शहर में चारो तरफ़ ठंड का सन्नाटा छाने लगा, सड़को पर गहरे अंधेरे ठंडे माहौल को और ठंडा करने लगे थे, अंधेरा होते ही ठंडी हवाओं ने लहराना शुरू कर दिया, बहती हवाएं जिनमें अलग से कई एहसास चुप थे, लोगों को छू कर उन्हें अपने होने का एहसास दिलाने लगीं। काले अंधेरे में वो हवाएं लहरा लहरा के खेलती, खिलखिलाती उन्हें चिढ़ाने लगी, सताने लगी कि अब उन्हें छुपना नही पड़ेगा, के अब तो सूरज ख़ुद छुपा बैठा है।
वो कभी खेतों में जाती, कभी ऊंचे पेड़ो के पास जाकर उन्हें ख़ुशी से लहलहा कर बतातीं के अब तो काफ़ी वक़्त है सूरज के आने में, और अभी उनके पास सारी रात बाक़ी है। झूमते झूमते कभी वो सड़को पर उतर आती तो कभी महलों में चली जाती। उसे अब कोई फ़र्क नही पड़ता कि कौन काम पर से थक कर आया है और कौन शॉल लपेटे टोपी लगाए काम पर जा रहा है। महल के चारों तरफ़ कुछ ऐसा ही मंज़र था। सभी सिपाही शॉल लपेटे अपने अपने हथियारों के साथ मुख्य दरवाज़े पर अपनी अपनी जगह संभाले निगहबानी में खड़े थे।
ये सभी अपनी ज़िम्मेदारी की तरफ़ खंभे के मानिंद खड़े थे, जिन्हें कोई भी उनकी जगह से हिला नहीं सकता और महल की रौशनी की तरह रौशन, इतने रौशन की वो अपनी रौशनी दूर दूर तक बांट रहें थे।
"सारंगा भाई, सबके लिए चाय आई है, सभी को दे दीजिए।" कुसुम ने महल की दहलीज़ पर से आवाज़ लगाया
सारंगा भाई महल के सिपाहियो के सरबराह के मुख्या, ये सभी हमउम्र साथी हट्टे कट्टे,चालाक और बहादुर इतने कि इनके नाम से ही लोग डर जाते, इनके होते महल पर कोई आंख उठाकर कर देख नही सकता।
सारंगा भाई चाय थामकर सबको देकर कर ख़ुद भी पीने लगे। कुसुम चाय देकर ग़ज़ल गाते गुनगुनाते अपने कमरे में लौट गई जहां शेख़ बाबा कंबल ओढ़े, आंखो पर चश्मा लगाए किताब पढ़ रहे थे, उसके पहुंचते ही उसे सुनकर, हैरत से देखकर पूछा
"तुम्हे कबसे अपनी दुनिया से अलग गुनगुनाने का शौक़ हो गया?"
"जबसे अम्हेल आपी ने मुझे गज़लों और शेर शायरी की दुनिया की सैर कराया है, वो बहुत ख़ूबसूरत सुनाई देते है।" मासूमियत और भोलेपन से कुसुम ने जवाब दिया
"क्या उससे सीखा, उसे क्या ये भी शौक़ है?"
"हा ना बाबा उन्हें सिर्फ़ शौक़ नहीं उनके बाबा लिखते थे और जब वो उन्हें सुनाती है तो हम सब उसमें डूब जाते है....इसलिए तो अच्छी लगी न मुझे।"
"एक मौसम गुज़र गया उसे मुझसे मिलते पर उसने कभी इसका ज़िक्र नहीं किया मुझसे?"
"मैंने भी यही कहा था उनसे, उन्होंने कहा कभी मौक़ा नहीं मिला।"
"हां मौक़ा तो बहुत सी बातों का नहीं मिला।" शेख़ बाबा ने कुछ सोचकर कहा फ़िर पूछा "अपने कमरे में चली गई वो?"
"मैथिली दी के साथ गईं हैं।" कुसुम के जवाब के बाद शेख़ बाबा दुबारा चश्मा लगाकर किताब पढ़ने लग गए, कुसुम रुक्मणि को ढूंढने इक़ामतगाह की तरफ़ चली गई। वहां से मैथिली हाथ में ट्रे लिए अम्हेल के कमरे में पहुंच गई
"तुम वहां क्या कर रही हो?" अम्हेल के कमरे से लगी छत के दरवाज़े पर लगे मखमली नीले परदे को हटाते हुए मैथिली ने अम्हेल की तरफ़ बढ़ते हुए पूछा। उसके सवाल को नज़रअंदाज़ करते अम्हेल ने आसमान में पूर चमकीले चांद को देखकर मैथिली से पूछा
"क्या तुम जानती हो कि चांद क्यों सबके राजों को अपनी आग़ोश में ले लेता है?"
"ओहो, फिर शुरू हो गई तुम्हारी ये बातें, कहां से लाती हो ऐसी बातें तुम?" कमरे में आकर बिस्तर पर पड़ी किताबों को समेटते हुए मैथिली ने उसे चिढ़ाते हुए कहा "क्या शेख़ बाबा से आजकल ये फलसफे पढ़ती हो? चलो आओ अब कुछ खालो तुमने दोपहर में सही से कुछ खाया नहीं था, कुछ खालों फ़िर मैं अभी तुम्हारे लिए चाय ले आती हूं।"
मैथिली कमरे से चली गई, अम्हेल छत पर टहलते टहलते हवेली के दिनों को याद करने लगी, वो खुली जगह में चलती फिज़ाओं को महसूस करते हुए चारों तरफ़ के पेड़ पत्तियों को निहारने लगी।
चांद की चमकती रौशनी महल के बगीचों के फूलों पर पड़कर बिखरती उसे अपनी छत से साफ नज़र आ रही थी, वो खड़ी उन बिखरती रौशनी को देखने लगी, नज़र बढ़ते बढ़ते उसकी नज़र वहां सफ़ेद कुर्ते में टहलते हुए हट्टे कट्टे, ऊंचे ख़द के शक्स पर पड़ी, अम्हेल उसे ग़ौर से देखने की कोशिश करने लगी, उसके गोरे चेहरे पर चांद की रौशनी गिरकर चार चांद लगा रही थी, उसकी अंगूठियों भरी उंगलियां उसके काली मूछों और दाढ़ी को पोछती हुई नीचे हो गई, उसकी चमकती आंखें किसी ख़्यालों में गुम थीं।
अम्हेल उसे देखकर घबराते हुए फ़ौरन दूसरी तरफ़ पलट गई और हड़बड़ा कर अपने कमरे में लौट आई, उसी वक़्त मैथिली भी चाय लिए कमरे में दाख़िल हो गई, अम्हेल को बिस्तर पर सिकुड़कर बैठे देख उसकी तरफ़ दौड़ गई
"अरे क्या हुआ, ठंड लगने लगी?"
मैथिली ने बिस्तर पर रखा कंबल फ़ौरन अम्हेल पर डाल दिया "बग़ैर शॉल के छत पर टहलोगी तो यही होगा ना, अब इसे ओढ़कर बैठो और ये गर्म गर्म चाय पियो।"
चाय थमाते हुए मैथिली ने कहा, उसे थामकर अम्हेल कश्मकश में पड़ गई
"वो बाग़ीचा.....क्या उसमें आने जाने की इजाज़त है?" उसने हैरानी से पूछा
"हा वो खुला ही रहता है, कोई भी कभी भी आ जा सकता है।" मैथिली ने उसके शक को यक़ीन दे दिया
"मगर वो तो शाही बाग़ीचा हैना?"
"हा मगर उसे खुला रखा है क्योंकि वहां झील बनाया है ताकि कस्बे के लोगों को पानी की परेशानी न हो मगर अब तो बाहर भी झील बन गई है इसलिए इधर अब कम ही लोग आते है।"
"तुम कभी गई हो उस तरफ़?"
"हां गई हुं मगर ज़्यादा नही जाती, अकेले जाना पसंद नहीं और ज़्यादातर काम में ही रहती हूं। लेकिन अगर तुम्हें कभी चलना हो तो बताना हम साथ चलेंगे।"
"ठीक है।" उदास मन से अम्हेल छत पर देखते हुए चाय पीने लगी। थोड़ी देर में मैथिली सब लेकर कमरे से चली गई।
अम्हेल कंबल ओढ़े सिकुड़ कर बैठे बाहर देखते हुए चांद की ठंडी रौशनी से सजी ख़ूबसूरत दुनिया में डूब कर अपने ख़्यालों में खो गई
"मौसम बदलने लगे है। गर्मी भी ख़त्म, बारिश भी ख़त्म। एक मौसम को गुज़रने में कई दिन लग जाते है, यहां तो कई मौसम गुज़र गए उसके बाद भी बीते मौसम की पुरानी यादें क्यों नहीं गई, क्यूं हम एक ऐसे सूरते-हाल को बर्दाश्त कर रहे है जो हमने बनाई भी नही?
जो मौसम हमें अच्छा नही लगा उसे भूलने की तो पूरी कोशिश कर रहे है हम फिर आख़िर क्यों हम वो भूल नहीं पा रहे है, क्यों मेरा दिल अभी भी अकेला ही महसूस कर रहा है। क्या ये अकेली अंधेरी रात हमें नहीं बता रही की बस हम अकेले नहीं, हमारे साथ तो कई लोग है, मगर हमसे ज़्यादा तन्हा तो वो चांद है जिसके आसपास तो कोई भी नहीं।"
अम्हेल छत का एक चक्कर लगाते हुए वापस बग़ीचे की तरफ़ देखा, वहां कोई नही था, वो वही पर उसी हालत में बग़ीचे पर नज़र ठहराए बैठ गई
"हम उन्हें अब याद नहीं कर सकते, तो क्या हुआ अगर वो हमें नज़र आ गए। हम उस जगह पर नही की किसी का ख़्याल अपने ज़हन में ला सकें मेरी आज़माइश में हम नहीं शामिल करना चाहते एक और कर्ब से भरी दस्तान।"
ये सारी बातें सोचते सोचते उसके दिल में दर्द का सैलाब उठ गया जिसकी एक बूंद उसकी आंखों से टपक गई मगर उसने उसे ज़प्त करके उसे अपने कदमों से रौंदकर आगे बढ़ने का फैसला लिया।
उसे मालूम है उसकी ज़िंदगी कर्ब की दास्तान है और अब वो अपनी ज़िंदगी में और नई दास्तान नही लाना चाहती, वो जानती है वो एक ऐसी जगह पर है जहां वो कबतक है उसे ख़ुद भी नहीं मालूम, फिर वो अपनी और महल के हदों और उसूलों से भी ख़ूबवाक़िफ है, वो महल के अंदर अपने आप को किसी भी क़िस्से का मरकज़ नही बनाना चाहती, इसी वजह से वो किसी भी नई दास्तान की तरफ क़दम नहीं बढ़ाना चाहती।