संयोगिता की हंसी कमरे में गूंज उठी। यह कोई सामान्य हंसी नहीं थी। यह एक ऐसी हंसी थी जिसमें पागलपन, दर्द और खौफ का मिश्रण था। इसे सुनकर सबकी रूह कांप गई। ऐसा लग रहा था जैसे वह पूरी तरह से अपनी मानसिक संतुलन खो चुकी है।
फिर वह उठी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, लेकिन इरादे मजबूत थे। वह अपनी ही हवेली की दीवार की तरफ बढ़ी, जहाँ महक का खून छिड़का हुआ था।
उसने अपने खून से सने हाथ से दीवार पर एक नया मुहावरा लिखा -
पाप का अंत विनाश है।
लिखने के बाद, वह वापस महक की लाश के पास गई। महक अब भी सांस ले रही थी, लेकिन बहुत धीमी। संयोगिता ने उसके ऊपर झुककर गुर्राते हुए कहा—
संयोगिता बोली -
तूने मेरे बच्चे को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। मैं तुझे नहीं छोड़ूंगी।
और फिर वह लगातार चाकू घोंपने लगी। *सर्र... सर्र...* हर वार के साथ खून की फुहारें निकल रही थीं। संयोगिता पूरी तरह से खून से लथपथ हो चुकी थी। उसका चेहरा, उसके हाथ, उसकी साड़ी... सब कुछ लाल था। वह चीख रही थी, लेकिन यह चीख गुस्से की नहीं, बल्कि उस दबाव की थी जो सालों से उसके अंदर था।
पूरा परिवार दहशत में था। गंगा जी बेहोश होने वाली थीं। काजल और वर्षा रो रही थीं। अर्जुन अंकल स्तब्ध थे। घर में जगह-जगह खून फैला हुआ था। माहौल में मौत की गंध थी।
संयोगिता एक और बार चाकू घोंपने वाली थी कि तभी विराट ने छलांग लगाई और उसका हाथ पकड़ लिया।
विराट (चिल्लाते हुए) बोला-
नहीं संयोगिता! नहीं... ऐसा मत करो। बस कर दो। वह मर चुकी है।
संयोगिता ने विराट को जोर से धकेला। वह इतनी ताकतवर हो गई थी कि विराट पीछे लड़खड़ा गया।
संयोगिता (पागलों की तरह चिल्लाते हुए)बोली -
तो क्या करूं विराट! जिंदा छोड़ दूं इन अपराधियों को? ये लोग ना जाने कितने मासूम लोगों की जान ले लेते हैं। इनको कोई क्यों सजा नहीं देता? अगर मैंने सजा दी तो पुलिस मुझे ढूंढने लगी। अगर मैंने नहीं दी, तो ये फिर से मासूमों को मारेंगे। बताओ विराट, मैं क्या करूं?
विराट संयोगिता को देखता रहा। उसकी आँखों में अब डर के साथ-साथ एक गहरा दुख भी था। उसे समझ आ रहा था कि संयोगिता पागल नहीं हुई है, बल्कि वह एक ऐसे सिस्टम के खिलाफ लड़ रही है जिस पर उसे भरोसा नहीं है।
विराट (धीमी, लेकिन दृढ़ आवाज में)बोला -
संयोगिता... तुम अकेली नहीं हो। अब हम साथ हैं। पुलिस नहीं, हम इनका अंत करेंगे। लेकिन इस तरीके से नहीं। इस खून से नहीं।
संयोगिता रुकी। उसकी सांसें तेज थीं। उसने विराट की आँखों में देखा। वहां झूठ नहीं था। तभी, बाहर पुलिस के सायरन की आवाज आई। महक के गुंडों में से एक भागते समय पुलिस को कॉल कर चुका था। संयोगिता ने चारों तरफ देखा। खून। लाश। और उसका परिवार, जो अब उसे एक राक्षस की तरह देख रहा था।
संयोगिता (मन में) बोली-
अब क्या होगा? क्या विराट मुझे बचाएगा? या पुलिस मुझे ले जाएगी?
विराट ने संयोगिता का हाथ थामा।
विराट बोला -
चलो संयोगिता। हमें इस कमरे से बाहर निकलना होगा। और इस कहानी को बदलना होगा।
लेकिन संयोगिता जानती थी कि कुछ कहानियां कभी नहीं बदलतीं। वे सिर्फ नए अध्याय शुरू करती हैं। और यह अध्याय... खून से लिखा गया था।
पुलिस की गाड़ियां हवेली के गेट पर रुकीं। सायरन की आवाज से पूरा मोहल्ला जाग उठा था। इंस्पेक्टर वर्मा सबसे आगे थे, हाथ में बंदूक ताने हुए वे अंदर दाखिल हुए। जो नजारा उन्होंने देखा, उससे उनके भी रोंगटे खड़े हो गए। ड्राइंग रूम में खून की नदी बह रही थी। महक की लाश एक कोने में पड़ी थी, जिसकी हालत देखकर अनुभवी पुलिसकर्मी भी सहम गए। और बीच में, खून से लथपथ, जमीन पर बैठी संयोगिता... बेजान सी, आँखें खुली लेकिन शून्य में टिकी हुईं। विराट तुरंत इंस्पेक्टर वर्मा के सामने आ गया। उसका चेहरा पीला था, लेकिन आवाज में दृढ़ता थी।
विराट बोला-
इंस्पेक्टर, यह आत्मरक्षा का मामला है। इस महिला ने मेरे परिवार पर हमला किया, मेरे बच्चे को बंधक बनाया। मेरी पत्नी ने अपनी और हमारी जान बचाने के लिए यह कदम उठाया।
इंस्पेक्टर वर्मा ने संयोगिता की तरफ देखा, फिर महक की लाश की तरफ। उसने अपने जूते से खून में सने चाकू को इशारा किया।
इंस्पेक्टर वर्मा (संदेह भरी आवाज में) बोले -
आत्मरक्षा? मिस्टर विराट, आत्मरक्षा में इंसान हमलावर को रोकता है। लेकिन यहाँ तो... यहाँ तो इसे नोच-नोच कर मारा गया है। इतनी बर्बरता से? क्या यह सिर्फ आत्मरक्षा थी?
विराट ने गहरी सांस ली। वह जानता था कि सच बोलने से संयोगिता जेल जाएगी और विवान अनाथ हो जाएगा। उसे एक ऐसा झूठ बोलना था जो विश्वसनीय लगे।
विराट बोला -
इंस्पेक्टर, आप नहीं समझ रहे। मेरी पत्नी... संयोगिता... उसका मानसिक हालत काफी समय से खराब चल रही है। ये बहुत ट्रॉमा में है। आज जब उसने देखा कि महक विवान को मारने वाली है, तो उसके अंदर का डर पागलपन में बदल गया। उसे होश नहीं था कि वह क्या कर रही है। इसे जेल की नहीं, अस्पताल की जरूरत है। साइकिएट्रिक ट्रीटमेंट की।
इंस्पेक्टर वर्मा ने संयोगिता को देखा। वह अभी भी वैसे ही बैठी थी, जैसे कोई पुतली हो। उसकी आँखों में कोई चेतना नहीं थी। यह नजारा विराट की बात को सच साबित कर रहा था। इंस्पेक्टर वर्मा ने अपने अधिकारियों को इशारा किया।
इंस्पेक्टर वर्मा बोले-
ठीक है। हम केस दर्ज करेंगे, लेकिन चूंकि यह आत्मरक्षा और मानसिक असंतुलन का मामला लग रहा है, हम इसे अभी गिरफ्तार नहीं करेंगे। लेकिन मिस्टर विराट, मैं आपको चेतावनी देता हूँ... अगर यह दोबारा हुआ, तो कानून किसी को नहीं छोड़ेगा। और इस महिला का मेडिकल टेस्ट अनिवार्य है।
पुलिस ने महक की लाश को उठाया और वहां से चली गई। कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया। संयोगिता वहीं जमीन पर बैठी रही, खून से लथपथ, बेजान सी। कुछ देर बाद, जब खौफ थोड़ा कम हुआ, तो परिवार वाले एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। गंगा जी रो रही थीं। काजल और वर्षा एक दूसरे से सटकर खड़ी थीं, डर से कांपती हुईं। अचानक, काजल ने हिम्मत जुटाई और चिल्लाई।
काजल बोली -
हम इस खूनी के साथ नहीं रह सकते!
सबकी नजरें काजल पर टिक गईं।
काजल (रोते हुए) बोली-
देखो इसे! यह इंसान नहीं, राक्षस है। इसने इतनी बर्बरता से किसी को मारा है। कल को अगर इसका दिमाग फिर से खराब हो गया, तो इसने विवान को नुकसान पहुंचाया तो? या हममें से किसी को? मैं इस घर में एक पल भी इसके साथ नहीं रहूंगी।
वर्षा ने भी सिर हिलाया, हालांकि उसकी आवाज कांप रही थी।
वर्षा बोली-
काजल सही कह रही है विराट। यह सुरक्षित नहीं है। विवान का सवाल है। अगर यह पागल हो गई, तो विवान की जान खतरे में है।
गंगा जी ने विराट की तरफ देखा, उनकी आँखों में आंसू थे।
गंगा जी बोलीं-
बेटा... काजल और वर्षा का डर सही है। संयोगिता... वह अब वैसी नहीं रही। उसे इलाज की जरूरत है, लेकिन यहाँ नहीं। हमारे घर में नहीं।
विराट स्तब्ध था। उसने संयोगिता की रक्षा के लिए पुलिस को झूठ बोला था, लेकिन अब उसका अपना परिवार ही उसके खिलाफ खड़ा हो गया था।
विराट बोला-
माँ... ये मेरी पत्नी है। ये विवान की माँ है।
काजल बोली-
ये विवान की माँ नहीं, एक किलर है भैया! क्या आप चाहते हो कि विवान बड़ा होकर अपनी माँ को जेल में या पागलखाने में देखे? या फिर कभी उसी के हाथों मरे?
विराट चुप हो गया। उसे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। जमीन पर बैठी संयोगिता ने यह सब सुना। उसके कानों में ये शब्द गूंज रहे थे—*खूनी, राक्षस, पागल, खतरा।*
उसने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखों में अब आंसू नहीं थे। बस एक गहरा, ठंडा अकेलापन था।
संयोगिता (धीमी, टूटी हुई आवाज में) बोली -
तो... तुम लोग चाहते हो कि मैं चली जाऊं?
कोई जवाब नहीं दिया। सबने नजरें झुका लीं। संयोगिता मुस्कुराई। एक कड़वी, दर्द भरी मुस्कान।
संयोगिता बोली-
ठीक है। मैं जाती हूँ। लेकिन याद रखना... मैं गई, तो विवान की सुरक्षा कौन करेगा? क्योंकि जो खतरा बाहर था, वह अब भी बाहर है। और अंदर... अंदर तो बस तुम्हारा डर है।
इतना कहकर संयोगिता उठी। उसके शरीर से खून टपक रहा था। वह लड़खड़ाते हुए सीढ़ियों की तरफ बढ़ी, अपने कमरे की तरफ, ताकि वह कुछ कपड़े बदल सके और इस घर से हमेशा के लिए चली जाए।
विराट उसे देखता रहा। वह उसे रोकना चाहता था, लेकिन परिवार के दबाव और संयोगिता की उस हालत ने उसे जकड़ दिया था। संयोगिता अपने कमरे में गई। उसने एक बैग उठाया। उसमें उसने अपने कुछ कपड़े और वह डायरी रखी जिसमें उसके 'शिकार' के नाम थे।
लेकिन तभी, उसके फोन पर एक मैसेज आया -
**अकेली मत होना, संयोगिता। खेल तो अभी शुरू हुआ है।**
संयोगिता ने फोन को देखा। यह वही नंबर था जो पहले आया था। उसकी आँखों में फिर वही चमक आ गई।
संयोगिता (मन में) बोली-
तुम सोचते हो कि मैं अकेली हूँ? तुम गलत हो। मैं अब अकेली नहीं हूँ। मैं आजाद हूँ।
उसने बैग उठाया और कमरे से बाहर निकली। नीचे, विराट अभी भी खड़ा था। संयोगिता ने उसे देखा, लेकिन रुकी नहीं। वह सीधे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ी।
विराट ने आवाज दी -
संयोगिता...
संयोगिता रुकी, लेकिन पीछे मुड़ी नहीं।
संयोगिता बोली-
अलविदा, मिस्टर विराट। विवान का ख्याल रखना। और सावधान रहना... क्योंकि शिकारी अब शहर में आजाद घूम रहा है।
और वह अंधेरी रात में गायब हो गई। विराट वहीं खड़ा रहा, टूटा हुआ, अकेला। और ऊपर, विवान के कमरे से रोने की आवाज आ रही थी। खेल बदल चुका था। अब संयोगिता शिकार नहीं, शिकारी थी।