कैमरा दिखाता है — सीया बिस्तर पर बैठी है। बाहर हल्की बारिश हो रही है। सीया सोने का नाटक कर रही है, लेकिन असल में उसकी आँखें खुली हैं। कबीर उसके पास बैठा है, उसका चेहरा उसकी ओर झुका है। कबीर सोच में था कि सिया को ये बात कहां से पता लगी कि वो उसे चूमेगा तो उसकी याददाश्त वापस आ जाएगी।)
कबीर (धीरे, खुद से, सोचते हुए) बोला -
“सीया… अभी अभी नहीं… अगर अभी उसे चूम लिया तो वो सब याद कर लेगी…मैं नहीं चाहूँगा कि फिर से कोई मुश्किल खड़ी हो जाए।”
(वो उसके चेहरे के करीब आता है, उसकी सांस महसूस करता है, लेकिन रुक जाता है। उसकी आँखों में प्यार और चिंता दोनों झलकते हैं।)
कबीर (धीमे स्वर में, खुद से) बोला -
“बस सही समय… बस सही समय का इंतजार…”
(सीया उसकी बात सुन लेती है। उसकी नींद की नाटक वाली आँखों के नीचे ओवरथिंकिंग की आग फिर से जल उठती है।)
सीया (धीरे से, खुद से, बेचैन आवाज़ में) बोली -
“क्या… क्या उन्होंने अभी सोचा कि मैं सब याद कर लूँगी?
अगर मुझे सच में याद आ गया तो… क्या होगा?
और वो… वो अपने आप को रहे थे… क्या मैं फिर से परेशानी में पड़ जाऊँगी?”
(सिया अपने तकिए को कसकर पकड़ती है। उसका दिमाग लगातार सवालों और डर से भर जाता है। कबीर महसूस करता है कि सिया बेचैन है, लेकिन उसे कुछ कहने से डर लगता है।)
कबीर (धीरे, प्यार और चिंता में घुला स्वर) बोला -
“सिया… तुम इतनी जल्दी मत सोचो…मैं तुम्हारे लिए हमेशा यहाँ हूँ… तुम सुरक्षित हो…”
(सिया थोड़ी देर के लिए शांत होती है, लेकिन उसके दिमाग में फिर भी डर और ओवरथिंकिंग दौड़ रही है। कबीर उसकी ओर देखता है, हाथ धीरे से उसके बालों में फेरता है। वो उसे पूरी तरह से आराम देने की कोशिश करता है, लेकिन उसे पता है कि सिया की आदतें इतनी आसान नहीं हैं।)
सिया (धीरे, खुद से)। बोली -
“क्यों… मैं इतनी जल्दी क्यों सोचने लगती हूँ?
क्यों मुझे हर बात डराती है…और अब… अब भी वह सब याद आ सकता है…।
(बारिश की बूंदें खिड़की पर गिर रही हैं, कमरे में हल्की नीली रोशनी है। कबीर सिर झुकाए बैठा है, और सिया अपने तकिए से चेहरे ढककर सोच रही है। सन्नाटा, प्यार और तनाव का मिश्रण माहौल में गहरा रह गया है।)
(सुबह की हल्की धूप कमरे में आ रही है। कबीर अब भी सोया नहीं है। उसकी आँखें थकी हुई हैं। सीया नींद में बेचैन होकर कुछ बड़बड़ा रही है।)
सीया (नींद में, डरते हुए) बोली -
“कबीर जी… वो फिर से… खून… मत जाओ… मुझे छोड़कर मत जाओ…”
(कबीर तुरंत उठता है, उसका माथा छूता है। सीया के माथे पर पसीना है। कबीर का दिल बैठ जाता है। वो उसका सिर अपनी गोद में रख लेता है।)
कबीर (धीरे, कांपती आवाज़ में) बोला -
“सीया… मैं यहीं हूँ… कहीं नहीं जा रहा हूँ… बस… सांस लो… सब ठीक है।”
(सीया धीरे-धीरे आँखें खोलती है। उसकी आँखों में थकान और डर है। वो चारों तरफ देखती है जैसे कोई सपना से बाहर आई हो।)
सीया (धीरे) बोली -
“कबीर जी… मैंने फिर से देखा… वही… वही सपना…
मैं खून में डूबी हुई थी… और आप कहीं नहीं थे…”
(कबीर गहरी सांस लेता है। वो उसका चेहरा अपने दोनों हाथों से थाम लेता है।)
कबीर (संवेदनशील लहजे में) बोला -
“बस… अब कुछ मत सोचो।
सपना था… बस सपना।
मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा। समझी तुम?”
(सीया की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। वो धीरे से कबीर के सीने से लग जाती है। कबीर उसकी पीठ पर हाथ फेरता है, जैसे उसका डर मिटाने की कोशिश कर रहा हो।)
सीया (धीरे) बोली -
“मुझे डर लगता है… अगर मैं फिर बीमार पड़ गई तो?
अगर वो सब दोबारा हुआ तो?”
कबीर (थोड़ा मुस्कुराते हुए) बोला -
“तो मैं फिर से तुम्हें संभाल लूँगा।
तुम्हारे हर डर से लड़ लूँगा, सीया।
पर अब तुमको बस एक वादा करना होगा…”
सीया (धीरे, उसकी आँखों में देखते हुए) बोली -
“क्या वादा?”
कबीर (गंभीर होकर) बोला -
“कि अब तुम खुद से नहीं लड़ोगी।
अब तुम्हारा डर हमारा होगा, अकेले तुम्हारा नहीं।”
(सीया की आँखें भर जाती हैं। वो सिर हिलाकर “हाँ” कहती है।
कबीर उसे हल्के से अपने सीने से लगा लेता है।
बाहर बारिश फिर से शुरू हो चुकी है — जैसे उस पल की गवाही दे रही हो।)
“कभी-कभी प्यार सिर्फ साथ रहना नहीं होता…
कभी-कभी प्यार वो धैर्य होता है —
जो किसी टूटे हुए दिल को फिर से जोड़ने की कोशिश करता है।”
(सीन फेड आउट — बारिश की आवाज़ और कबीर के हाथों में सोती हुई सीया का चेहरा दिखता है।)
(रात का समय है। कमरे में बस हल्की पीली लाइट जल रही है।
सीया बिस्तर पर बैठी है। उसके हाथ में पुरानी डायरी है। वो हर पन्ने को पलट रही है, पर कुछ समझ नहीं पा रही।
कभी उसकी नज़र किसी नाम पर रुक जाती — “सिमरन ठाकुर” — और उसका दिल तेज़ धड़कने लगता है।)
सीया (धीरे-धीरे बड़बड़ाते हुए) बोली -
“कौन थी ये सिमरन?
क्यों हर बार जब मैं ये नाम देखती हूँ, तो सीने में अजीब सी बेचैनी होती है…कहीं ये मैं तो नहीं?”
(वो सिर पकड़ लेती है। उसके दिमाग़ में आवाज़ें गूंजती हैं — “भागो, सिमरन… भागो!”
उसका सिर दर्द करने लगता है। तभी कमरे का दरवाज़ा खुलता है।)
(कबीर अंदर आता है, पानी का गिलास लेकर।)
कबीर (धीरे से) बोला -
“फिर से overthinking शुरू? मैंने कहा था न सीया, अब आराम करो।”
सीया (थोड़ा मुस्कुराते हुए, पर आँखों में शरारत) बोली -
“आराम करूँ? और आप… हमेशा काम, काम और काम।
थोड़ा मेरे पास भी बैठ जाओ न।”
(कबीर उसके पास बैठता है। सीया थोड़ा झुककर उसकी आँखों में देखती है। उसकी नज़रों में एक अलग चमक है — जिज्ञासा और गहराई का मिश्रण।)
सीया (धीमे सुर में) बोली -
“कबीर जी… अगर मैं आपसे कुछ पूछूँ… तो क्या तुम सच बताओगे?”
कबीर (थोड़ा रुककर) बोला -
“सवाल पूछो, फिर देखेंगे।”
सीया (धीरे-धीरे पास आते हुए) बोली -
“क्या मैं पहले… सिमरन ठाकुर थी?”
(कबीर की आँखें चौड़ी हो जाती हैं। वो सन्न रह जाता है।नउसके हाथ में पकड़ा गिलास हल्का सा कांप जाता है।वो तुरंत नज़रें झुका लेता है।)
कबीर (कठोर स्वर में) बोला -
“सीया… बेवजह पुरानी बातों में मत पड़ो। जो हो चुका है, उसे भूल जाना बेहतर है।”
(सीया हल्के से मुस्कुराती है, पर उसकी आँखों में कुछ और है।
वो पास झुकती है, इतनी कि कबीर की सांसें उसके बालों को छूती हैं।)
सीया (धीरे, teasing अंदाज़ में) बोली -
“अगर मैं भूलना चाहूँ भी… तो आप याद नहीं करने देते।
हर बार जब मैं आपके करीब आती हूँ…
आप खुद को रोक लेते हो… क्यों कबीर जी?”
(कबीर उसका चेहरा देखने से बचता है। वो बस उसके होंठों के करीब आता है — फिर ठहर जाता है।)
कबीर (धीरे, आँखें बंद करके) बोला -
“क्योंकि अगर मैंने तुम्हें चूमा…तो सब याद आ जाएगा, सीया।
वो अतीत… जो मैंने बड़ी मुश्किल से दफनाया है।”
(सीया की आँखों में आँसू आ जाते हैं। वो अपने होंठ दबा लेती है, पर उसकी निगाहें अब भी कबीर पर टिकी हैं।)
सीया (धीरे, मन ही मन) बोली -
“शायद अब वही करना होगा…जो वो मुझसे छिपाना चाहते हो…
सच जानने के लिए… मुझे उसी को तोड़ना होगा।”
(वो हल्की मुस्कान देती है। कबीर उठकर कमरे से बाहर चला जाता है। सीया उसके जाते ही आईने में खुद को देखती है —
उसकी परछाईं में उसे “सिमरन ठाकुर” का चेहरा दिखता है।
वो डर जाती है… पीछे मुड़ती है… पर वहाँ कोई नहीं होता।)
“सच कभी-कभी आईने की तरह होता है —
देखने की कोशिश करो, तो टूटने लगता है।”
(जहाँ डर और जिज्ञासा दोनों का तूफ़ान चल रहा है।)