Intezar in Hindi Short Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | इन्तजार

Featured Books
Categories
Share

इन्तजार


.


वार्डन ने आकर कहा ’’ मिलने का समय अब सामप्त हुआ। ’’ तो दोनों वार्डन की बात पर भौचक्के भी हुए और गुस्साए भी। कहने के लिए तो बहुत कुछ बचा था, मगर क्या कर सकते थे, वार्डन ठहरा सरकारी नौकर। उसको किसी का हाल-ए-दिल महसूस करने से क्या फायदा।
मयंक और निशा को अफसोस तो बहूत हुआ। मिलने के सिमित समय की पाबंदी में भी अधिकतर समय एक दुसरे को देखते हुए बीता। न निशा ने बात की शुरूआत की और न मयंक ने ही कुछ कहना प्रारम्भ किया। हाँ इतना जरूर था कि सलाखों के अन्दर मयंक और बाहर निशा एक दुसरे की हथेलियों को सहलाते हुए एक दुसरे को दिलासा दे रहे थे।
मयंक ने कहा ’’ साजिश करनेवाला का पता चले तो गुनहगार या निर्दोष साबित होउं। ’’
निशा ने मयंक की हथेली को सहलाते हुए कहा ’’ गुनहगार क्यों मानते हो खुद को, मेरा मन कहता है कि तुम निर्दोष साबित हो जाओगे। ’’
मयंक ने कहा ’’ मन का क्या। ’’ मयंक ने इतना ही कहा था तब तक वार्डन फिर सामने आकर खड़ा हो गया। वार्डन की ऑंखें स्पष्ट कह रही थीं कि ’’ अब क्या हाथ पकड़ कर बाहर करूं। ’’
इस बात को आज 7 दिन हो गए हैं। मयंक इस इन्तजार में है कि कब फैसला होगा और निशा इस इन्तजार में है कि कब प्रेम जीवन का व्यवधान दुर होगा।
खिड़की के पास बैठी निशा आते-जाते हुए लोगों को देख रही है, खिड़की के पास वो ज्यादा समय देने लगी है।
निशा की माँ ने आज अचानक पुछ ही लिया ’’ सारा दिन तु खिड़की के पास क्या करती रहती है। कल तो रात आठ बजे तक यहीं बैठे देखा तुमको, खाना खाने के बाद पहले और बाद में यहीं पसर जाती है, कोई बात है क्या, है तो बता तेरे पिता से बात कर उसका उपाय निकालूंगी। ’’
अब इस प्रश्न का निशा क्या जवाब देती भला, उसने ’’ कुछ भी तो नहीं। ’’ कहकर माँ को किचन में ले गयी और माँ का हाथ बंटाने लगी। ऐसा तो उसने इसलिए किया था कि माँ या पिता, भाई या बहन, कोई भी सवाल न करे, किसी को भी जवाब न देना पड़े।
मगर जो सवाल निशा के मन में कुंडली मारकर बैठा फुफकार रहा था, वो तो उसे अन्दर ही अन्दर कचोट रहा था। हालत यह हो गयी थी कि पता नहीं क्या हो, वो छुटे कि दिल टुटे। कब होगा फैसला और कब मिटेगा फासला, यही सवाल लगातार तोड़ रहा था निशा का हौसला। उदास रहूंगी तो घर वाले सवाल करेंगे, इसलिए निशा खुद को व्यस्त रखने लगी।
रात को लगातार करवट ले रही निशा ने अपनी माँ की नींद को तोड़ दिया और इस घटना ने उसकी माँ के प्रश्न को और पक्का कर दिया कि कुछ तो हुआ है।
इस बार तो निशा के पिताजी ने कहा ’’ तुम्हारी माँ कह रही थी कि तुमको नींद नहीं आती है और नींद आने पर कुछ न कुछ बड़बड़ाती रहती है। ’’ निशा निशब्द थी और उसके पिता खिड़की के बाहर झांक रहे थे। निशा के पिता ने अचानक खिड़की बंद कर अंधेरा कर दिया और कहा ’’ देखा निशा, खिड़की बंद होते ही कितना अंधेरा हो गया। ’’ और निशा के कमरे से बाहर जाते हुए उन्होने कहा ’’ उसी तरह मयंक के बारे में सोचना छोड़ दो। मैं बाप हूं तेरा, हमको भी उड़ते उड़ते खबर हुई, अंधेरा ही रहेगा। ’’
निशा आज भी मयंक का इन्तजार कर रही है मगर दिन और रात का मिलाकर 2 से चार मिनट ही उसके बारे में सोचने में लगाती है।

समाप्त।