संकल्प मां का ,
आसमान बेटी का
रीना शहर में पली-बढ़ी आधुनिक विचारों की संस्कारी लड़की थी। पढ़ी-लिखी, अपने पैरों पर खड़ी होने का सपना देखने वाली। पर किस्मत को कुछ और मंजूर था। किसी पारिवारिक वजह से उसकी शादी गांव के एक रूढ़िवादी परिवार में हो गई।
ससुराल में कदम रखते ही रीना को लगा जैसे वो किसी पुराने जमाने में आ गई हो। यहां बड़े सख्त नियम थे। ससुर और जेठ के सामने बैठना मना था, खड़ा रहना पड़ता था। पर्दा करना जरूरी था। घर में सबसे आखिर में खाना मिलता था - पहले सबको खिलाओ, फिर खुद खाओ।
पहले-पहले रीना घुटती रही। पर वो कमजोर नहीं थी। एक दिन उसने अपने पति विनीत से बात की। आंगन में बैठकर, बहुत प्यार से समझाया, "विनीत, सम्मान आंखों में होता है। किसी को अपना बनाने के लिए पहले उसे अधिकार देने होते हैं। इतनी पाबंदियों में कोई इंसान खुश कैसे रहेगा?"
विनीत समझदार था। उसने रीना की बात सुनी और साथ देने का वादा किया। उसके बाद से जब भी घर में कोई रीना को ताना देता, विनीत उसकी ढाल बनकर खड़ा हो जाता। "मेरी पत्नी कोई नौकरानी नहीं है। वो इस घर की बहू है और इज्जत की हकदार है।" धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। सच ही है, जिसका पति साथ दे, उस स्त्री को दुनिया की कोई ताकत झुका नहीं सकती।
करीब 6 साल बाद रीना के घर नन्ही परी आई। अस्पताल में जब डॉक्टर ने कहा "बेटी हुई है", तो रीना की आंखें भर आईं। पर घर पहुंचते ही सास का चेहरा उतर गया। उन्हें पोता चाहिए था।
उस रात रीना सो नहीं पाई। सुबह उसने विनीत का हाथ थामा और कहा, "देखो, हमारी संतान लड़की है। लड़का-लड़की में क्या फर्क है? इसी नन्ही जान ने तो हमें मां-बाप बनने का गौरव दिया है। मैं चाहती हूं तुम आगे बढ़कर मां से बात करो। लड़के के जन्म पर जो खुशी मनाते हैं, जो रस्में निभाते हैं, मैं वही सब अपनी बेटी के लिए करना चाहती हूं। अगर आज तुम चुप रह गए, तो कल ये घर मुझे और मेरी बेटी को रोज ताने देगा।"
विनीत को बात समझ आ गई। हॉस्पिटल से घर आते समय उसने पूरे रास्ते पटाखे चलवाए। घर के दरवाजे पर रीना और बेटी का थाल सजाकर आरती की। सारे घर को गुब्बारों से सजाया। मोहल्ले में मिठाई बांटी और ऊंची आवाज में कहा, "मेरे घर लक्ष्मी आई है। जो रीति-रिवाज बेटे के लिए होते हैं, वही सब मेरी बेटी के लिए होंगे।"
रीना की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। कोने में खड़ी सास सब देख रही थीं। वो बेटे से रिश्ता खराब नहीं करना चाहती थीं। इसलिए उसी दिन उन्होंने भी बेटे की खुशी में साथ दिया। पूरे मोहल्ले को दावत दी गई। सभी रीति-रिवाज विधि-विधान से पूरे किए गए।
समय पंख लगाकर उड़ गया। रीना ने एक दिन भी अपनी बेटी से भेदभाव नहीं किया। बेटी के स्कूल का पहला दिन था। रीना ने खुद उसे तैयार किया, नजर का काला टीका लगाया और स्कूल छोड़ने गई। जाते-जाते उसने मन में संकल्प लिया - "मैं अपनी बेटी को इतना काबिल बनाऊंगी कि दुनिया उसके नाम से पहचानी जाए।"
रीना और विनीत ने बेटी को हर वो सुविधा दी जो एक बेटे को मिलती है। ट्यूशन, खेल, किताबें - किसी चीज की कमी नहीं होने दी।
और फिर वो दिन आया। 22 साल बाद। रीना की बेटी आईपीएस अधिकारी बनकर अपने ही जिले की सुरक्षा संभाल रही थी। पूरे जिले में उसका नाम था।
आज गांव में उसके सम्मान में बड़ा समारोह था। मंच पर जब बेटी ने वर्दी में सलामी दी, तो तालियों की गड़गड़ाहट से आसमान गूंज उठा।
सबसे आगे रीना की सास बैठी थीं। समारोह के बाद वो खुद मंच पर आईं। माइक थामकर, गर्व से कहा - "ये मेरी पोती है। किसी लड़के से से कम नहीं है। आज मैं गर्व से कह सकती हूं कि बेटी होना गर्व की बात है। मेरा गर्व है मेरी पोती।"
सभा में तालियों का शोर फिर से गूंज उठा। रीना की आंखें भर आईं। उसने विनीत का हाथ थामा। विनीत ने धीरे से कहा, "देखो, हमने हार नहीं मानी थी ना?"
रीना ने आसमान की तरफ देखा। उसे लगा जैसे उसकी वो सारी घुटन, वो सारे ताने, आज सब सार्थक हो गए।
एक बेटी ने पूरे घर की सोच बदल दी। एक पति के साथ ने पत्नी को ताकत दी। और एक मां के संकल्प ने एक बेटी को IPS बना दिया।
सच में, बेटियां बोझ नहीं होतीं। वो घर की शान, देश का भविष्य होती हैं। बस उन्हें उड़ान देने वाले पंख चाहिए।
समाप्त
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली