Ghungroos - 7 in Hindi Horror Stories by Shree Kriti books and stories PDF | घुँघरू - 7

Featured Books
Categories
Share

घुँघरू - 7

अनन्त देव की सहायता से मैंने उसके रहने की व्यवस्था जंगल के निकटतम गाँव वाराही में कर दी। घुँघरू अतीव सुन्दरी थी, गर्वीली - गुणवंत  और बहुत पैनी बुद्धि वाली थी। मैं उसके मोह में पड़ गया था। इस मोह में अंधा होकर मैंने कभी सोचा ही नहीं कि हमारे सनातन धर्म में ऐसी युवा स्त्री या तो सुहागन होती है या विधवा। फिर घुँघरू क्या है ? घुँघरू के प्रति प्रेम अत्यंत वेगमय था, आंखों पर पट्टी बंध गई ...  मैं प्रतिदिन सोचता की चलूँ घुँघरू को नयन भर देख आऊं, कभी जाता तो कभी संकोच वश थम जाता। आसक्ति में बेसुध मैं सत्य को देख ही नहीं पाया, मेरे पीठ पीछे क्या काण्ड हो चुका है जब तक मुझे पता चला काफ़ी देर हो चुकी थी। अब जाकर मुझे ज्ञात हुआ कि अनन्त देव को आजकल शिकार का इतना शौक क्यों चर्राया था, चस्का शिकार का नहीं घुँघरू का लगा था। अनन्त देव ने जब मुझे बताया तब तो विवाह का मुहूर्त भी शोधा जा चुका था, मुझे तो तैयारियों के लिए बुलाया था। मेरा संकोच तिरोहित, क्रोध से भरकर मैं बोल उठा, 
" मित्र ! यह क्या अनर्थ कर रहे हो ? "

अनन्त देव ने तुरंत मुस्कुरा कर कहा, 
" अनर्थ नहीं मित्र विवाह कर रहा हूँ। मुझे उससे प्रेम है। "

" यदि प्रेम है तो यूँ छुप-छुपा के विवाह क्यों ? अपनी बाकी रानियों की भांति धूमधाम से ब्याह के ले जाओ राजमहल में, रानी बना के । "

" तुम जानते हो माँ स्वीकार नहीं करेंगी इस प्रतिलोम विवाह को ... कदापि नहीं। "

" क्या उन्हें यह ज्ञात है ? "

" नहीं । "

" क्या उन्हें ज्ञात हैं कि आप विवाहित हैं, आपकी तीन रानीयाँ हैं ? "

" राजपूत - पतियों की सौ - सौ रानियां होती हैं । "

" तब तो यह अन्याय है ...छल है । "

" अन्याय नहीं ... छल नहीं, प्रेम है मित्र ! मैं प्रेम के हाथों विवश हूँ, मेरे दुविधाओं को न बढ़ाओ। "

यूँ अपनी प्रेम की प्रबलता दिखाकर ... विवशता बतला कर, अनन्त देव ने मुझे मौन धारण करने पे विवश कर दिया। वाराही गाँव में माता आदिशक्ति का बड़ा पूराना, जागृत मंदिर था, तय हुआ कि विवाह यहीं होगा। घुँघरू का श्रृंगार कराया गया। रंगीन रेशमी साड़ी, स्वर्ण के आभूषण, माणिक मोती के चंद्र हार। घुँघरू का रूप इन मणिमुक्ताओं से भी ज्यादा दीप्ति दे रहा था परन्तु मैंने नेत्र फेर लिये, मुझे इस मोह से मुक्ति चाहिए थी। मैं यंत्रणा से बींध रहा था, उसी क्षण वहाँ से निकल जाना चाहता था परन्तु व्यर्थ ... होता वो थोड़ी ही है जो इंसान चाहता है, होता वो है जो होनी है। भाॅंवर की रीति कराने के लिए गाॅंठ जोड़ने के लिए अनन्त देव ने मुझसे कहा। मैंने गॉंठ तो बाॅंध दी, परन्तु कसने में उंगलियाँ कॉंप रहीं थीं ... गाँठ पक्का हुआ नहीं !!!  विवाह का यह गाँठ कितना कच्चा था यह मुझे तब ज्ञात हुआ जब डेढ़ वर्ष पश्चात घुँघरू विरहिणी सी मेरे द्वार पर खड़ी थी, एक नन्हा सा बालक गोद में चिपकाये। अनन्त देव से मैंने एक निश्चित दूरी बना ली थी, मेरा अधिकांश समय वेदाध्ययन और अध्यापन में बीतता था ... विद्यार्थियों को वेदाभ्यास कराते - कराते। इस घड़ी भी मैं अपने अध्यापन के कुशासन पर बैठने के लिए निकला था कि घुँघरूओं की छन्न से आवाज़ आई, जिससे मैं चौंक उठा  ... यह झनकार कहाँ से आई ? ब्रह्मचर्य - धारक के कुटिया में कौन स्त्री है ?? परन्तु द्वार पर विरहिणी सी घुँघरू को देखकर मेरे पॉंव वहीं के वहीं ठमक गए। मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं थी, घुँघरू को ऐसी दशा में अपने द्वार पर देखके मुझे आभास हो गया था कि कुछ अघटित घट चुका है। बड़ी ही कठिनाई से मेरे मुख से निकला, 
" देवी आप !!! "

घुँघरू ने बहुत प्रयास कर स्वयं को संयत किया फिर रूद्ध कण्ठ से बोली, 
" गुरुपुत्र ! क्या स्वामी युद्ध क्षेत्र में हैं ? या फिर युद्ध में वह गंभीर रूप से आहत हो गए हैं ?? "

मैंने चौंक कर कहा, 
" युद्ध !!! कैसा युद्ध ??? "

उसकी उज्जवल विशाल नेत्र मुझ पर ठहर गए, ऐसे जैसे समय ठहर गया हो। मैंने पहले भी कहा था, घुँघरू परम बुद्धि शालिनी थी। मेरी प्रतिक्रिया देख वह बहुत कुछ अनकहा भी समझ ग‌ई, मुख पर मलिनता छा ग‌ई। 
उसका मौन मुझे डसने लगा, मैंने आतुरता से प्रश्न किया, 
" देवी ! समस्या क्या है ? आपकी यह दशा क्यों है ?"

घुँघरू असाध्य कष्ट में थी, आंखों से झरझर आंसू बहने लगे ... वे आंसू मेरे हृदय कुरेदने लगे। दुखिनी ने जो अपने दुर्भाग्य की कथा सुनाई, उसका सारांश इस प्रकार था, 
घुँघरू ने सर्वप्रथम अपने पूर्व - जीवन का परिचय दिया, बताया कि कैसे उसके दुर्भाग्य की शुरुआत हुई। उसके पिता रघुनंदन स्वामी शिवनगर के बड़े ज्ञानी और प्रतिष्ठित ब्राह्मण थे।  उन्होंने बचपन में ही उसका विवाह करवा दिया था परन्तु एक - दो वर्ष पश्चात ही सूचना आई की उसके माथे पर विधवा का कलंक लग चुका है। जबकि उसे न उस विवाह की याद थी और ना ही उसे अपने स्वर्गीय पतिदेव याद थे क्योंकि विवाह के समय वो मात्र छ: वर्ष की बालिका ही थी। इन तर्कों का समाज में कोई मोल न था, वैधव्य की कालिमा वो न धो सकी। बहुत शीघ्र उसके पिता भी संसार त्यागकर वैरागी हो गए, दुखिया माता घुँघरू को लेकर शारीरिक परिश्रम द्वारा अपनी जीविका चलाने लगी। शिवनगर के जमींदार वीर सिंह के हवेली में वह मुख्य महाराजिन थी, घुँघरू भी वहाँ अपनी माता की सहायता करने जाती थी। इसी तरह क‌ई वर्ष बीत गए, इस दौरान घुँघरू जमींदार वीर सिंह की धर्मपत्नी रोहिणी की बड़ी प्रिय हो गई। रोहिणी उसे अपने हवेली की महराजिन की पुत्री होने के कारण उसे अपने से हीन नहीं मानती थी बल्कि अपनी सखी मानती थी। फिर घुँघरू ने विपदा में पड़ी अभागी रोहिणी की कैसे सहायता की इसका वर्णन किया और इसके पश्चात बाबा बटेश्वर द्वारा गाँव के लोगों को जब यह ज्ञात हुआ कि उसने ही किचकन्या  की सहायता की थी तो गाँव वाले अत्यंत क्रोधित हो गए। क्रोधित गाँव के लोगों से बचने के लिये उसने जंगल का आश्रय लिया .... क‌ई दिन - क‌ई रात उस भयंकर जंगल में  भटकने के पश्चात अंततः वो हमें मिली .... शायद इतने घने - भयानक जंगल में उसकी रक्षा किचकन्या ने स्वयं की थी वरना घुँघरू का ऐसे जंगल में जीवित बचना संभव ही नहीं था। घुँघरू ने मुझे बताया कि उसने विवश हो कर हमसे अपनी पहचान छुपाने का पाप किया मगर जब अनन्त देव ने उसके समक्ष प्रणय - प्रस्ताव रखा तो उसने यह सारा सत्य अनन्त देव के समक्ष कह डाला था परन्तु सबकुछ जान कर भी अनन्त देव ने घुँघरू का परित्याग न किया बल्कि उससे विवाह के लिए अनुनय करने लगे। जिसे घुँघरू ने असीम उल्लास के साथ स्वीकार कर लिया। अनन्त देव ने उससे कहा कि विवाह के पश्चात भी एक वर्ष तक उसे इसी गाँव में रहना होगा, इसके बाद वह उसे बड़े धूमधाम से रानी बना कर राज - भवन में ले जायेंगे। घुँघरू धन - गौरव -सत्ता के लिए  लालायित नहीं थी इसलिए वह सहर्ष राजी हो गई। विवाह के बाद कुछ माह अतीव आनन्द में बीते। फिर धीरे - धीरे अनन्त देव का आना - जाना कुछ कम हो गया, घुँघरू से उन्होंने कहा कि राज- काज से उन्हें समय कम ही मिल पाता है। ऐसे ही उनकी आवाजाही कम होते - होते बिल्कुल ना के बराबर हो गई। अंतिम बारी जब घुँघरू से वह मिलने आये थे तो उन्होंने  उससे कहा था कि उनके राज्य पर संकट छाया है, युद्ध की स्थिति है। उस वक़्त घुँघरू गर्भवती थी, इसके बाद अनन्त देव अपने पुत्र का मुंह भी देखने न आये। इसका कारण घुँघरू ने यही समझा कि अनन्त देव अभी भी युद्ध क्षेत्र में हैं या फिर युद्ध में वह गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। अनन्त देव पर प्राणों का संकट जान कर ही वो विह्वल हो कर यहाँ आई थी परन्तु उसकी आशंका निर्मूल थी। वो जानती थी कि राज - भवन में प्रवेश यूँ संभव नहीं इसलिए वो मेरे पास सहायता की आशा लिए आई थी .............।
क्रोध से मेरा मुख रक्त वर्ण हो चुका था, ऐसी लंपटता की आशा मैंने अनन्त देव से नहीं की थी परन्तु उनसे अधिक क्रोध मुझे स्वयं पर आ रहा था कि क्यों मैं अपने वेदना में लिपटा यूँ सत्य की ओर से मुख मोड़ के शिथिल रहा, क्यों मैं मित्रता में अॅंधा हो गया ???  मेरा चित्त मुझे धिक्कार रहा था पर अदृष्ट को कौन रोक सकता है ??? 

क्रमशः...............