Sach in Hindi Short Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | सच

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सच

 

सच

सच जानना था, सो चुपचाप हो गया। पता है, चुप होकर किसी के अन्दर से सच निकालने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। दरअसल ऐसी आग लगा दी थी, साँप-छुछुंदर वाला हाल हो गया था, न निगलते ही बने और न उगलते बने। अंततः उसको उगलना ही पड़ेगा। अपने मन की हलचल को अब तो वो छुपा ही नहीं सकता है। ऐसा ही प्रतीत हो रहा था विवके को। उसको लग रहा था कि आज मैंने अपने नाम को सार्थक कर लिया है। गोपाल से अब सच उगलवाकर ही छोड़ुंगा।

गोपाल तो बिल्कूल हक्का-बक्का था, उसको जब विवके ने बताया कि गौरी को आज किसी दुसरे लड़के के साथ देखा था। यह बात बिल्कूल गोपाल के गले नहीं उतर रही थी। होने को तो कुछ भी हो सकता है, किस्मत कब पलटी मार दे।

विवेक का सारा प्रपंच तो इसलिए था कि वो गोपाल के मुंह से गौरी के बारे में सुनना चाहता था। विश्वास तो पुरा था, फिर भी विचलित और व्यथित होकर गोपाल ने पुछा ’’ कहां देखा, कौन था। ’’

विवेेक ने कहा ’’ आखिर क्या पड़ी है तुमको उस लड़की के बारे में जानने की। ’’

गोपाल ने भी कहा ’’ हाँ, हमको क्या पड़ी है, उसके बारे में जानने की। वो कोई भी हो, हमको क्या फर्क पड़ सकता है भला। ’’

गोपाल अपने चेहरे पर झलक रही प्रश्नात्मक हवाइयां को छुपाने की कोशिश तो कर रहा था, मगर बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी।

विवेक अपने छोड़े गए तीर से गोपाल के दिल का लहू निकालने की प्रतीक्षा में एकटक निगाह से गोपाल की तरफ देख रहा था।

चुपचाप रहे व्यक्ति को देखकर या तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह आदमी कुछ भी नहीं जानता है या जरूर कुछ छुपा रहा है।

गोपाल अपने अंदर बात को तो छुपा ही रहा था, लेकिन विवेक भी सच जानने की मंशा को अब तक छुपाए बैठा था। सच का प्रकटीकरण ऐसा होगा किसी ने सोचा भी नहीं था। छुपा लेनक की मशक्कत और सच जानने की मशक्कत ने अचानक अपना दम तोड़ दिया, जब गौरी खुद चलकर वहाँ आ गयी।

गौरी को देखते ही गोपाल ने राहत की सांस ली। क्षण भर को खोया हुआ विश्वास वापस लौट आया। गोपाल और विवेक अब दोनों मौन खड़े थे।

गौरी ने विवेक से कहा ’’ गोपाल तो यहाँ तुम्हारे सामने खड़ा है, तुमने गोपाल को कहाँ और किसके साथ देख लिया था।’’

गौरी के इस सवाल पर गोपाल फिर हक्का-बक्का रह गया। विवेक का प्र्रपंच अब गोपाल का समझ में आया कि गोपाल अपने किसी मतलब के लिए गौरी और मुझ में दुरी बढ़ाने चाहता था। अगले ही क्षण गोपाल के मन में आया कि जरूर यह भी गौरी को चाहता होगा। गोपाल समझ गया कि मेरा सबसे अच्छा दोस्त, गौरी की दोस्ती का हासिल करना चाहता है।

गौरी ने गोपाल से कहा ’’ कहां खोए हो गोपाल। ’’

गोरी, गोपाल का हाथ, अपने हाथ में लेकर वहाँ से चली गयी और छोड़ गयी विवेक के मन में ढेरों सवाल, खटकने वाली और खटकाने वा

ली।

 

समाप्त