रीना जब पहली बार ससुराल गई, तो अजब ही रस्म देखी।
जुलाई की चिपचिपी गर्मी, उमस भरा मौसम, और उस पर दुल्हन के भारी-भरकम कपड़े, ज्वैलरी। आते ही सास ने दहलीज पर आरती नहीं उतारी, सीधा पूजा-घर में ले गईं और एक घंटे तक पूजा-होम करवाया। तब जाकर नहाने को मिला।
नहाकर उसने हल्की साड़ी पहन ली, और भारी ज्वैलरी की जगह हल्की पहन ली। जेठानी ने देखा तो तुरंत सास के कान भर दिए। सास गुस्से में तमतमाती आईं — "हमारे यहाँ मुँह दिखाई की रस्म होती है। फिर से तैयार हो जाओ दुल्हन की तरह। घूँघट लंबा करना, नाक से नीचे तक।"
बेचारी रीना को भूख लग रही थी। किसी ने खाने को नहीं पूछा अभी तक और ये नया फरमान। दुखी मन से तैयार हो गई। लंबा घूँघट डाल उसे आंगन में चौकी पर बैठा दिया। दो-तीन चचेरी ननदों की ड्यूटी लगा दी उसके पास निगरानी के लिए। एक ननद डायरी-पेन लेकर बैठ गई हिसाब लिखने के लिए।
थोड़ी देर में महिलाओं का आना शुरू हो गया। आंगन में चौड़ा कालीन बिछा था। सभी उस पर बैठ लोकगीत गाने लगीं। कुछ कम उम्र की महिलाएं ढोलक पर नृत्य करने लगीं। रीना का भी मन हो रहा था देखने के लिए, लेकिन लंबे घूँघट के कारण उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे ही उसने कोशिश की घूँघट उठाने की, पास खड़ी ननद ने धमका दिया - "नहीं, घूँघट नहीं उठेगा। बैठी रहो चुपचाप।"
फिर मुँह दिखाई की रस्म शुरू हुई।
एक-एक महिला आती, रीना का मुँह घूँघट में ही देखती और 100 रुपये उसकी गोद में रखकर बोलती - "लाली बहु तो बहुत सुंदर है। चांद है चांद।" पास में बैठी ननद ने तुरंत उनका नाम और नेग की रकम डायरी में लिख ली।
धीरे-धीरे एक-एक कर महिलाएं आतीं, मुँह देखकर नेग देतीं, फिर से घूँघट कर देतीं।
मुंशी बनी ननद सभी के पैसों का हिसाब रख रही थी। करीब दो घंटे तक चली मुँह दिखाई के बाद सभी महिलाओं को लड्डू बांटे गए और लड्डू लेकर सब अपने घर चली गईं।
रीना ने गहरी सांस ली और अपने कमरे में जाकर कपड़े बदले। जैसे ही रीना आराम करने के लिए बैठी, सास और ननद अपनी डायरी लेकर आ गए हिसाब से।
"बहू जो पैसे तुझे मुँह दिखाई में मिले हैं, सारे मुझे दे। वो तेरे नहीं हैं। व्यवहार तो मुझे ही निभाना पड़ता है। मुझे भी देने हैं उनके कारजों में।"
सास-बेटी ने डायरी से पैसों का हिसाब मिलाया और सब ठीक लगने पर पोटली बांधी, अपने बैग में डाली और चल दी।
रीना ने डरते-डरते कहा - "माँ जी, भूख लगी है।"
सास ने अपनी बेटी से कहा - "कुछ खाने को ले आ। सुन रीना, ससुराल में पहली बार खाना खाने के बाद थाली में नेग रख देना, खाली नहीं छोड़ते। और हाँ, जो साड़ी अपने मायके से लाई है मेरी बेटी को दिखा दे, उसे जो अच्छी लगेगी वो रख लेगी।"
दोनों के जाने के बाद रीना सोचने लगी।
"ये कैसी मुँह दिखाई की रस्म है! दो घंटे नुमाइश की वस्तु बनाकर मुझे बिठाया गया। और नेग सारा सासू माँ ले गईं। मुझे क्या मिला... मैं तो ठन-ठन गोपाल... कहाँ हो कान्हा।"
उसका घूँघट अब सच में उठ गया था।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली