Ehsaas in Hindi Short Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | एहसास

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एहसास

 

पहले तो गुजाराभत्ता के नाम पर अड़ी रही सुहानी। मनोज अपने सामर्थ्य को देखते हुए इतनी बड़ी रकम के लिए हामी भरी थी। सुहानी और बेटी काव्या के भविष्य को लेकर चिंतीत थी और वो इस बात को लेकर चिंतीत थी कि इतने रूपयों में दोनों का गुजारा भली-भांति हो पाएगा कि नहीं। कैसे हो पाएगा इतने कम पैसों में सारी आवश्यकताओं की पुर्ति। सुहानी यह सोचते-सोचते सोच की दुनिया में चली जाती है।

हर रोज की तरह दरवाजा खोलने के इंतजार में दरवाजा पर खड़ी सुहानी इस पात पर ध्यान नहीं दे सकी कि दरवाजा तो सटा हुआ है।

मनोज ने दरवाजे के अन्दर आते ही सुहानी को अपनी गोद में उठा लिया और मुस्करा कर कहा ’’अरे वाह, आज तो मेरे इन्तजार में तुमने दरवाजा खोल कर रखा था। इतनी भी क्या व्याकुलता को रोक नहीं पायी कि पहले मैं दरवाजा खटखटाउं और तुम दरवाजा खोलो। ’’

सुहानी मुस्करायी तो थी, मगर थोड़ी शरमा भी गयी थी।

मनोज ने डिनर टेबल पर कहा था ’’ अरे, भले ही रूपया कम कमाता हुं मगर तुमको हमेशा महारानी बना कर रखुंगा। तुम्हारी और काव्या की हर छोटी-बड़ी आवश्यकताओं और खुशी को पुरी करने की पुरजोर कोशिश करूुंगा। ’’

 

वकील ने सुहानी को झकझोर कर पुछा ’’ बताइये मैडम, मेरा क्लाइन्ट आपको 25000 रूपया देने की बात कर रहा है। इतना गुजाराभत्ता लेकर आप मेरे क्लाइन्ट का पीछा तो छोड़ देंगी न ? 25000 रूपया हर महीना लेकर मेरे क्लाइन्ट से वसूल कर आपके तरफ से तो पूरी आजादी होगी न कि मेरा क्लाइन्ट नई जिंदगी शांतिपूर्ण ढंग से जी सकता है। ’’

वकील की बात खत्म हुई तो सुहानी ने महसूस किया कि मनोज उसको लगातार देख रहा था, मरग नज़र पड़ते ही मनोज ने अपनी नज़र झुका ली। मनोज के नज़र झुकाने की इसी अदा पे तो सुहानी फिदा हुई थी।

वकील ने फिर सुहानी से पुछा ’’ 25000 रूपया हर महीना लेकर आप मेरे क्लाइन्ट का पीछा छोड़ देगी न ? ’’

सुहानी ने कहा ’’ रूकिये, हमको 5 मिनट सोचने के लिए दे दीजिए। ’’

सुहानी के माथे पर बल पड़े और अँगुलियों में जोडने के संकेत प्रतीत होते ही मनोज ने मन ही मन कहा ’’ अब कहीं ये मेरे बुते से बाहर की मांग न कर दे। ’’ और वकील ने मन ही मन सोचा कि ’’इसके लालच का और बढ़ना तो मेरे लिए ही फायदेमंद होगा। ’’

आदमी जब सोचने पे आता है तो बहुत कुछ सोच लेता है मगर जब कुछ नहीं सोच रहा होता है तो सदविवेक ही उस पर हाबी होता है।

सुहानी खुशी का स्त्रोत तो ढुंढ ही रही थी, मगर उस स्त्रोत का उदगम भी सोच रही थी। सुहानी सोच रही थी कि खुशहाली को आखिर किसकी नज़र लगी। सुहानी अब मनोज की गलती को ढुंढना छोड़कर अपनी गलती ढुंढ रही थी। सुहानी ने मनोज की तरफ रूआंसी नज़र से देखा, वकील अपने चेहरे पर कुटील मुस्कान लिए खड़ा था।

सुहानी ने मनोज से कहा ’’ आपने तो सातों जनम निभाने का वादा किया था और एक ही जन्म में पीछा छुड़ाने की सोचने लगे। गुजाराभत्ता लेकर भला करूंगी क्या, जब आप बिन एक पल भी नहीं गुजरेगा।

दोनों के इस मिलन पर वकील उपरी मन से मुस्कराया था।

 

समाप्त।