Money VS Me Part-32 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 32

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Money Vs Me - Part 32

नानी की अंतिम क्रिया होने तक माँ और मैं वहीं रहे। इन दिनों माँ बिल्कुल चुप-चुप सी हो गई थीं। न उनकी आँखों में पहले जैसी बेचैनी थी और न ही चेहरे पर कोई भाव। वह बस खामोशी से बैठी रहतीं, जैसे उनके भीतर कुछ ऐसा टूट गया हो, जिसकी आवाज़ अब बाहर तक नहीं पहुँच सकती थी।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि उनकी इस खामोशी में क्या छिपा था। क्या यह नानी के आखिरी पलों में उनके पास न पहुँच पाने का पछतावा था? या फिर सारी ज़िंदगी अपनी माँ से दूर रहकर जीने का दर्द, जो अब उनके दिल में हमेशा के लिए घर कर गया था?

शायद दोनों ही बातें थीं।

कभी-कभी इंसान इतना रो चुका होता है कि उसके आँसू भी उसका साथ छोड़ देते हैं। माँ की हालत देखकर मुझे भी कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा था।

नानी के जाने के बाद घर में सब कुछ होते हुए भी एक अजीब-सा खालीपन छा गया था। वही आँगन, वही कमरे, वही लोग... लेकिन अब उस घर में वह आवाज़ नहीं थी, जिसके इर्द-गिर्द सबकी ज़िंदगी घूमती थी।

मामी ने माँ की देखभाल में कोई कमी नहीं रखी। वह समय पर उनके लिए खाना लातीं, उनके पास बैठतीं और उन्हें समझाने की कोशिश करतीं। लेकिन माँ की हालत ऐसी थी कि वह न किसी से कुछ कहतीं और न ही किसी बात का जवाब देतीं।

मैं सब कुछ देख रहा था, मगर समझ नहीं पा रहा था कि माँ को इस दर्द से कैसे बाहर निकालूँ।

मेरे मन में एक और चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी।

यह घर मामा का था। उनका परिवार था, उनके बच्चे थे। इस घर पर उनका हक था। मैं माँ को लेकर यहाँ कब तक रह सकता था? और फिर, आगे क्या करना था?

क्या माँ को वापस ठाकुर साहब के पास जाना चाहिए?

क्या इतने दिनों बाद वहाँ लौटना उनके लिए सही होगा?

और सबसे बड़ा सवाल यह था कि मेरा क्या होगा?

मैं मीरा से मिलने के बारे में सोच रहा था। इतने सालों बाद उसके सामने जाने की हिम्मत जुटा रहा था। लेकिन माँ की इस हालत में उन्हें अकेला छोड़कर मैं कहीं जा भी नहीं सकता था।

मैं अपनी माँ को खोना नहीं चाहता था। उन्हें पहले ही ज़िंदगी में बहुत कुछ सहना पड़ा था। मैं नहीं चाहता था कि अब उन्हें किसी और परेशानी का सामना करना पड़े।

इसलिए मैंने अपने सारे सवाल अपने भीतर ही दबा लिए।

फिलहाल मेरे लिए सबसे ज़रूरी माँ थीं।

नानी की अंतिम क्रिया के बाद भी मैं कुछ दिन माँ के साथ वहीं रुका रहा। धीरे-धीरे घर का माहौल सामान्य होने लगा था, लेकिन माँ की खामोशी अब भी वैसी ही थी।

कई बार मैं उनके पास बैठकर उनसे बातें करने की कोशिश करता, लेकिन वह बस मेरी तरफ देखकर हल्का-सा मुस्कुरा देतीं। उनकी वह फीकी मुस्कान मेरे दिल को और भारी कर देती थी।

मैं जानता था कि उन्हें वक्त चाहिए। शायद बहुत सारा वक्त।

आखिरकार, कुछ दिन बीतने के बाद एक सुबह मुझे लगा कि माँ अब पहले से थोड़ी सँभल गई हैं। वह आँगन में बैठी थीं। उनके चेहरे पर अब पहले जैसी घबराहट तो नहीं थी, लेकिन उदासी अब भी साफ़ दिखाई दे रही थी।

मैंने सोचा कि आज उनसे बात करूँगा। उनसे पूछूँगा कि वह आगे क्या करना चाहती हैं। आखिर हमें अपनी ज़िंदगी के बारे में कोई फैसला तो लेना ही था।

मैं उनके पास जाकर बैठने ही वाला था कि उससे पहले ही उन्होंने मुझे पुकार लिया।

"क्षितिज..."

"जी, माँ?"

वह कुछ पल खामोश रहीं। फिर मेरी तरफ देखकर बोलीं, "बेटा, हमें वापस जाना होगा।"

मैंने उनकी बात सुनकर पूछा, "कहाँ, माँ?"

उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए धीमी आवाज़ में कहा—

"हमें वापस जाना होगा, क्षितिज... ठाकुर साहब के पास।"

उनकी बात सुनकर मैं कुछ पल चुप रह गया।

मन में कई सवाल एक साथ उठने लगे। अभी तो माँ अपनी माँ को खोने के दर्द से उबर भी नहीं पाई थीं। फिर अचानक वापस जाने का फैसला क्यों?

क्या वह सचमुच वहाँ लौटना चाहती थीं, या फिर किसी मजबूरी के कारण ऐसा कह रही थीं?

मैंने धीरे से पूछा, "लेकिन माँ, आप अभी ठीक से सँभली भी नहीं हैं। क्या कुछ दिन और यहाँ नहीं रुक सकतीं?"

माँ ने अपना सिर हिला दिया।

"नहीं, बेटा। अब हमें जाना चाहिए।"

"लेकिन क्यों, माँ? क्या ठाकुर साहब ने आपको वापस बुलाया है?"

मेरे सवाल पर वह कुछ देर चुप रहीं। फिर उन्होंने नज़रें झुका लीं।

"उन्होंने बुलाया नहीं है, क्षितिज। लेकिन अब वहाँ लौटना ज़रूरी है।"

"आपको उनकी चिंता हो रही है?"

माँ ने मेरी तरफ देखा, मगर कुछ नहीं बोलीं।

उनकी खामोशी ने मेरे मन में एक नई उलझन पैदा कर दी।

मैं जानता था कि माँ के मन में ठाकुर साहब और चिराग को लेकर चिंता थी। लेकिन मैं यह भी जानता था कि उनके अपने जीवन में बहुत-सी ऐसी बातें थीं, जिनके बारे में वह मुझसे खुलकर बात नहीं करती थीं।

मैंने उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया।

"माँ, मैं आपके साथ हूँ। आप जहाँ कहेंगी, मैं आपके साथ चलूँगा। लेकिन एक बात बताइए... क्या आप सच में वहाँ वापस जाना चाहती हैं?"

माँ ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में नमी उतर आई।

"बेटा, ज़िंदगी में हर फैसला अपनी खुशी के लिए नहीं लिया जाता। कभी-कभी हमें दूसरों के लिए भी कुछ करना पड़ता है।"

उनकी बात सुनकर मैं और भी उलझ गया।

आखिर माँ किसके लिए वापस जाना चाहती थीं?

ठाकुर साहब के लिए?

चिराग के लिए?

या फिर किसी ऐसे रिश्ते के लिए, जिसे वह चाहकर भी पीछे नहीं छोड़ पा रही थीं?

मैं उनसे और सवाल करना चाहता था, लेकिन उनके चेहरे पर थकान देखकर चुप रह गया।

शायद अभी सही समय नहीं था।

मैंने बस इतना कहा, "ठीक है, माँ। हम वापस चलेंगे।"

माँ ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिया।

"मुझे पता था, तुम मुझे समझोगे।"

मैं हल्का-सा मुस्कुराया, लेकिन मेरे भीतर एक नई बेचैनी जन्म ले चुकी थी।

क्योंकि माँ के साथ वापस जाने का मतलब सिर्फ़ उस घर में लौटना नहीं था। इसका मतलब था उन तमाम सवालों के बीच फिर से खड़ा होना, जिनसे दूर रहने के लिए मैं अब तक कोशिश करता आया था।

और उन सवालों में सबसे बड़ा सवाल था—मीरा।

मैंने मन ही मन तय किया कि वापस लौटने से पहले या वहाँ पहुँचकर, मुझे किसी भी तरह मीरा से मिलना होगा।

अब मैं अपनी ज़िंदगी को यूँ अधूरा छोड़कर नहीं जी सकता था।

मगर मुझे क्या पता था कि माँ का यह फैसला मेरी ज़िंदगी को एक बार फिर ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देगा, जहाँ मुझे अपनी माँ और अपने दिल के बीच किसी एक को चुनने की नौबत आ सकती थी।

और मैं नहीं जानता था कि उस दिन मैं किसका साथ दे पाऊँगा।