Pariksha Pret in Hindi Short Stories by Dr kavita Tyagi books and stories PDF | परीक्षा प्रेत

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परीक्षा प्रेत

परीक्षा - प्रेत

प्रातः लगभग आठ बजे नाश्ता करने के पश्चात ध्रुव परीक्षा के एक दिन पूर्व मिले अवकाश का लुत्फ उठाते हुए मित्रों के साथ खेलने की कल्पना में डूबा हुआ था | तभी उसकी मधुर कल्पना को चीरता-फाड़ता चिर-परिचित आदेश उसके कानों में पड़ा-

"ध्रुव ! बेटा, पुस्तक लेकर मेरे पास बैठो, तुम्हारी परीक्षा की तैयारी कराऊँगा !" प्रायः आठ बजने से पहले ही जयंत ऑफिस के लिए निकल जाते थे, किन्तु बेटे की परीक्षा की तैयारी कराने के लिए आज उन्होंने कार्यालय से अवकाश ले लिया था | आदेश सुनते ही ध्रुव के चेहरे पर उदासी छा गयी | अपने हृदयस्थ भाव को छिपाते हुए उसने कहा --

"पापा जी, आज आप ओफिस नहीं जाएँगे ?"

"नहीं !"

"पापा जी, मेरे सारे डाउट्स क्लास में ही क्लियर हो जाते हैं और एक्सरसाइज ट्यूशन में हो जाती है, फिर आपने ऑफिस ... से ...छु ... ट्टी ...?" पिता की कठोर मुद्रा को देखकर ध्रुव के मुख से 'क्यों' शब्द निसृत न हो सका | ध्रुव का मनोभाव समझते ही जयंत के चेहरे पर क्रोध और चिन्ता के मिश्रित भाव उभर आये और माथे पर बल पड़ गये --

" मेरी थोड़ी-सी ढील के कारण पिछले वर्ष तुम्हारा परीक्षा परिणाम कितना खराब रहा था, याद नहीं है ? कक्षा में दूसरा-तीसरा स्थान प्राप्त वाले आर्यन और शिखर तुम्हें, सदैव प्रथम स्थान पर रहने वाले को, पीछे छोड़कर आगे निकल गये और तुम तीसरे स्थान पर आ गये ! फिर भी मुझसे पूछते हो, मैंने ऑफिस से छुट्टी क्यों ली है ! इस बार तुम्हें परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करके अपनी कक्षा में प्रथम स्थान पर रहना है ! समझे तुम !"

"लेकिन, पापा ...!"

"लेकिन क्या ?" जयंत ने क्रोध से गरजते हुए कहा |

  • पिता का क्रोध कम करने के लिए ध्रुव ने सहज विनम्र बाल्योचित शैली में समझाने का प्रयास किया कि आर्यन और शिखर उसके घनिष्ठ मित्र हैं | दो-चार अंक कम या अधिक आने से तीनों मित्रों में से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है ; न कोई आगे जाता है, न पीछे छूटता है ; तीनों तन-मन से परस्पर साथ-साथ रहते हैं और सच्चे हृदय से एक-दूसरे के साथ रहना चाहते हैं | बेटे के मुख से उसकी आदर्श मित्रता का वर्णन सुनकर जयंत की आँखों में पिछले वर्ष का एक घटनाक्रम वर्तमान होकर चित्रित होने लगा --
  • 'प्रतिवर्ष की भाँति पिछले वर्ष भी जुलाई के प्रथम सप्ताह में ध्रुव के विद्यालय में वार्षिकोत्सव के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम के उपपरांत सभी कक्षाओं के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले छात्रों/छात्राओं को मंच पर बुलाकर परस्कृत किया जा रहा था | पुरस्कार वितरण के क्रम में कक्षा सात के प्रथम पुरस्कार के लिए आर्यन नाम की घोषण हुई और उससे मंच पर आकर पुरस्कार ग्रहण करने का निवेदन किया गया | आर्यन के नाम की घोषणा होते ही ध्रुव हर्षोन्मत्त होकर जोर-जोर से ताली बजाने लगा | तदुपरांत सभागार में उपस्थित अन्य सभी लोगों ने भी करतल-ध्वनि करके उसका उत्साहवर्द्धन किया | आर्यन के पुरस्कार ग्रहण करने के पश्चात समवेत् करतल-ध्वनि बन्द हो गयी, किन्तु ध्रुव अब भी अकेला ताली बजा रहा था | उसके चेहरे की भाव-भंगिमा और प्रसन्नता को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि प्रथम पुरस्कार स्वयं उसी ने प्राप्त किया है | किन्तु, ध्रुव के चेहरे पर जितना उल्लास नाच रहा था, उसके पिता जयंत के चेहरे पर उतनी ही उदासी प्रसन्नता झलक रही थी | उसी समय ध्रुव के हर्षोल्लास को लक्ष्य करके जयंत ने अभावजनित पीड़ा के स्वर में कहा था - " यदि तुम उस एक प्रश्न को भी हल कर देते, जिसको तुमने छोड़ा था, तो तुम्हारे प्राप्तांक आर्यन से अधिक होते और हर साल की तरह इस बार भी प्रथम पुरस्कार तुम्हें ही मिलता, पर तुमने तो अपनी लापरवाही से द्वितीय पुरस्कार भी गँवा दिया है !" पिता के शब्दों की प्रतिक्रियास्वरूप उस दिन भी ध्रुव ने कुछ ऐसा ही कहा था -
  • "क्या फ़र्क पड़ता है ! परीक्षा में प्राप्तांक कम या अधिक होने से अथवा कक्षा में प्रथम या द्वितीय स्थान प्राप्त होने से छात्र की वास्तविक प्रतिभा कम-अधिक नहीं हो जाती है ! "
  • उस समय भी जयंत ने ध्रुव को अपनी भावनाओं से परिचित कराया था कि सभी माता-पिता अपनी संतान से यह अपेक्षा करते हैं कि उनके बच्चे उन्नति के पथ पर चलते हुए माता-पिता के सपनों को साकार करें !'
  • लगभग एक वर्ष पुराने घटनाक्रम का स्मृति-चित्र मनःमस्तिष्क में उतरते ही जयंत के हृदय में आशाओं-अपेक्षाओं के भाव आविर्भूत-तिरोभूत होने लगे ; माथे पर चिन्ता की रेखाएँ गहरी तथा आँखें क्रोध से लाल होने लगी थी | जयंत की भाव-भंगिमा देखकर ध्रुव को अनुभव हुआ कि उसकी बातों का पिता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है | पिता का क्रोध सातवें आसमान को न छूने लगे, यह सोचकर वह तत्क्षण पिता के आदेशानुसार पुस्तक लेकर पढ़ने के लिए बैठ गया था |
  • पढ़ते-पढ़ाते दोपहर के भोजन का समय हो गया था | भूख भी सताने लगी थी | लगभग दो बजे भोजन करके जयंत पुनः ध्रुव को पढ़ाने के लिए बैठ गया था | जयंत के पिता रमेश ने मंद-मंद मुस्कराते हुए कहा -

    "जयंत बेटा, ध्रुव की आयु अभी मात्र बारह वर्ष है | प्रतिदिन प्रातः विद्यालय, फिर ट्यूशन और उसके बाद होमवर्क कराने के लिए तुम इसको लेकर बैठ जाते हो ! इस बच्चे की दिनचर्या कितनी व्यस्त बना दी है तुमने ! इसके नाजुक-से मनःमस्तिष्क पर सामर्थ्य से अधिक बोझ डालकर तुम इसका बचपन मत छीनों ! ध्रुव को आज विद्यालय से अवकाश मिला है, तुम भी कम-से-कम आज तो इसको खेलने-कूदने, मस्ती करने के लिए छोड़ दो ! "

  • " पापा जी, विद्यालय ने परीक्षा की तैयारी करने के लिए अवकाश दिया है, मस्ती करने के लिए नहीं ! कॉम्पिटिशन का जमाना है ! आगे बढ़ना है और जीवन मे कुछ करना है, तो परिश्रम करना ही पड़ेगा ! आप तमाम कॉलेजों का हाल देख रहे हैं ना ? हर एक कॉलेज में एडमिशन के लिए मेरिट इतनी ऊँची जाती है कि यदि सख्ती नहीं की और मस्ती करने के लिए छोड़ दिया, तो आप के पोते का कुछ नहीं हो सकता ! "
  • रमेश जानते थे, अधिक तुछ कहने से जयंत का रक्तचाप बढ़ जाएगा, इसलिए जयंत का उत्तर सुनकर उसके पिता मौन हो गये और जयंत अपने बेटे ध्रुव को पढ़ाते रहे | दोपहर से शाम हो गई और शाम से रात | रात के भोजन का समय हुआ, तो रमेश ने जयन्त से आग्रह किया कि सब साथ भोजन करें और तदुपरांत सब साथ बाहर पार्क में टहलने के लिए चलें ! किन्तु, पिता की अवहेलना करके जयन्त ने ध्रुव के साथ अध्ययन-कक्ष में ही भोजन किया और भोजन करके पुनः बेटे को पढ़ाना आरम्भ कर दिया |
  • रात के ग्यारह बजे थे | जयंत अपने बेटे ध्रुव को अभी भी पढ़ा रहा था | नन्हे-से पोते के परिश्रम की अनावश्यक अति को देख विचलित होकर रमेश ने जयंत से कहा -
  • "बेटा ईश्वर ने रात सोने के लिए बनाई है, अब सो जाओ और ध्रुव को भी सोने दो !"
  • " जी, पापा जी !"
  • अपने मनोनुकूल उत्तर पाकर रमेश क्षण-भर वहाँ रुककर अपने कमरे की ओर बढ़ गये | कमरे में जाकर थोड़ी देर टहलते रहे | तत्पश्चात् बिस्तर पर लेटकर प्रकाश बन्द होने की प्रतीक्षा करते हुए सोने का प्रयास करने लगे | परन्तु, ध्रुव को पढ़ते देखकर उनकी आँखों में नींद की मदहोशी के स्थान पर उनका अपना नटखट बचपन खेलने लगा था | वे मन ही मन सोचने लगे -- "क्या जमाना था हमारा ! विद्यालय से लौटकर किताबों का बस्ता उल्टा-सीधा फेंककर खेलने के लिए निकल जाते थे | माँ दूध से भरा एक बड़ा गिलास हाथ में पकड़े हुए हमें डाँटकर वात्सल्य-स्वर में दूध पीने का आग्रह करती, तब हम जल्दी-जल्दी दूध के घूँट भरते हुए गिलास खाली कर देते, तो उनके हृदय की तृप्ति उनकी आँखों में उतर आती और हम यथाशीघ्र तेज गति से घर से बाहर निकल जाते थे | मित्रों के साथ खेलते-खेलते कब ? कैसे ? कितना समय ? बीत गया, कुछ पता ही नहीं रहता था ! एक यह समय है, बच्चे के होश सम्हालते ही उसके उज्ज्वल भविष्य के बहाने विद्यालय में उसका नाम लिखाकर उसके स्वयं के वजन से अधिक पाठ्यपुस्तकों का भार उसके कोमल कंधों पर और अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ उसके अबोध मनःमस्तिष्क पर लाद दिया जाता है | इस अनपेक्षित-अवांछित भार के नीचे दबकर बचपन कोमल फूल-सा मुरझा जाता है |" बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचते हुए पर्याप्त समय बीत गया था | जयन्त अभी भी ध्रुव को पढ़ा रहे थे | रमेश बिस्तर से उठे और जयंत के निकट आकर बोले --

    "घड़ी की सुँई देखी है तुमने ? सुबह के दो बज गए हैं | तुम्हारे सोने का समय कब होगा ?"

  • " पापा जी, ध्रुव की परीक्षा है न, इसलिए ... !"
  • "परीक्षा ध्रुव की है, पर देख रहा हूँ, परीक्षा का तनाव ध्रुव से अधिक तुम ले रहे हो ! उसे उसकी सामर्थ्य और रुचि के अनुसार पढ़ने की छूट दो !"
  • "मैं ध्रुव को नहीं पढ़ाऊँगा, तो इसके सहपाठी आगे निकल जाएँगें और यह पीछे छूट जाएगा, पिछले वर्ष भी ...!"
  • " जयन्त, इसके सहपाठियों से आगे रखने की होड़ में तुम इस बच्चे का बचपन छीन रहे हो ? दूसरों से आगे निकलने के तनाव की गठरी अपने और ध्रुव के सिर पर लादकर तुम इसके जीवन के आनंद से दूर करते जा रहे हो !"
  • " छोड़ दूँ इसको पढ़ाना ? नहीं पढ़ाऊँ बच्चे को ? फेल हो जाने दूँ ? पता नहीं, आपको ऐसा क्यों लगता है कि मैं इसे पढ़ा कर कुछ अनुचित कर रहा हूँ !" जयंत ने झुँझलाते हुए कहा |
  • परीक्षा के नाम पर तुम न दिन में बच्चे को खेलने की अनुमति देते हो और न रात को सोने की अनुमति दे रहे हो ! यह तो बच्चे पर अत्याचार की सीमा पार करना है |"
  • " पापा जी आपको हर बात में ऐसा लगता है कि हम बच्चे पर अत्याचार कर रहे हैं | आपने ध्रुव के मन में हमारी छवि एक अत्याचारी की बना दी है | जयंत जो कुछ भी कर रहे हैं, अपने बेटे के उज्जवल भविष्य के लिए ही तो कर रहे हैं | उसे पढ़ाने के लिए स्वयं भी तो यह इतना परिश्रम कर रहे हैं, आप फिर भी जयंत को अत्याचारी घोषित कर रहे हैं | आखिर आप चाहते क्या हैं |" जयंत की पत्नी मनीषा ने कहा |
  • " पापा जी, मनीषा बिलकुल ठीक कह रही है | आपने हमारी शिक्षा के लिए इतना ही तनाव लिया होता, तो मैं आज एक बड़ा अधिकारी होता ! लेकिन, आपको तो हमारी सुख-सुविधाओं से अधिक मौज-मस्ती और संस्कार प्रिय हैं !"
  • मनीषा के बोलते ही वातावरण में गर्मी बढ़ गयी थी | उस वातावरण को और अधिक उष्णता प्रदान की मनीषा को जयंत के समर्थन ने | पुत्र और पुत्रवधू का अपने प्रति एक सुर में विरोधी व्यवहार देखकर कुछ क्षणों के लिए पिता की चेतना पर निराशा का ऐसा साम्राज्य स्थापित हो गया कि उन्होंने पोते ध्रुव को अपने पक्ष में करते हुए बेटे जयंत को स्वविवेकहीन और पत्नी का पिछलग्गू तक कह दिया | जीवन में आध्यात्मिकता को सुख शांति का आधार बताते हुए वे स्वास्थ्य और संस्कार की आवश्यकता पर विशेष बल दे रहे थे, तो दूसरी ओर जयंत भौतिक सुख-सुविधाओं और सामाजिक मान-प्रतिष्ठा को महत्वपूर्ण बताते हुए अपने पक्ष को प्रबल कर रहे थे | यद्यपि ध्रुव की आँखों में नींद और मस्तिष्क में भरी थी, तथापि उसने दादा और पिता के बीच वाद-विवाद बढ़ता देखकर परिस्थिति पर नियंत्रण करने के एक छोटे से प्रयास के अंतर्गत दादा जी से विनम्र आग्रह किया -
  • "दादाजी मुझे नींद नहीं आ रही है ; थकान भी नहीं हो रही है | थोड़ी-सी देर और पढ़ने दीजिए, कल परीक्षा देने के बाद जी-भर सोऊँगा ! अभी आप सो जाइए ! प्लीज !" ध्रुव के विनम्र आग्रह को स्वीकार कर रमेश दादा अपने बिस्तर पर चले गए | प्रातः चार बजे उनकी आँखें खुली, तो उन्होंने देखा ध्रुव अपने पिता जयंत के साथ अभी भी अध्ययनरत था |
  • सुबह सात बजे ध्रुव विद्यालय के लिए प्रस्थान करने लगा, जयंत ने उसको एक बार पुनः स्मरण कराया - " ध्रुव, बेटा, प्रश्न-पत्र में दिये गये सभी प्रश्न हल करना ; इस बार परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके तुम्हें कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करना है ! " "जी, पापा जी !" कहकर ध्रुव स्कूल-बस में चढ़ गया |
  • परीक्षा का समय सुबह आठ से ग्यारह बजे तक निर्धारित था | ध्रुव साढ़े आठ बजे घर वापस लौट आया और चुपचाप कमरे में जाकर अपने बिस्तर पर लेट गया और चादर ओढ़कर मुँह ढाँप लिया | उसके संभावित समय से पूर्व घर लौटने और किसी से कुछ कहे बिना उदास मनःस्थिति के साथ बिस्तर पर जाने से माँ और दादा चिन्ताग्रस्त हो गये | यह तो निश्चित था कि ध्रुव की परीक्षा संपन्न नहीं हुई है, लेकिन, क्यों नहीं हो सकी ? ध्रुव से इसका कारण जानने का उसके दादा और माँ ने अपनी सामर्थ्य-भर प्रयास किया, परन्तु जब सफलता नहीं मिली, तो फोन करके जयंत को इस विषय में सूचना दी गयी | सूचना मिलते ही जयंत अपने कार्यालय से घर लौटे | ध्रुव के निकट जाकर वात्सल्यपूर्ण मृदु स्वर में पुकारते हुए स्नेहपूर्वक उसके ऊपर से चादर उतार दी | चादर रूपी आवरण उठाने के पश्चात जयंत ने देखा, उसकी आँखों से अश्रु-धारा बह रही थी ; निरन्तर अश्रु-प्रवाह के कारण चादर तथा बिस्तर का वह भाग, जो उसके चेहरे अास-पास था,दृग-जल से गीला हो चुका था | जयंत ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा | जयंत के होंठ मौन थे, किन्तु पिता की आँखों में उठ रहे प्रश्न-विप्लव के समक्ष ध्रुव का मौन रह पाना कठिन था | अतः अपनी गहन पीड़ा-व्यथा को शब्दों में रूपान्तरित करके उसने गंभीरतापूर्वक कहा -
  • "पापा, मैं पढ़ना चाहता हूँ, लेकिन प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए नहीं पढ़ना चाहता !"
  • " क्यों, बेटा ?" जयंत ने सहज-स्वाभाविक ढंग से पूछा |
  • "अपने एक मित्र आर्यन को सदा के लिए खो देने के बाद, मैं अपने दूसरे घनिष्ठ मित्र शिखर को खोना नहीं चाहता हूँ !" कहते हुए ध्रुव बिलख-बिलखकर रोने लगा | ध्रुव का उत्तर सुनकर उसके माता-पिता तथा दादा का हृदय किसी अज्ञात, फिर भी चिर-परिचित-सी अनहोनी की शंका से घिर गया | बच्चों की हत्या-आत्महत्या, स्वयं घर छोड़कर चले जाने तथा अपहरण जैसी घटनाओं की सूचनाएँ दिन-प्रतिदिन समाचार-पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं ! कहीं आर्यन ... ! इस आशंका से तीनों की धड़कने बढ़ गयी |
  • कुछ क्षणोंपरान्त ध्रुव ने धैर्य धारण करके उन्हें बताया -
  • "परीक्षा में आर्यन को मुझसे और शिखर से कम अंक मिलने पर उसके पापा उसको बहुत डाँटते थे ; कई बार पीटते भी थे ! उसके पापा चाहते थे, हमसे अधिक अंक प्राप्त करके कक्षा में प्रथम स्थान पर रहे | आर्यन को अपने मित्रों के स्वयं से अधिक अंक मिलने पर कभी बुरा नहीं लगता था, वरन् वह बहुत प्रसन्न होता था | आर्यन को उसके पापा की डाँट-पिटाई से बचाने के लिए पिछले वर्ष की हरेक परीक्षा में मैंने और शिखर ने दो-दो प्रश्न हल किये बिना छोड़ दिये थे और इस विषय में कभी किसी को नहीं बताया, इसलिए पिछली कक्षा में आर्यन के प्रथम स्थान प्राप्त करने पर हम दोनों मित्र बहुत प्रसन्न थे | इस वर्ष भी मैं और शिखर ऐसा ही करने वाले थे, लेकिन ... !"
  • कहते-कहते ध्रुव मौन हो गया और एक क्षणोपरान्त पुनः कहना आरम्भ किया - " आर्यन पर अपने पापा का बहुत दबाव था | वार्षिक परीक्षा में अपने पापा की अपेक्षाओं को पूरा कर पाएगा या नहीं, इस विषय को लेकर वह प्रायः डिप्रेशन में रहता था | हम दोनों उसको समझाने का भरसक प्रयास करते थे कि वह बहुत अधिक परिश्रमी है, इसलिए कक्षा में प्रथम ही आएगा | उसको नहीं पता था, हम दोनों क्या करने वाले हैं, इसलिए उसने हमारी बातों पर विश्वास नहीं किया और कल छठी मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट से कूदकर ... !" यह कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगा | ध्रुव को अधीर होते हुए देखकर माता-पिता तथा दादा व्यग्र हो उठे | अपने वात्सल्यपूर्ण हाव-भाव तथा मृदु व्यवहार से उन्होंने उसको सांत्वना दी, तो उसका चित्त शान्त हो गया और एक रात का जागा हुआ ध्रुव नींद के आगोश में समा गया |
  • ध्रुव के सोने के पश्चात् उसके दादा रमेश ने जयंत और मनीषा की ओर देखकर कहा - "इसीलिए कहता हूँ, बच्चे की रुचि के अनुरूप उसकी पढ़ाई और खेल में संतुलन बनाए रखना चाहिए | न पढ़ाई में अति , न खेल में अति ! अन्यथा परीक्षा-प्रेत उसको जीवन के आनंद से वंचिच कर देगा ! इस विषय में अब तुम्हारा क्या विचार है ? "
  • " वही, जो आपका है, पापा जी !" जयंत ने सिर झुकाकर कहा |
  • अंततः वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था कदापि नहीं होना चाहिए था और जिसकी किसी को आशंका भी नहीं थी 14 जनवरी की चिट मुहूर्त ठंडी रात थी मैं गहरी नींद में सो रही थी मेरे मोबाइल की अचानक घंटी बजी यद्यपि मैं कभी भी रात में अपने मोबाइल का स्विच ऑफ नहीं करते किंतु प्रायर है रात में जब कभी मोबाइल की घंटी बजती है मैं उसे सुबह का अलार्म समझकर बस्ता रहने देती हूं यहां तक कि कई बार अलार्म का शोर बंद करने के लिए भी उठकर या हाथ बढ़ाकर मोबाइल का अलार्म बंद करने का कष्ट नहीं उठाते किंतु कुछ रात दैवीय सहयोगी था की मोबाइल की पहली घंटी बजते ही मैंने मोबाइल उठाया और कॉल रिसीव कर के कहा हेलो मेरे हेलो बोलते ही दूसरी ओर से गहन पीड़ा में डूबा हुआ दीदी का स्वर दीदी का स्वर आया कविता बहन मेरे प्रियंका ने जहर खा लिया है दीदी के पीड़ा में डूबे हुए स्वर में प्रियंका विश्व भक्षण की सूचना से सुन कर मेरे मुख से एक भी शब्द निश्चित नहीं हो सका उसके क्षण के लिए ऐसा लगा कि मेरे हृदय की धड़कन में बंद हो गई हैं मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया है उसे क्षण के लिए ऐसा अनुभव हो रहा था कि प्रकृति का हर एक कण निष्क्रिय हो गया था और सारा संसार रुक सा गया था शीघ्र ही मेरी चेतना ने मेरे हृदय की दुर्बलता पर नियंत्रण पा लिया action उपरांत मैंने उन्हें का हेलो दूसरी ओर से मुझे कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली शायद दे देने मोबाइल कौन से हटा लिया था लेकिन मेरे कानों में उनका रतन स्वर्ग कानों को भेज रहा था उनके रुदन ने बिना कहे ही बहुत कुछ कह दिया था और मेरे दिल ने बहुत कुछ सुन लिया था अब तक मेरी आंखों से नींद गायब हो चुकी थी दृष्टि दीवार पर टंगे घड़ी पर जा टिकी रात के 2:00 बजे थे मैं तो तक्षण कंबल छोड़कर बिस्तर से नीचे उतरी पति और बच्चों को जगाकर मोबाइल पर मिली सूचना के विषय में बताया सूचना सुनकर सभी की नींद उड़ गई और सभी के होठों पर एक ही प्रश्न है क्यों उनके क्यों का उत्तर मेरे पास नहीं था लेकिन पता नहीं क्या कारण का मेरा अनुमान सत्य कहते निकट होने के बावजूद उस समय मेरे होठों तक नहीं आ सका शायद मनस्थिति उस कारण को प्रकट करने के अनुकूल नहीं थी या शायद उस कारण को प्रकट करने का वह समय उचित नहीं था मैंने केवल इतना कहा मुझे मेरठ जाना है दीदी के पास अभी इसी समय दीदी को मेरी आवश्यकता है मन में आ रहा था कि पलक झपकते ही अपनी बहन के पास पहुंच जाऊं काश ऐसा हो सकता हम भी चलेंगे मेरे तीन बच्चे ने संदेश स्वर में कहा नहीं मेरे निर्णायक उत्तर तथा मेरी मनस्थिति से बच्चे से हम को मेरी ओर देखने लगे मैंने स्वयं को संभालते हुए ने समझाया यह समय वहां भीड़ बढ़ाने का नहीं है जाता सहायता करने का है बच्चों ने कम शब्दों में अधिक समझ लिया और मैंने उसी समय मेरठ जाने के लिए पति के साथ घर से प्रस्थान कर दिया घर से बाहर निकली तो पूरा वातावरण कोहरे की चादर में लिपटा हुआ था 1 मीटर दूरी पर खड़ा हुआ आदमी दिखाई नहीं पड़ रहा था अनुभव गाड़ी स्टार्ट कर दी हमारी गाड़ी सड़क पर घर से निकलते हुए मैंने उनसे संपर्क किया मैंने उन्होंने बताया कि बेटे को लेकर अस्पताल पहुंच चुकी हैं रास्ते में भी मैंने दीदी से कई बार संपर्क किया उन्हें डानस बनाया शांत नदी के अधिक चिंता ना करें सब कुछ ठीक हो जाएगा किंतु हर बार दीदी अधिक और अधिक अधीर हो स्तिथि अंतिम बार जब मैंने फोन किया तो दीदी जैसे ही दीदी की आशा निराशा में बदलने लगी थी दीक्षित का रूठी थी कविता मेरे बच्चे की बलि चढ़ गई है अब दीदी की चीख और उनके शब्द सुनकर मेरी सांस थम गई मैंने संपर्क नहीं करता लेकिन मेरा मोबाइल टूट कर गिर गया नाम का पूरा नहीं सुन सकते क्या सुन रही थी उनकी अकथनीय वेदना को समझ रही थी पर मैं कुछ नहीं कर सकती थी दिल्ली से मेरठ तक 1 घंटे की यात्रा कोहरे के कारण 3 घंटे में पूरी करके जब हम अस्पताल पहुंचे दीदी मुझे देखते ही फफक पड़े अपने बच्चे को इस दशा में देखने कि मुझ में हिम्मत नहीं है तो उसके पास जा मेरे बच्चे को अकेला बच्चा है ना प्रियंका icu में बिस्तर पर लेटा हुआ जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा को निहारता हुआ अदृश्य शक्ति के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा था उपचार की पूरी टीम उसके चारों ओर से घिरे हुए थे उस समय वह पूर्ण चेतन अवस्था में था मुझे देखते ही पहचान लिया मौसी जी बहुत जलन हो रही है यह लोग मुझे पानी नहीं पिला रहे कोई भी पानी नहीं पिला रहा प्लीज तो मुझे एक गिलास पानी पिला दे जनवाणी में से प्रार्थना की उसने कभी कम नहीं समझा उसके अनुभव करते हुए पानी देने का निवेदन किया परंतु उन्होंने पानी के लिए मना कर दिया इसके लिए इंजेक्शन जा रहे हैं मेरा हाथ पकड़ रखते हैं पहले पता होता इतनी जलन होगी होगी तो मैं कभी सल्फास न खाता सीने में जलन हो रही है अपना हाथ फिर मौसी मैं उसके पेट छाती तथा ललाट तथा सिर पर इसमें पूर्व आखात फेरने लगे तो उसके चेहरे पर शांति का भाव आ गया उसके चेहरे पर शांत देखकर मेरे हृदय में कुछ आशा जागृत हुई लेकिन अगले क्षण उसके चेहरे पर वही बेचैनी और वही प्रार्थना मासी बस एक गिलास पानी आज के बाद कभी कुछ नहीं मांगूंगा बस आज आखिरी बार एक गिलास पानी मांग रहा प्लीज एक गिलास पानी पिला दो मैंने पानी के जब की ओर हाथ बढ़ाया वहां पर उपस्थित वरिष्ठ चिकित्सक ने कहा पानी देने से नियंत्रण में होती हुई स्थिति और अधिक बिगड़ सकते हैं एक बार ठीक हो जाए तब जितना चाहे पानी पिलाना दूध पिलाना प्लीज अभी आप बाहर जाइए हमें हमारा काम ठीक से करने दीजिए चिकित्सक का निर्देश सुनते ही प्रियंक ने मेरी कलाई कसकर पकड़ ली और आवेशित स्वर में जी का मुझे यहां नहीं रहना मुझे घर जाना है उसकी मनोदशा अनुभव करते हुए मैंने चिकित्सक से प्रार्थना करके नहीं रोक पर और प्रियंका होठों को गीला करने की अनुमति मांगी तो तुषार मैं दो 2 मिनट में पानी की दो-दो बूंद डालकर उसके होंठ गीले करते रहे दो तीन बार उसके उसने अत्यंत दयनीय मुद्रा ने गिड़गिड़ाते हुए गिलास भर पानी पीने की इच्छा प्रकट की परंतु मैं विवश थी चाह कर भी पानी नहीं पिला सकी और मेरा अबोध सा मासूम सा बच्चा हो तो फर्जी फिर आकर अपनी आंतरिक जलन को शांत करने का प्रयास करता रहा बीच बीच में बार बार मां मां मां पुकारते लगता मैंने उसके ललाट पर सिर पर इसमें से हाथ फेरते हुए कई बार कहा बेटा मां को भेज दो मैं चली जाऊं तो लोगों को यहां रहने की अनुमति नहीं है मौसी तू कहीं मत जाना मुझे छोड़कर तुम क्या मासिक काम है शायद मैं जानता था की दीदी उसको इस दशा में देखकर धीरज खो बैठेंगे स्वयं को संभाल नहीं पाएंगे दीदी ने पहले ही मुझे यह कह कर भेजा था कविता अपने बच्चे को इस हालत में देखने की हिम्मत मुझ में नहीं परेशान मत में मेरा बच्चा केला तुझे उसकी ममता भी है और हिम्मत भी तो प्रियंक के साथ ही रहना जब तक मैं ठीक हूं नहीं हो जाता जब तक वह अस्पताल में यादों से अश्रु धारा बह चली थी और गया था प्रियंका मेरे लिए महत्वपूर्ण थे मैं वही रुक गई उसके माथे को अपने हाथ से सहलाते हुए बोली जल्दी ही दूर हो जाएगी और तुम ठीक हो जाएगा बिल्कुल ठीक हो जाएगा चेहरे पर असहाय पीड़ा मिश्रित चिंता का भाव बढ़ाया कुषाणों तक वह मेरी ओर भाव सोनी दृष्टि से देखता रहा फिर मुझसे अत्यंत मासूमियत से बोला massey क्या मैं मरूंगा नहीं घबरा मत मेरे बच्चे तो बिल्कुल ठीक हो जाए ममता को सांत्वना दे रही थी किंतु उसके प्रश्न पूछने का ढंग ऐसा था कि मैं असमंजस में पड़ गई उसके प्रश्न में जीवन के प्रति मोह नहीं था मात्र 20 वर्ष की आयु में उसका जीवन के प्रति विकर्षण अनुभव करके बार-बार मेरे मस्तिष्क में प्रश्न उठने लगा अपने परिवार के साथ रहते हुए भी कोई इतना अकेला कैसे हो सकता है कि उसके लिए अपने आस्तित्व अपने जीवन का कोई महत्व ना रह जाए उसी समय मुझे स्मरण हो आया कि कुछ महापुरुष दीदी ने मुझे बताया था कि प्रियंका किसी लड़की के प्रेम में फस गया है आज भी अस्पताल में आते ही उन्होंने मुझे बताया था उसे लड़की के प्यार में पागल होकर मेरा बच्चा डिप्रेशन में चला गया पहले प्यार का नाटक करके मेरे भोले भाले बच्चे को फंसा लिया जब मेरा बच्चा प्यार में पड़ गया तो मुझे पूरा विश्वास था कि प्रियंका इस दशा के उत्तरदाई वही लड़की है किंतु प्रियंक के होठों पर एक बार भी उस लड़की का नाम या किसी अन्य प्रकार से कोई जिक्र नहीं आया उस लड़की के प्रति इतनी उदासीनता के पीछे प्रियंक की दृढ़ता थी निराशा थी अथवा उस लड़की के प्रति करना थी मैं या नहीं समझ पाई उस समय प्रियंक से उसके विषय में कुछ भी कहने पूछने का अर्थ था उसके यथेष्ट में व्यवधान डालना जिससे मैं लगभग अपरिचित थी केवल स्पष्ट अनुमान ही कर सकते थे प्रियंका आहों कराहों से प्रकट हो रहा होने वाले था उसकी बेचैनी का अनुभव करके मेरा धैर्य छूटता जा रहा था उसके बिस्तर के निकट खड़े होकर उसका एक हाथ अपने हाथ में लेकर दूसरा हाथ स्नेह पूर्वक उसके सिर ललाट छाती और पेट पर फेरते हुए दोपहर के 2:00 बज गए थे वह पूर्ण चेतना के साथ बातें कर रहा था इसलिए मैं यह नहीं समझ सकी थी कि उसके स्वास्थ्य में सुधार है अथवा नहीं कई बार वरिष्ठ चिकित्सक से भी यह ज्ञात करने का प्रयास कर चुकी थी किंतु उनसे कोई स्पष्ट होता नहीं मिल जाता है इस से मेरी चिंता बढ़ने लगी थी तभी मेरे कानों में प्रियंका चोपड़ा मौसी मेरे दिमाग पर से मेरा कंट्रोल छूटता जा रहा है मौसी मुझे कुछ हो रहा है कुछ हो रहा है तो मेरे पास ही रहना कहते-कहते उसकी चेतना लुप्त हो गई और मेरा हाथ उसके हाथ से छूट गया अजीत होते हैं डॉक्टर्स की टीम ने मुझे एक और हटाकर उस को चारों ओर से घेर लिया मैंने उन्हें स्क्रीन पर प्रियंका हृदय की धड़कन देखकर मेरे मन में अभी भी आशा की किरण शेष थी स्वयं को आश्वस्त करते हुए मैंने पुन्हा एक डॉक्टर से प्रियंक की दशा के विषय में पूछा उसने बताया सल्फास के परिजन नहीं इसके दिमाग को अरेस्ट कर लिया है इसलिए अभी से बच बचा पाना कठिन है बच्चे के दिमाग को सल्फास का जहर नष्ट नहीं किया है कविता उस लड़की के विश्वास रात में कुचल दिया है मेरे पीछे खड़ी पत्थर आई हुई आंखो से अपने अच्छे बच्चे की ओर देखते ही थी कह रही थी उनकी मुद्रा से प्रतीत हो रहा था कि उनकी आशा की किरण को धीरे-धीरे निराशा का गहन अंधकार निकलता जा रहा था दूसरी ओर उनके प्राणों से प्रिय पुत्र के सांसों का सूत्र धीरे-धीरे अंतर होता जा रहा था
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