DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 2

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 2

"सलाम अम्मा साहब।" सुबह की रौशनी फैलने से पहले ही ऐवान-ए-सद्र में कुसुम की चंचल चहकती आवाज़ ने उसे रौशन कर दिया। 

अम्मा साहब ने दीवान की तरफ़ बढ़ते हुए कुसुम से पूछा "तुम यहां? बाक़ी की खादिमां कहां हैं?"

"बाबा को नींद नहीं आ रही थी इसी वजह से मैं नहीं सोई उनके लिए चाय बनाया फिर बाबा ने कहा मैं आपके पास आ जाऊं।" चाय की ट्रे दीवान वाली मेज़ पर रखकर कुसुम ज़मीन पर बिछी लाल नीली क़ालीन पर घुटनों के बल बैठ गई "आप ये गर्म गर्म ले लीजिए।" गर्म चाय की प्याली थमाकर वो खड़ी हो गई

"अम्हेल का क्या हाल है?"

"शरबती से पूछा था मैने, उन्होंने बताया रात ठीक से सोई थीं।" अलमारी की तरफ़ बढ़ते हुए उसने बेतकल्लुफी से बताया

"कहां जा रही हो?"

"आपके कपड़े ठीक करने।"

"क्यों, क्या सुरूर अभी तक नही आई?" 

"दाइजां तो आ गई है वो मय्या के साथ नाश्ता तयार कर रही है।"

"कपड़े सुरूर देख लेगी, तुम जाओ बाबा को देखो।" अम्मा साहब के हुक्म पर कुसुम चली गई और अम्मा साहब एकटक दरवाज़े को देखते हुए चाय की चुस्कियों में डूब गई।

"मैं अंदर आऊं?" कुछ देर बाद दरवाज़े को खटखटाकर सुरूर ने आवाज़ लगाया और अंदर आ गई और फ़ौरन उनकी तरफ़ बढ़ गई

"माफ़ी चाहती हूं अम्मा साहब, नाश्ता तैयार करवाने में देर हो गई।" मेज़ साफ़ करते हुए उसने बताया

"ठीक है जाओ कपड़े तयार कर दो मेरे।" उन्होंने गहरी सोच में डूबे हुए उसकी बात पर कुछ कम ध्यान दिया

"ठीक है।" सुरूर को डाट न पड़ने का सूकून मिल

"बेटा कैसा है तुम्हारा?" 

"बुख़ार है अभी, दवा दे दिया है और इनके साथ छोड़ के आई हूं उसे।"

"वैद्य को दिखाया न?"

"उन्होंने ही दवाएं दिया।" 

"कुछ बताया, कैसे बीमार हुआ था।"

"कह रहे थे की बारिश में खेलने की वजह से सर्दी लग गई है।"

"बच्चे को बारिश में जाने क्यूं देती हो?" 

"मैं यहां आ जाती हूं इस वजह से ध्यान नहीं दे पाती। ये रहते है तो बहुत ख़्याल रखते है मोहसिन का, कितनी कितनी बार उसकी वजह से काम से छुट्टी भी ले लेते है। कहने को तो 5 साल को है वो ख़ुद को इनका बाप समझता है, इतना शरारती हो गया है किसी की कुछ सुनता ही नहीं है।" कपड़े सही करते करते वो बोलती रही। उसकी बात पर अम्मा साहब ने मुस्कुराकर कहा 

"बच्चा शरारत करेगा ही, तुम उसे माजिद की ग़ैर मौजूदगी में महल ले आया करो।"

"सच मे?" कपड़े ठीक करके सुरूर मोहसिन को लाने की इजाज़त पर ख़ुश हो गई। 

कुछ घंटे बाद एक खादिमा से अम्मा साहब ने कुसुम को बुलवाया

"आपने बुलाया मुझे?" कुसुम ने आकर कहा

"तुम्हे ख़बर हैना की महल में ख़ास मेहमान है और वो अपने साथ सरो समान लेकर नहीं आई है?"

"जी अम्मा साहब।"

"तुमने उसकी तरफ़ कपड़े और सामान भिजवाए?"

"मैने कपड़े और कुछ सामान तयार कर लिए है, बस लेकर जा रही हूं। आप बेफिक्र हो जाइए।" 

"ठीक है,... मैथिली से कह देना ऐवान ए सद्र में आ जाए और मुंशीजी को भी मेरी तरफ़ भेज देना।"

"मैं सब कर देती हूं।"

अम्मा साहब से कहकर कुसुम कूदते भागते ऐवान-ए-सद्र से बाहर निकल गई। 
"ये लड़की समझ से बाहर है। पता नही चलता कब बचपना आ जाता है, कब समझदारी का ग़लबा आ जाता हैं।" उसे देख कर अम्मा साहब ने ख़ुद में सोचा

इक़ामतगाह की तरफ कुसुम गुनगुनाते हुए नाचते कूदते हाथों में बड़ा तश्त लिए बढ़ने लगी "बिन तेरे...कौन जिया ....हम्मम्मम...।" 

"कहां जा रही हो ये कपड़े लेकर?" 

बतौर शहज़ादी क़ायदे से तैयार होकर, पूरी तरह से अरस्ता अहलम ने उसके पास आकर उसको बीच में ही रोक लिया

"इक़ामतगाह।" उसने बेतकल्लुफ़ि से जवाब दिया

"जिन्हें कल अपने साथ लेकर आई हो क्या उनके लिए है ये?"  उसने तश्त की तरफ़ निगाह किए पूछा, उसमें नीले रंग का कपड़ा और कुछ शृंगार का सामन था

"हां।"

"अच्छा उनके पास जा रही हो। क्या मैं चल सकती हूं वहां?" अहलम ने दोस्ताना लहजे में पूछा।

"मुझे नहीं लगता की बाबा को आपकी ये बात पसंद आएगी।"

"कुछ नही होगा, नीचे के रास्ते से नही जाएंगे हम ऊपर वाले रास्ते से चलेंगे।" अम्हेल से मिलने की जुस्तुजू और ख्वाहिश में चंचल मन से अहलम  कुसुम को मनाने लगी। 

कुसुम कहने को तो वज़ीर शेख़ बाबा की बेटी है, मगर वो इस महल की दिल अज़ीज़ अहलम की बचपन की दिल अज़ीज़ दोस्त भी है इसलिए कुसुम महल में सभी के लिए ख़ास भी बन गई है। 

"मैं बतौर नवाज़ उनसे मिलूंगी, मैं देखना चाहती हूं वो कौन है आख़िर। तुमने देखा था उनकी आंखें कितनी चमक रही थीं।" अहलम ने उत्सुक होकर कहा

"मैं जानती थी आपके मन में कुछ चल रहा है। अगर बाबा को पता चला...।" कुसुम की बात ख़त्म होने से पहले अहलम  ने बोला

"उन्हें नहीं पता चलेगा ना।"

"ठीक है, मगर पकड़े जाने पर मैं इससे बाहर हो जाऊंगी बीबीजी।" दोस्त की तरह कुसुम अहलम को तंग करने लगी

"हां ना, नही बताऊंगी। मुझे तंग क्यों करने लगी?" दोनो अपनी ही बातों पर हस्ते हुए हमजोलियो जैसे एक साथ इक़ामतगाह की तरफ़ बढ़ गई। कुछ ही देर में अहलम और कुसुम अम्हेल के कमरे के बाहर खड़े हो गए

"मैं अंदर आ रही हूं।" कुसुम ने दरवाज़े पर से आवाज़ लगाई

"आ जाओ।" अम्हेल ने अपने कमरे से सटी छत के दरवाज़े पर से खड़े रहकर इजाज़त दिया। कुसुम को कमरे में आता देखकर अम्हेल उसकी तरफ़ मुड़ गई, उसका ध्यान अहलम पर भी पहुंचा

"अम्मा साहब ने आपके लिए ये समान भिजवाया है और कहलवाया है की आप जल्दी से तयार होकर ऐवान-ए-सद्र पहुंच जाएं।" नरमी और ख़ुशहाल मन से कुसुम ने वो कपड़े उसे थमा दिया

"ठीक है।" खोए हुए मन से अम्हेल ने जवाब दिया

"मैथिली दी कहां है?" कुसुम ने कमरे के चारों तरफ़ नज़र दौडा कर पूछा

"उसने कहा वो मंदिर जा रही है।" 

"अच्छा! हांआआ....आज तो शनिवार हैना, उनको तो जाना ही था।" उसने हर तरफ़ देखा फिर कहा

"वैसे अम्हेल आपी आपसे मिलने ख़ास तौर पर महल की दिल अज़ीज़ शहज़ादी आईं हैं।" पास खड़ी अहलम  को देखते हुए कुसुम ने अम्हेल को बताया जिससे अम्हेल ने भी अहलम की तरफ़ देखा। 

अहलम के गोल चेहरे पर की उसकी बड़ी बड़ी काली आंखें अम्हेल को ग़ौर से देख रहीं थी, और गुलाबी होंठ मुस्कुरा भी रहे थे। अहलम उसे देखकर कुछ चौंकी भी क्योंकि वो इस वक़्त कल रात वाली अम्हेल से काफ़ी अलग लग रही थी। 

"अम्मा साहब ने बताया आप बहुत ख़ास है इसलिए मेरी जुस्तुजू बढ़ गई है। मैं ख़ास आपसे मिलने आई हूं, आपके इस्तिक़बाल के लिए।" अहलम ने नर्मी से कहा "आपको ख़ुद अम्मा साहब लेकर आई है इसलिए मुझे ज़्यादा दिलचस्पी हो रही थी।... आप ज़रूर बहुत ख़ास होंगी।" 
उसका हर एक लफ़्ज़ रानाई से भरपूर था, और उसका लहजा मखमल से नर्म

"ऐसी बात नही है।" अम्हेल ने कहा 

"आप यहां वाक़ई पढ़ने आई है। क्या शेख़ बाबा से?" अहलम ने बेतकल्लुफी से जुस्तुजू किया

"हम्म्म।" 

अहलम मुस्कुराई

"आपको यहां रहना पसंद आएगा, यहां कोई मायूस नही रह सकता।" अम्हेल के चेहरे को देखते हुए अहलम ने रात के वक़्त को याद किया, अम्हेल इस बात पर थोड़ी हैरान हो गई जिसपर अहलम ने हंस दिया

"अम्हेल आपी अब आप जल्दी से तयार हो जाइए, अगर देर हो गई तो अब मुझे ज़रूर डाट पड़ेगी।" कुसुम ने कहा 

"आप तयार हो जाइए, हम चलते है।" अहलम ने कहा

"हम्म्म।" दोनों के जाने के बाद वो तयार होने चली गई।

आज मीरास महल में नए रिश्तों की एक बुनियाद क़ायम हुई, लेकिन नही मालूम ये बुनियाद खोखली होगी या मज़बूत। मीरास महल में कई रिश्तों ने कई लोगो को परेशान किया - किसी का किसी से पुराने वादे का रिश्ता तो किसी का किसी से बेनाम रिश्ता। 

कल तक जिसको नई जगह में नए लोगों के बीच आकर बेनाम सा महसूस हो रहा था आज उसके चेहरे पर, नई जगह पर नए रिश्तों के बनने से, मुस्कुराहट बिखर गई। पल भर के लिए शायद वो भूल गई कि ये जगह उसके लिए नई है, शायद वो भूल जाना चाहती है कि वो अनजान जगह अनजान लोगों के बीच आ चुकी है, पल भर के लिए वो ख़ुद को हर उलझनों और परेशानी से दूर कर लेना चाहती थी। 

पर ऐसा फिलहाल मुमकिन कहां था। जिंदगी में अक्सर ऐसा होता है की नाचाहते हुए भी उन चीजों का सामना करना पड़ जाता है जिसे याद भी नहीं करना चाहते और ऐसे हालात में घबरा भी जाते है। बस कुछ लोग होते है जो हालात को अपने क़ाबु में करना जानते है।