Ghumakkad in Hindi Short Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | घुमक्कड़

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घुमक्कड़



घुमना तो अच्छा होता ही है बसर्ते घुमने को घुमने जैसा घुमा जाए। न कोई काम का बोझ, न दिमाग पर कोई बोझ ओर न हाथ में किसी भारी सामान का बोझ। घुमना मतलब कहीं जल्दी पहुंचना नहीं बल्कि धीरे-धीरे चलना और मन-मस्तिष्क में हलचल मचाने वाली हर चीज का अवलोकन। कोई घटना जो मन पे अपनी छाप छोड़ दे, उसके बारे में सोचना, उत्सुकता के साथ अनुभव भी बढ़ाता है।
मंगरू की ऐसी ही सोच थी, अपनी इसी सोच के बारे में लोगों को बताता रहता था। कभी किसी दिन ऐसा नहीं हुआ कि वो घुमने नहीं गया। मगर ये क्या आज उसकी सोच को क्या हो गया है। मंगरू चल इस प्रकार रहा है कि जैसे पैरों में जंजीर बंधी हो, और मन-मस्तिष्क किसी गहरे सोच में डुबे हों। मंगरू को भी ऐसा ही लग रहा है कि वो बहूत दुर तक नहीं चल पाएगा। मंगरू अपनी ठहरी हुई चाल से चल रहा था कि तभी धम्मी काकी ने आवाज लगाते हुए कहा ’’ का बचवा, आज पाँव में मेंहदी लगाए आए का। ’’ मंगरू ने धम्मी काकी की बात का जवाब नहीं दिया क्योंकि उसको अच्छे से पता है कि उनकी टोक लग जाती है। सो मंगरू बिना पीछे मुड़े, बिना उनके सवाल का जवाब दिए सुखी हंसी हंसा और आगे बढ़ गया। आज उसका मन-मस्तिष्क नए अनुभव को हासिल करने के बजाए, किसी समस्या के समाधान में उलझा हुआ था। समस्या तो बड़ी ही थी, पिता जी को शहर के डाॅक्टर से दिखाना था, माँ की आँख का भी इलाज करवाना था और तो और तीसरी बार बाप बनने की भी तैयारी पुरी हो रखी थी।
’’ पागल हो गयी है क्या, सब हो जाएगा। कोई न कोई रास्ता निकल ही जाएगा। भगवान सब ठीक कर देंगे। ’’ गर्भ ठहरने वक्त, पत्नी की तरफ से बच्च गिरवाने की ओछी सोच के जवाब में मंगरू ने कहा था।
सात महीना बाद भी मंगरू की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया था तो मंगरू सोचते-सोचते चला जा रहा था कि लाला तो बिल्कूल भी मदद नहीं करेगा। पहले का कर्ज ही वापस मांगेगा। कोई दोस्त भी तो वैसा नज़र नहीं आ रहा है। मदद लेने वक्त तो सारे ही दोस्त थे। अनमने ढंग से मंगरू ने कदम बढ़ाने के बजाय अपने घर की तरफ मुड़ा तो देखा कि कोई चेहरा उसको घुर रहा है। दिमाग पे जोर डालने पर चेहरा थोड़ा जाना-पहिचाना लगा।
’’ थोड़ा सा और जोर डाल, अच्छी तरह पहचान जाएगा। ’’ सामने वाले ने कहा ।
मंगरू ने हल्की हंसी हंसा और कहा ’’ तुम तो गबरू है रे, राजस्थान वाला दोस्त, लेकिन अचानक 15 साल बाद मिलेगा, वो भी मेरे ही गाँव में, इसका अंदाजा जरा भी नहीं था। हमको तो विश्वास ही नहीं हो रहा है। ’’
मंगरू बड़ी उत्सुकता के साथ गबरू को घर ले गया। मंगरू को अपनी किस्मत पे विश्वास ही नहीं हुआ कि गबरू के रूप मेंएक मददगार आया है।
गबरू ने नोट का बंडल देते हुए कहा ’’ तुम्हारी छोटी-छोटी मदद के बदले में, पुरी रकम एक बार दे रहा हुं। ’’
गबरू दोस्ती का फर्ज निभा गया।

समाप्त।