, इसका मतलब ये नहीं कि तुम मुझे ज्ञान देने लगो।"
वह एक कदम आगे बढ़ी
शक्ति का गुस्सा देखकर अब शिवाय का भी पारा चढ़ गया।
उसने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा—
"Oh madam! एक तो मैं पानी में कूदकर तुम्हारी जान बचाता हूँ... और तुम मुझे ही blame कर रही हो?"
उसने हल्के से सिर हिलाया।
"आजकल तो भलाई का ज़माना ही नहीं रहा।"
शक्ति ने तुरंत जवाब दिया—
"Oh mister!"
"तुमसे किसी ने कहा था मुझे बचाने के लिए?"
"मत आते!"
उसने गुस्से में नज़रें दूसरी ओर फेरते हुए धीमे स्वर में कहा— "और मैं पानी में गिरी भी तुम्हारी वजह से थी।"
शिवाय ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
"अच्छा?"
"तो अब एहसान मानना तो दूर की बात है..."
"तुम तो उल्टा मेरे ही सिर पर चढ़ी जा रही हो!"
शक्ति और शिवाय आपस में बहस करने लगे। वहीं दूसरी ओर…
शिवानी ने भी अपनी हँसी रोकने की कोशिश की।
रुद्र तो बाकायदा इस पूरी बहस का मज़ा ले रहा था।
वह धीरे से कार्तिक के पास झुककर बोला—
"भाई की पहली मुलाकात तो बड़ी यादगार रही।"
कार्तिक ने मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया।
उधर...
शक्ति और शिवाय अब भी एक-दूसरे को घूर रहे थे।
दोनों को शायद अभी तक अंदाज़ा नहीं था...
कि कुछ ही मिनट पहले हुई ये पहली मुलाकात...
उनकी ज़िंदगी की सबसे अजीब और सबसे खास शुरुआत बनने वाली थी।
शक्ति ने शिवाय को घूरते हुए कहा—
"तुम्हें हर बात में अपनी राय देना ज़रूरी लगता है?"
शिवाय ने शांत स्वर में जवाब दिया—
"जब सामने वाला अपनी परेशानी खुद बढ़ा रहा हो, तब चुप रहना सही नहीं लगता।"
"मेरी परेशानी मैं खुद संभाल सकती हूँ।"
"अभी तो नहीं संभल पाई थीं।"
शक्ति कुछ पल उसे देखती रही।
शिवाय गुस्से में शक्ति की ओर बढ़ते हुए बोला—
“मैं न तो किसी और का एहसान रखता हूँ, न ही किसी पर करता हूँ।”
शक्ति की भौंहें तन गईं।
शक्ति ने गुस्से में एक कदम उसकी ओर बढ़ाया।
"तुम मुझे जानते नहीं हो।"
"जानता नहीं हूँ।"
शिवाय ने शांत स्वर में कहा—
"लेकिन जो सामने देखा है, उसके बारे में बोलने के लिए किसी पहचान की ज़रूरत नहीं।"
पीछे खड़े रुद्र और कुशल एक-दूसरे को देखने लगे।
शिवानी और कामाक्षी भी चुपचाप दोनों की बहस सुन रही थीं।
अलिशा ने धीरे से कहा—
"दीदी, अब चलें?"
शक्ति ने उसकी बात सुनी, लेकिन उसकी नज़र अभी भी शिवाय पर थी।
“मैं तुम जैसे इंसान से कभी दोबारा मिलना नहीं चाहती।”
शिवाय ने सख़्त लहज़े में कहा— “मैं भी।”
शिवाय ने शक्ति की ओर देखते हुए कहा—
"आप हर बात पर इतना गुस्सा करती हैं... शायद इसी वजह से किसी को अपने करीब आने नहीं देतीं।"
शक्ति एकदम शांत हो गई।
उसकी आँखों के सामने अचानक कुछ पुरानी यादें कौंध गईं।
पलकों पर नमी उतर आई।
अलिशा ने शक्ति की तरफ देखा और तुरंत समझ गई कि शिवाय की बात ने अनजाने में उसके पुराने ज़ख्म को छू दिया है।
शक्ति ने खुद को संभाला और शिवाय की ओर देखा।
अगले ही पल—
चटाक!
एक थप्पड़ शिवाय के गाल पर पड़ा।
घाट पर सन्नाटा छा गया।
शिवाय ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
शक्ति की आँखों में गुस्सा और नमी दोनों थीं।
वहाँ खड़े सभी लोग स्तब्ध रह गए।
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझ पर हाथ उठाने की? तुम—”
“चुप! एकदम चुप!”
शक्ति का गुस्सा अब हद से ज्यादा बढ़ चुका था। उसने शिवाय की ओर उंगली उठाते हुए कहा।
तभी अलीशा बीच में पड़ते हुए बोली—
“दीदी, बस कीजिए। चलिए यहाँ से।”
फिर उसने शिवाय की ओर देखते हुए कहा—
“शिवाय जी, मैं आपसे माफ़ी मांगती हूँ। दीदी की जान बचाने के लिए थैंक यू… लेकिन अब हमें चलना चाहिए।”
शिवाय ने शक्ति की आँखों में ठहरी नमी देखी।
अब उसे अंदाज़ा हो चुका था कि उसने जाने-अनजाने में कुछ ऐसा कह दिया था, जो शक्ति के किसी पुराने दर्द को छू गया था।
उसने पहली बार ध्यान से उसके चेहरे को देखा।
शक्ति की आँखों में अब भी नमी थी, लेकिन वह उसे छिपाने की कोशिश कर रही थी।
शक्ति ने शिवाय की तरफ़ एक बार देखा।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस पलटी और तेज़ कदमों से वहाँ से चली गई।
अलिशा ने तुरंत उसका पीछा किया।
लेकिन शक्ति ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
घाट पर खड़े बाकी सभी लोग बस उन्हें जाते हुए देखते रह गए।
शिवानी ने चुपचाप शिवाय की तरफ देखा।
रुद्र भी बिल्कुल शांत खड़ा था।
कुशल की नज़र भी शक्ति के जाते हुए कदमों पर टिकी थी।
और शिवाय...
वह वहीं खड़ा रहा।
उसकी नज़र उस रास्ते पर थी, जहाँ से शक्ति अभी-अभी चली गई थी।
उसे सिर्फ़ इतना समझ आया था—
उसने अनजाने में शक्ति के किसी पुराने दर्द को छू दिया था।
शक्ति के वहाँ से चले जाने के बाद शिवाय का गुस्सा कुछ हद तक शांत हो चुका था।
लेकिन उसके मन में एक नई कसक उठने लगी थी।
इतने लोगों के सामने शक्ति ने उसे थप्पड़ मारा था।
वह मानता था कि शायद उसने कुछ गलत कह दिया था...
ठीक है।
वह उसे साफ़ कह सकती थी—
"मेरी personal life में interfere मत करो।"
शिवाय कभी दोबारा उस बात का ज़िक्र नहीं करता।
लेकिन थप्पड़?
उसने तो उसके अतीत के बारे में कुछ जाना तक नहीं था।
उसे क्या पता था कि उसकी कही एक बात शक्ति के किसी पुराने दर्द को छू जाएगी?
शिवाय ने गहरी साँस ली।
गुस्सा अब पहले जैसा नहीं था...
लेकिन उस थप्पड़ का सवाल अब भी उसके मन में कहीं अटका हुआ था।
शिवाय ने आख़िरी बार उस रास्ते की ओर देखा, जहाँ से शक्ति चली गई थी।
कामाक्षी ने शिवानी की ओर देखा और उसे एक इशारा किया।
दोनों शिवाय के पास आईं।
"भाई सा... चलें यहाँ से?"
शिवाय ने कुछ नहीं कहा।
बस अपना हाथ गाल से हटाया और बिना पीछे देखे वहाँ से चल पड़ा।
लेकिन उसके मन में एक बात अब भी गूंज रही थी—
"इस थप्पड़ का जवाब तो तुम्हें देना होगा..."
फिर शिवाय के चेहरे पर एक कठोर भाव आया।
"शिवाय प्रताप सिंह न किसी का उधार रखता है... और न अपना उधार छोड़ता है।"
क्या शख़्ति का शिवाय को मारा गया वो थप्पड़ उसकी ज़िंदगी में कोई नई मुसीबत लेकर आने वाला था?
जानने के लिए पढ़ते रहिए... Shakti Ke Shiv।