festivals in Hindi Children Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | त्यौहार

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त्यौहार



दशहरे का मेला लगा हुआ था। पूरे बाजार में ऐसी रौनक थी जैसे दिवाली अभी से आ गई हो।

जगह-जगह चाट के ठेले सजे थे, जलेबी की महक से तो पूरा वातावरण ही मीठा हो रहा था। मैदान में बच्चों के लिए नाव वाला झूला, चकरी और एक बहुत बड़ा हिंडोला लगा था, जिसमें बैठकर लोग आसमान छू रहे थे।

मैदान के एक कोने में बीस फुट ऊँचा रावण का पुतला खड़ा था। वह चुपचाप पूरे मेले को निहार रहा था। अगर उसके मन की आवाज सुनाई देती तो वह यही कह रहा होता - "मेरी ही वजह से तो इतनी रौनक है। मेरी वजह से बाजार सजा है, कितने ही गरीबों के घर में आज चूल्हा जला है, कितने बच्चों को नया काम मिला है। फिर भी सब मुझे बुरा कहते हैं। बताओ, ये भी कोई बात हुई।"

इसी मेले में बारह साल का सोहन अपनी माँ विनीता के साथ आया था। सोहन का ध्यान झूलों पर कम और खाने के ठेलों पर ज्यादा था।

तभी उसकी नजर एक आलू-टिक्की के ठेले पर पड़ी। वहाँ चौदह साल का एक लड़का बड़ी फुर्ती से टिक्की बना रहा था। उसके हाथ जल रहे थे, माथे पर पसीना था, पर हाथ रुक नहीं रहे थे।

सोहन ने माँ का हाथ खींचा - "माँ, मुझे टिक्की खानी है।"

विनीता मुस्कुराते हुए उसे उस ठेले पर ले गई। उसने कहा - "बेटा, एक प्लेट टिक्की लगा दो।"

लड़का टिक्की तलते हुए ही बोला - "बस दो मिनट मैडम।"

विनीता ने प्यार से पूछा - "बेटा, स्कूल नहीं जाते? पढ़ते हो?"

लड़का थोड़ा सकपका गया। फिर धीरे से बोला - "नहीं मैडम, आठवीं तक पढ़ा हूँ। पिताजी बहुत शराब पीते थे, माँ को बहुत मारते थे। पिछले साल सर्दियों में वह चल बसे। अब घर का खर्च मुझे ही देखना पड़ता है। एक छोटा भाई है, मैं उसे स्कूल भेजता हूँ। मैं चाहता हूँ वो पढ़-लिख ले, मेरी तरह ठेला न चलाए।"

इतना कहते-कहते उसकी आँखें भर आईं, पर उसने तुरंत खुद को संभाला और मुस्कुराते हुए टिक्की की प्लेट सोहन को थमा दी।

विनीता का दिल भर आया। वह पेशे से एक शिक्षिका थी, पर एक माँ भी थी। वह उस बच्चे को पैसे देकर मदद नहीं करना चाहती थी, क्योंकि इससे उसकी मेहनत का अपमान होता।

उसने इधर-उधर देखा। ठेले के पास चार-पाँच गरीब बच्चे खड़े थे, जो ललचाई नजरों से टिक्की देख रहे थे पर जेब खाली थी।

विनीता को एक उपाय सूझा। उसने उस लड़के से कहा - "बेटा, यहाँ जितने भी बच्चे खड़े हैं, सबको मेरी तरफ से एक-एक प्लेट टिक्की खिला दो।"

लड़के की आँखों में चमक आ गई। उसने खुशी-खुशी सबको टिक्की खिलानी शुरू कर दी। कुछ ही देर में उसकी सारी टिक्की खत्म हो गई। मेले में उस दिन पहली बार उसके चेहरे पर इतनी बड़ी मुस्कान थी।

विनीता ने उसकी पूरी कमाई के पैसे दिए और जाते-जाते कहा - "बेटा, एक प्लेट टिक्की मेरी तरफ से अपनी माँ और अपने छोटे भाई के लिए भी रख लेना, और हाँ, पढ़ाई मत छोड़ना। कभी भी किताब की जरूरत हो तो इस पते पर आ जाना।"

लड़का हाथ जोड़कर खड़ा रहा, बोल कुछ नहीं पाया।

घर लौटकर सोहन ने माँ से पूछा - "माँ, आपने इतने सारे पैसे क्यों खर्च कर दिए? आप तो सबको टिक्की खिला आईं।"

विनीता ने सोहन को अपने पास बैठाया, उसके सिर पर हाथ फेरा और बोली - "बेटा, त्योहार सबके लिए एक जैसे नहीं होते। हमारे लिए त्योहार नए कपड़े, झूले और जलेबी है, पर कुछ लोगों के लिए यही त्योहार उनकी रोजी-रोटी होता है। वह लड़का त्योहार नहीं मना रहा था, वह अपने परिवार का पेट भर रहा था।"

"अगर भगवान ने तुम्हें समर्थ बनाया है तो हमेशा दूसरों की मदद करना, पर ऐसे कि सामने वाले को बुरा न लगे। कोशिश करना कि तुम्हारी वजह से किसी के चेहरे पर मुस्कान आए। यही सच्चा त्योहार है।"

सोहन चुपचाप माँ की बात सुन रहा था। उसे आज मेले से भी बड़ी सीख मिल गई थी।

रात हो गई थी। सोहन ने कमरे की लाइट बुझा दी, पर विनीता की कही बात उसके मन में दीये की तरह जल रही थी। बाहर मैदान में रावण का पुतला अभी भी खड़ा था, शायद कल जलने के लिए, पर आज उसने दो दिलों को जोड़ दिया था।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली