Sadgi in Hindi Short Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | सादगी

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सादगी

 

 

उसको ऐसा लगा था कि बात बहुत लम्बी चलेगी, दुर तक जाएगी, अपना ज्ञान बघारूंगा, इधर-उधर की कुछ बातें करूंगा। सच और झुठ मिश्रीत बातों का प्रयोग करके , इसकी बोलती बंद रखुंगा और सामनेवाले के सामने स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर दुंगा। ऐसी ही सोच ने सोचनेवाले को ग्रसित कर रखा था। अहंकार से पूरा मन-मस्तिष्क जकड़ा हुआ था। मगर आप जैसा सोचते हैं वैसा हमेशा नहीं होता है। सामनेवाले की चुप्पी ने सारा मामला ही उल्टा कर दिया था। अहंकारी सोच पर पानी फेर दिया था।

व्यंग्य वाणों के प्रहार से भी विचलित नहीं हुआ और न ही सुनने वाले के चेहरे पर क्रोध की कोई रेखा ही उभरी । इसके विपरीत अहंकारी सोच वाला व्यक्ति ही आग बबुला हो गया और उसने कहा ’’ तुमको ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम हार ही जाओगे, मुझसे जीत भी तो सकते हो, और कोई झगड़ा ही थोड़े होगा। बातों के द्वारा एक दुसरे का ज्ञान भी तो बढ़ेगा। ’’

फिर भी सामनेवाला-सुनने वाला खामोश ही रहा, बस एक सरसरी निगाह से उसकी तरफ देखने के बाद, अगल-बगल बैठे हुए लोगों की तरफ देखा जो कि इसके दब्बूपन के प्रति अपनी धारणा बना चुके थे। खैर दोनों को एक ही जगह जाना था। दोनों एक प्लेटफाॅर्म से बाहर निकलकर एक दुसरे से गर्मजोशी से हाथ मिलाया और अपने-अपने रास्ते हो लिए।

टैक्सी पर बैठते वक्त सुनील ने इस आदमी के बारे में सोचा तो सारा रास्ता चुपचाप रहनेवाला इंसान दब्बू होने के नाटक तो नहीं कर रहा था, क्योंकि उसके हाथ मिलाने के अंदाज से वो बहुत असाधारण प्रतीत हो रहा था। सुनील के जेहन में यह भी बात आ रही थी कि आखिर चुपचाप रहकर उस आदमी को क्या मिला होगा, शेखी तो वो भी बघार सकता था, मैंने थोड़े ही मना किया था। सुनील के मन में यही बात पुरे रास्ते उमड़-घुमड़ रही थी कि उसका चुप रहना अच्छा था या मेरा किसी को नीचा दिखाकर खुद को श्रेष्ठ साबित करना अच्छा होता।

सोच तो सोच ठहरी चाहे किसी के बारे में बुरा सोचना, वक्त तो कट ही जाता है।

कार वाले ने अचानक ब्रेक लगायी और कहा ’’ सर, आपको तो यहीं उतरना था, मैं तो आगे ही बढ़ा जा रहा था। ’’

डाॅल्फिन ग्रुप ऑफ़ कम्पनीज की बिल्डींग ने सुनील को बहुत आकर्षित किया उसको लगने लगा कि यहाँ जाॅब करना मतलब पैसा, सम्मान और रूतवा सब मिलेगा। सुनील का नम्बर देर से आनेवाला था, बायोडाटा हाथ में होतू हुए भी ट्रेन पर मिले आदमी का सीधा-सादा चेहरा जेहन में घुम गया।

सुनील का उस आदमी के बारे में सोची गई सारी बात, सारा अंदाजा गलत साबित हुआ। किसी की नीचता और किसी की श्रेष्ठता का निर्णायक उसका वस्त्र-पहनावा ज्ञान नहीं होता, यह बात सुनील को समझ में आ गयी। सुनील ने ज्योेंहि कैबिन में प्रवेश किया तो वहा भौचक्का रह गया। बाॅस की कुर्सी पर बैठा वो शख्स अनिमेष, अपनी श्रेष्ठता को दर्शा रहा था। सुनील सवालों के जवाब देते तक हक्का-बक्का ही रहा।

झुकी हुई नज़र, टकटकी लगी हुई नज़र का सामना नहीं कर पा रही थी

 

समाप्त