Bhrun hatya ka paap in Hindi Short Stories by Ved Prakash Tyagi books and stories PDF | भ्रूण हत्या का श्राप

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भ्रूण हत्या का श्राप

भ्रूण हत्या का दोष

हरियाणा के रोहतक जिले के लाड़ली गाँव में पिछले दस साल से कोई लड़की पैदा नहीं हुई या यों कहिए कि लड़की को पैदा ही नहीं होने दिया, या तो गर्भ में ही जांच करवा कर उसको पैदा होने से पहले ही साफ करवा दिया और अगर किसी लड़की ने इतनी हिम्मत दिखाई कि वह पैदा हो गयी तब उसको पानी के टब में रख कर, ऊपर से भारी पत्थर से दबाकर डूब कर मर जाने को मजबूर कर दिया लेकिन किसी भी हालत में लड़की को पैदा होकर जिंदा रहने की इजाजत नहीं दी गयी और इसका परिणाम यह कि लाड़ली गाँव में सब लाडले ही लाडले हैं लाड़ली कोई नहीं।

गाँव के प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में नई डॉक्टर सीमा कुछ दिन पहले ही आई थी अतः उसको वहाँ के नियम कानून का ज्ञान नहीं था। रज्जो का अल्ट्रा साउंड करते हुए उसने बताया कि सब ठीक है, बच्चे की वृद्धि ठीक ढंग से हो रही है, किसी तरह की कोई भी खतरे वाली बात नहीं है। रज्जो का घरवाला, सास, ससुर और सरपंच वहीं केंद्र मे बड़ी बेसब्री से यह सुनने की प्रतीक्षा कर रहे थे कि डॉक्टर जल्दी से जल्दी जांच करके बताए कि गर्भ में लड़का है या लड़की, लेकिन डॉ सीमा ने उनको या रज्जो को ऐसा कुछ नहीं बताया।

सूबे सिंह गाँव का सरपंच इस बात का खास ख्याल रखता था कि किसी के भी गर्भ में कोई कन्या भ्रूण नहीं बचे, नहीं तो बाद मे कन्या हत्या का पाप करना पड़ेगा, इसलिए सरपंच सूबे सिंह ने डॉक्टर सीमा से पूछा, “डॉक्टर हमे तो ये बताओ कि रज्जो के गर्भ में लड़का है या लड़की।” डॉ सीमा ने इस बारे मे असमर्थता जताते हुए कहा, “नहीं सूबे सिंह जी, यह जांच मैं नहीं कर सकती, यह मेरे सिद्धान्त, मेरे पेशे और कानून तीनों के खिलाफ होगा अतः इस बारे में मुझसे कोई बात न करें तो ज्यादा अच्छा होगा, बाकी बच्चा और माँ दोनों का स्वास्थ्य ठीक है, अच्छी खुराक और समय समय पर जांच कराते रहने से बच्चा तंदरुस्त पैदा होगा।”

इतनी बात सुन कर सरपंच जी को क्रोध आ गया और आवेश में आकर बोले, “डॉक्टर! तू जानती नहीं, मैं यहाँ का सरपंच हूँ और पिछले दस साल से मैंने इस लाड़ली गाँव में कोई भी लड़की पैदा नहीं होने दी है और आगे भी नहीं होने दूंगा, इसलिए यह तो तुम्हें बताना ही होगा कि रज्जो के गर्भ में लड़का है या लड़की।”

डॉ सीमा को भी इतनी बात सुनकर क्रोध आना स्वाभाविक ही था और वह कहने लगी, “श्रीमान सूबे सिंह जी, क्या आप इस देश के कानून को नहीं जानते, आपकी इच्छा से कानून नहीं बदले जाते, लिंग परीक्षण गैर कानूनी है अतः मैं यह परीक्षण नहीं करूंगी।” इतना कह कर डॉ सीमा बाकी मरीजों को देखने लगी।

सरपंच भी बड़बड़ाता हुआ चिकत्सा केंद्र से बाहर चला गया और रज्जो के घर वालों से कहने लगा, “तुम लोग अब घर जाओ, चिंता मत करो, मैं आज ही स्वास्थ्य मंत्री जी के पास जाऊंगा और अब इस डॉक्टरनी का यहाँ से स्थानांतरण करवा कर ही वापस आऊँगा।”

अगले दिन डॉ सीमा का स्थानांतरण हो गया लेकिन उस चिकित्सा केंद्र में कोई भी नया डॉक्टर नहीं आया, एक सहायक ही चिकित्सा केंद्र को संभालने लगा। सहायक शिव कुमार सरपंच सूबे सिंह का खास आदमी था अतः उसने जांच करके बता दिया कि रज्जो के गर्भ में लड़की है। सरपंच ने शिव कुमार को रज्जो का गर्भ गिराने का आदेश दे दिया लेकिन चार महीने से ज्यादा के गर्भ को गिराने में रज्जो की जान को खतरा हो सकता है, यह सारी बात शिव कुमार ने सरपंच को बताई। सरपंच ने शिव कुमार की एक न सुनी एवं जिद्द पर अड़ गया कि गर्भ गिराना ही पड़ेगा।

शिव कुमार इस कार्य के लिए प्रशिक्षित नहीं था लेकिन सरपंच की जिद्द के सामने उसको ऐसा करना पड़ा। शिव कुमार ठीक से काम नहीं कर पाया और रज्जो का बहुत खून बह गया, खून चढ़ाने की सुविधा भी नहीं थी अतः रज्जो की मृत्यु हो गयी। सरपंच ने सारा मामला रफा दफा करवा दिया और स्वयं व शिव कुमार को बचा लिया। समय गुजरता गया एवं लाड़ली गाँव में लाडलों की फौज तैयार होती गई। सरपंच के अपने चार बेटे थे जो जवान हो गए थे लेकिन शादी किसी की भी नहीं हुई थी।

कोई भी लाड़ली गाँव में अपनी लड़की ब्याहने को तैयार नहीं था, क्योंकि लड़कियों की भयंकर कमी से पूरा क्षेत्र जूझ रहा था। अपने बड़े बेटे के लिए सरपंच ने दूसरे गाँव में जब बात चलाई तो उन्होने शर्त रख दी, “सूबे सिंह जी, अब तो लेन देन बराबर का होगा तभी काम चलेगा। मैं अपनी बेटी तो तुम्हारे बेटे से ब्याह दूंगा लेकिन तुम्हें भी मेरे बेटे का ब्याह अपने गाँव की किसी बेटी से करना पड़ेगा।”

सूबे सिंह कहने लगा, “चौधरी साहब! हमारे तो पूरे गाँव में ही कोई लड़की नहीं जन्मी, हम तुम्हारे बेटे का ब्याह कैसे करवा देंगे।”

चौधरी गुलाब सिंह ने जब सुना कि पूरे लाड़ली गाँव में कोई लड़की नहीं जन्मी तो उन्होने अपने पाँव पीछे हटा लिए एवं कहने लगे, “भाई सूबे सिंह! अब तुम ही सोचो जिस पूरे गाँव में कई सालों से कोई लड़की ही न जन्मी हो वहाँ के संस्कार कैसे होंगे और कौन ऐसे लोगों के बीच में अपनी बेटी का ब्याह करेगा।” इतना कहकर गुलाब सिंह उठ कर चले गए।

सरपंच का बड़ा लड़का चालीस का हो गया था लेकिन ब्याह नहीं हो सका और यही हाल गाँव के दूसरे लड़कों का भी था। पूरे गाँव में यही चिंता थी कि अगर लड़के ब्याहे नहीं जाएंगे तो आगे वंश कैसे बढ़ेगा। पंचायत हुई, पंचायत में इस बात पर गहन चर्चा हुई और विचार किया गया कि यह उन लड़कियों का श्राप हमारे गाँव को लग गया जिनकी हमने भ्रूण हत्याएं की हैं या जन्म लेते ही मार डाला।

रोहतक के पास हाइवे का काम शुरू हुआ, बहुत बड़ा प्रोजेक्ट था, रोहतक से हिसार, रोहतक से रिवाड़ी, रोहतक से दिल्ली वाले हाइवे पर तेजी से काम चल रहा था, बड़ी संख्या में मजदूर और मजदूरनियां काम पर लगे थे, इनमें ज़्यादातर बंगलादेशी थे क्योंकि बंगलादेशी मजदूर सस्ते पड़ते थे।

हाइवे लाड़ली गाँव के पास से ही निकल रहा था, वहाँ की जमीन भी इस प्रोजेक्ट में ले ली गयी थी। गाँव के पास ही कंपनी ने लंबी चौड़ी जगह किराए पर लेकर अपना कार्यालय बना लिया था, सभी मजदूर भी काम समाप्त करके शाम को वहीं आ जाते थे।

ठेकेदार का सरपंच से भी काम पड़ता रहता था और वे दोनों एक दूसरे के पास आते जाते रहते थे। एक दिन ठेकेदार ने पूछा, “सरपंच जी आप कुछ परेशान से रहते हैं, क्या कारण है?”

ठेकेदार की इतनी प्यार भरी बात सुनकर सरपंच भावुक हो गया एवं लगभग रोने को हो गया। ऐसी ही दुखी आवाज में सरपंच बताने लगा, “ठेकेदार साहब, हमारे गाँव पर श्राप है, और इस श्राप के कारण ही हमारे गाँव के बच्चों की शादियाँ नहीं हो पा रहीं हैं।” एक गहरी सांस लेकर सरपंच फिर बोलने लगा, “मैंने अपने गाँव में कोई भी लड़की पैदा नहीं होने दी, गर्भ में ही उसकी हत्या करवा दी और अगर कोई पैदा भी हो गयी तो उसको जन्म लेते ही मरवा दिया, इससे हमारे गाँव में लड़कों की फौज तो तैयार हो गयी लेकिन किसी ने भी हमारे गाँव में अपनी लड़की नहीं ब्याही और आज हमारे लड़कों की फौज कुवारों की फौज बन कर रह गयी है। अब तो लगने लगा कि आगे हमारे वंश ही खत्म हो जाएंगे।”

ठेकेदार कहने लगा, “सरपंच जी! अगर आप जाति-धर्म का बंधन नहीं मानते तो मैं आपके गाँव के कुछ लड़कों की शादी करवा सकता हूँ। मेरे यहाँ बहुत सी बंगलादेशी लड़कियां काम करती हैं अगर कहो तो मैं उनसे बात कर सकता हूँ लेकिन पहले आप सोच लो।” सरपंच सूबे सिंह ने कहा, “इस बारे में मैं सोच कर बताऊंगा।” और चला गया।

अगले दिन सूबे सिंह ने पंचायत बुलाई और भरी पंचायत में यह प्रस्ताव रखा। सरपंच का इस तरह का प्रस्ताव सुनकर लोग भड़क गए और सभी ने जमकर अपनी भड़ास निकाली।

जब सब अपनी भड़ास निकाल चुके तो सरपंच ने कहा, “भाई! लड़की किसी भी जात धरम की हो, हमारे कुएं पर नहाकर वो हमारी हो जाएगी। अगर आज हम ऐसा नहीं करेंगे तो हमारा वंश इसी पीढ़ी पर समाप्त हो जाएगा, ये जमीन जायदाद को बरतने वाला कोई न होगा।”

गाँव वालों न जब ठंडे दिमाग से सोचा तो उनको प्रस्ताव ठीक लगा एवं उन्होने उन बंगलादेशी लड़कियों से उनकी रजामंदी लेकर हिन्दू रीति-रिवाज से अपने गाँव के लड़कों की शादी करवा दी। कुआरों का गाँव गृहस्थों का गाँव बन गया, मजदूर लड़कियां चौधरन बन बैठी।

सरपंच ने एक और आदेश निकाला, “अब कोई भी लिंग परीक्षण नहीं कराएगा, लड़का या लड़की जो भी भगवान देगा, उसके जन्म पर हम ढ़ोल नगाड़े बजाकर खुशी जताएँगे।”

भ्रूण हत्या के दोषियों को सजा मिल चुकी थी एवं पश्चाताप करके उन्होने नई शुरुआत की थी।

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