lal batti in Hindi Short Stories by Ved Prakash Tyagi books and stories PDF | लाल बत्ती

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लाल बत्ती

लाल बत्ती

आइ सी यू में अपने जीवन से संघर्ष कर रही स्नेहा के बारे में सोचते हुए वहीं कुर्सी पर बैठे बैठे डॉ रमन को नींद की झपकी आ गयी। पूरे चौबीस घंटे की ड्यूटि लोक नायक अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में करने के बाद थक कर घर जा रहा था, लेकिन जैसे ही वह बारहखम्बा वाली लाल बत्ती पर रुका उसकी निगाह एक अर्धनग्न अस्त व्यस्त पड़े नारी शरीर पर पड़ी, जिसमे कोई भी हलचल नहीं हो रही थी।

डॉ रमन चौबीस घंटे की लोक नायक अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में ड्यूटि करने के बाद काफी थक चुका था और अब वह घर जाकर आराम करना चाहता था लेकिन एक डॉक्टर होने के नाते वह उस समय सड़क किनारे पड़े मूर्छित मानव शरीर को ऐसे छोड़ कर नहीं जा सकता था।

डॉ रमन ने गाड़ी घुमाकर उसके पास ले जाकर रोक दी, पच्चीस छब्बीस वर्ष की एक युवती मूर्छित पड़ी थी, उसके अंगों से लहू बह रहा था, शरीर अभी गरम था, साँसे चल रही थी, उसके ज़्यादातर वस्त्र फटे हुए थे। डॉ रमन ने वहीं से सौ नंबर पर फोन करके पुलिस को सूचित किया एवं उस मुर्छित पड़ी युवती को अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर लिटाकर सीधा लोक नायक अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में ले आया।

युवती को अस्पताल में भर्ती कराकर उसने वहाँ उपस्थित पुलिस अधिकारी को भी सूचित कर दिया। युवती की हालत चिंताजनक थी अतः उसको आइ सी यू में रखा गया।

जैसे ही डॉ रमन को नींद की झपकी आई तो मोबाइल फोन बज उठा, माँ का फोन था घर से, पूछ रही थी, “कब तक आओगे बेटा!! रात बहुत हो गयी है।” और बता रही थी, “अब इतनी रात में शंकर रोड से मत आना, पूसा रोड से ही आना।” डॉ रमन ने बस इतना ही कहा, “हाँ माँ, पाँच मिनट में निकलता हूँ, अभी घर आकर सब बताऊँगा।” और फोन काट दिया।

कुर्सी से उठकर युवती की सभी रिपोर्ट्स देखीं एवं वहाँ ड्यूटि डॉक्टर्स व नर्स से बात करके डॉ रमन घर के लिए निकल गया। बीस मिनट में वह अपने घर राजेन्द्र नगर पहुँच गया। माँ खाना गरम करने लगी तो बोला, “रहने दो माँ, मन नहीं है खाने का,” माँ ने कहा, “बेटा मैंने भी नहीं खाया है, मैंने सोचा तू आएगा तो तेरे साथ ही खा लूँगी।”

“माँ! यह क्या, आपने अब तक खाना क्यों नहीं खाया, अब आप खा लो, मैं नहीं खाऊँगा।”

“तो ठीक है बेटा, मैं भी आज भूखी ही सो जाऊँगी।”

“अच्छा चलो लगाओ खाना, मैं फ्रेश होकर आता हूँ।”

खाना खाते समय रमन ने सारी घटना माँ को बताई और सोने के लिए चला गया लेकिन घटना बार बार उसकी आँखों के सामने तैर रही थी, सुबह जल्दी से तैयार होकर अस्पताल के लिए निकल गया।

डॉ रमन ने युवती का एक फोटो क्लोज़ अप में मोबाइल से ले लिया था ताकि किसी को दिखाकर पहचान करवा सके।

अगले दिन डॉ रमन ड्यूटि जाते समय जब बारहखम्बा की लाल बत्ती पर रुका एक युवक कुछ अँग्रेजी किताबें लिए हुए उसकी गाड़ी के पास आकर खड़ा हो गया और कहने लगा, “सर, चेतन भगत की नई किताब आई है ले लो” और वह किताब दिखाने लगा जिस पर लिखा था “दी गर्ल इन रूम न॰ 105”, तभी हरी बत्ती हो गयी डॉ रमन ने उस युवक को बत्ती पार करके आने को कहा एवं स्वयं भी बत्ती पार करके गाड़ी एक किनारे पर रोक ली।

डॉ रमन ने किताब हाथ में ली और पूछने लगा, “तुम कब से इस लाल बत्ती पर किताबें बेच रहे हो?”

युवक बोला, “सर छः साल हो गए, अब आप जल्दी ले लो, मेरा धंधे का समय है, मुझे और भी किताबें बेचनी हैं।”

“देखो! मैं एक डॉक्टर हूँ, मेरा नाम डॉ रमन है, मैं लोक नायक अस्पताल में काम करता हूँ, क्या तुम मुझे अपना नाम बताओगे?”

“जी, मेरा नाम विमलेश झा है, मैं बिहार का रहने वाला हूँ, इस लाल बत्ती पर सुबह से रात तक दौड़ दौड़ कर मैं किताबें बेचता हूँ और जो कमाता हूँ उसी से मेरा घर चलता है। धूप, बारिश, सर्दी’, गर्मी में जी तोड़ मेहनत के बाद भी पेट भर भोजन अपने घर वालों को मैं नहीं दे पाता और अपने नसीब को कोसता रहता हूँ कि क्यों ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया, किसी तरह बारहवीं तक पढ़ा हूँ जब कहीं कोई काम नहीं मिला तो यहाँ आ गया।”

डॉ रमन ने विमलेश झा को पिछली रात की पूरी घटना बताई एवं अपने मोबाइल से उस लड़की का फोटो दिखाया तो विमलेश उसको तुरंत पहचान गया।

“अरे साहब! मैं किसी लफड़े में नहीं फंसना चाहता, आप मुझे मेरी किताब दे दें और मैं जाकर अपने काम पर लगूँ, दो पैसे कमा लूँगा साहब, आपने तो किताब लेनी नहीं।”

डॉक्टर रमन ने विमलेश से वह किताब खरीद ली, उसकी बाकी किताबें भी देखीं और उसने हैरी पौटर की सिरीज़ भी खरीद ली।

“अच्छा पंडित जी, आप तो किसी की सहायता करोगे नहीं,” “नहीं साहब ऐसा नहीं है, वो लोग बहुत खतरनाक हैं, आप भी थोड़ा दूर रहोगे तो यह आपके लिए अच्छा रहेगा, मैं तो अपना घर द्वार छोड़ कर बिहार से इतनी दूर आया हूँ, मैं पैसा भेजता हूँ तो मेरे परिवार का खर्चा चलता है, अगर मुझे ही कुछ हो गया तो मेरा पूरा परिवार भी भूखा मर जाएगा, आप मुझे तो इस झंझट से दूर ही रखें।”

डॉ रमन ने काफी कोशिश की लेकिन कोई भी कुछ भी बताने को तैयार नहीं हुआ, निराश होकर डॉ रमन अस्पताल पहुंचे तो देखा युवती को होश आ गया था, पुलिस उसका ब्यान ले रही थी।

युवती ने अपना नाम स्नेहा बताया, अब वह पूर्णतया होश में थी। स्नेहा ने बताया कि वह एक खोजी पत्रकार है और स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करती है, जब उसको पता चला कि दिल्ली की सभी लाल बत्तियों पर माफियाओं का राज है, उनकी आज्ञा के बिना लाल बत्ती पर कोई भी नया व्यक्ति न तो भीख मांग सकता है और ना ही कोई सामान बेच सकता है तो इसकी सच्चाई जानने के लिए मैं निकल पड़ी अभी पहली लाल बत्ती पर ही उसका सामना उन लोगों से हो गया, जो इस लाल बत्ती पर राज करते थे।

स्नेहा ने आगे बताया, “बारहखम्बा वाली लाल बत्ती चौक पर मैं उदास बैठी थी, मेरे पास एक बैग था जिसमे मेरे कुछ कपड़े व और जरूरी सामान था, मैंने वहाँ एक किताब बेचने वाले लड़के से कहा कि वह घर से भाग कर आई है और खर्चा चलाने के लिए वह भी किताब बेचना चाहती है, पहले तो उसने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया लेकिन कुछ देर बाद एक महिला को लेकर मेरे पास आया और कहने लगा कि यह आंटी ही यहाँ की मालिक हैं, इनसे बात कर लो। महिला मुझे वहाँ से उठाकर पीछे गली में ले गयी और वहीं पर एक छोटे से पार्क में बैठकर मुझसे मेरे बारे में पूछ ताछ करने लगी जैसे नाम, कहाँ से आई हो, घर क्यों छोड़ा वगैरह वगैरह। मैंने उसको अपना नाम पता सब बता दिया और यह भी बताया कि मैं घर से भागकर आई हूँ, अब मुझे यहाँ रहने के लिए कुछ काम तो करने ही पड़ेगा.........

जब महिला ने सुना कि मैं घर से भागकर आई हूँ तो वह और भी ज्यादा मेहरबान हो गयी और मुझे अपनी झुग्गी में ले गयी, खाना खिलाया, रात में सोने की जगह भी दी..........

रात में तीन लोग उस महिला से मिलने आए, वे दो बच्चों को चुरा कर लाये थे जो बहुत छोटे थे, उन बच्चों को लेकर वे चारों लोग एक खाली पड़ी इमारत में चले गए, उनके जाने के बाद मैं भी चुपचाप उनके पीछे वहाँ चली गयी, उस रात मैं जान पायी कि यहाँ प्रत्येक लाल बत्ती का ठेका छुटता है, किसी भी लाल बत्ती पर सिर्फ ठेकेदार के आदमी ही काम कर सकते हैं चाहे वह भिखारी हो, हिजड़े हों या सामान बेचने वाले हौकर, और ये लोग छोटे बच्चों को अगवा करके उन्हे भी भिखारी बनाते हैं, वहाँ उन लोगों ने और भी बच्चे बंद कर रखे थे, मैं यह सब देखकर उस समय वापस आकर लेट गयी और सोने का नाटक करने लगी तभी वे लोग भी वापस आ गए और वापस आकर महिला मेरी तरफ इशारा करके उन लोगों से कहने लगी कि लड़की आज ही घर से भाग कर आई है, जवान है, सुंदर है, एक दो दिन बाद इसको धंधे में लगा देंगे, रात में कई बड़ी गाड़ियों वाले पूछते हैं। उन तीनों ने भी महिला की हाँ में हाँ मिलाई और कहने लगे कि इससे भी अच्छी आमदनी हो जाएगी और इस आमदनी का हिस्सा बड़े मालिक को भी नहीं देना पड़ेगा।

मैं उनकी हाँ में हाँ मिलाती रही और उनके सभी राज जानती रही लेकिन जब मैं उस खाली पड़ी इमारत में वहाँ बंद बच्चों की विडियो बना रही थी तभी वे लोग भी वहाँ पर आ धमके, मैंने वहाँ से निकलने का असफल प्रयास किया और पकड़ी गयी और फिर उन्होने मुझे मार मार कर अधमरा कर दिया, जब उन्होने मेरे सामान की तलाशी ली तो उनका गुस्सा और भी भड़क गया एवं उन्होने कैमरा, मोबाइल सब तोड़ डाले, यह तो अच्छा था कि मैंने सारी रिकॉर्डिंग अपनी मेल में सेव कर ली थी नहीं तो मेरी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता।

वो तीनों मेरे साथ दुष्कर्म करने की कोशिश भी करने लगे और मेरे कपड़े फाड़ दिये लेकिन मेरे अंदर ना जाने कहाँ से इतनी ताकत गयी कि मैं उनके चंगुल से निकल भागी। जैसे ही मैं सड़क पर आई तो उनमे से एक ने किसी भारी वस्तु से मेरे सिर पर वार कर दिया और मैं मूर्छित होकर वहीं गिर पड़ी, शायद मुझे मरा हुआ समझ कर वो तीनों वहाँ से भाग गए होंगे।

लेकिन एक बात तो पक्की है कि उनका बड़ा मालिक कोई और है जिसके लिए ये सब लोग काम करते हैं अब मुझे उस तक पहुँचना होगा तभी मेरी कहानी पूरी होगी।

स्नेहा बोली, मैं बड़े मालिक तक पहुँच कर इस कहानी की पूरी सच्चाई जान कर ही रहूँगी।”

“अगर ऐसा है तो स्नेहा जी मैं भी आपके साथ हूँ और अब हम दोनों मिलकर इस लाल बत्ती के रहस्य को खोज निकालेंगे और उन बच्चों को बचाने का पूरा प्रयास करेंगे जिनका बचपन इन लोगों ने छीनने की कोशिश की है, जिन माओं की गोद इन्होने सूनी कर दी है।” और पुलिस के साथ मिल कर अपनी योजना बनाई।

एक दिन स्नेहा और डॉ रमन उन लोगों का पीछा करते करते बड़े साहब तक पहुँच गए। पहली बार उनके सामने उस माफिया सरगना का चेहरा था जिसे देखकर वे दोनों स्वयं पर भी विश्वास नहीं कर पाये, उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी और वे हतप्रभ से वहीं के वहीं खड़े रह गए। स्नेहा को लेकर डॉ रमन एक अंधेरे कोने में छुप गए, वहीं से उन्होने अपने कैमरे को टी वी चैनल से जोड़ा, स्नेहा ने अपना कैमरा चालू कर डॉ रमन को पकड़ा दिया और स्वयं माइक पकड़ कर साहस किया एवं उस बड़े साहब से सवाल करने लगी।

स्नेहा ने कहा, “समाज सेवी महोदय कैमरा सीधा चैनल के टी वी से जुड़ा है, अपने लोगों से कह दो किसी भी तरह की कोई हरकत न करें जिससे आपको समस्याओं का सामना करना पड़े, पुलिस को भी इसकी पूरी सूचना है, शायद अब तक पुलिस ने इस इमारत को चारों तरफ से घेर लिया हो।”

“मेरा बस एक ही सवाल है, आप इतने बड़े समाज सेवी होकर भी लाल बत्ती का माफिया गिरोह क्यों चलाते हैं?”

समाज सेवी ने बड़ी ही सरलता से जवाब दिया, “मैंने लाखों लोगों को रोजगार दिया हुआ है, लाखों घरों के चूल्हे लाल बत्ती की कमाई से जलते हैं, सभी समाज सेवी समाज सेवा की आड़ में क्या क्या धंधे करते हैं आपको पता भी नहीं है।”

“लेकिन क्या आप बताएँगे कि आपने कितनी गोद उजाड़ी, कितने बच्चों को अगवा करके अपंग बनाया और भीख मांगने पर मजबूर किया है।”

“लोग छोटे बच्चों पर कुछ ज्यादा ही दया दिखाते हैं और मैंने बस लोगों की इसी दया भावना का लाभ उठाकर छोटे बच्चों को अगवा करवाया, उनको अपंग बनाया एवं छोड़ दिया लाल बत्ती पर भीख मांगने के लिए।”

टेलिविजन पर खबर चल रही थी, बाहर लोगों की भीड़ जमा हो गई थी, भीड़ का गुस्सा बढ़ता जा रहा था, मारो मारो की आवाज गूंज रही थी, पुलिस ने भी उस स्थान को चारों तरफ से घेर रखा था, पुलिस ने समाज सेवी और उसके साथियों को हिरासत में ले लिया लेकिन जैसे ही पुलिस उनको लेकर बाहर जाने लगी पुलिस भीड़ के ऊपर काबू न पा सकी एवं भीड़ ने उन सबको वहीं पटक कर पीट पीट कर मार डाला। स्नेहा एवं डॉ रमन तो वास्तविक जीवन के नायक नायिका बन चुके थे, उनका सभी टी वी चैनल साक्षात्कार करने लगे।

टी वी पर स्नेहा और डॉ रमन थे उनसे तरह तरह के सवाल पूछे जा रहे थे जिसमे एक सवाल था, “ऐसे माफियाओं को कैसे रोका जा सकता है?”

“हमारी जागरूकता ही हमे ऐसे माफियाओं से बचा सकती है लाल बत्ती पर भीख मांगने वाले बच्चों को भीख ना देकर उनका फोटो सोश्ल मीडिया पर शेयर कर सकते हैं, शायद किसी का गुम हुआ बच्चा उनको मिल जाए।”

“स्नेहा जी आप आज कि नायिका हैं और डॉ रमन भी किसी नायक से कम नहीं तो क्या आप डॉ रमन को अपने जीवन का नायक बनाना पसंद करेंगी?”

स्नेहा ने कहा, “हाँ, मैं तो डॉ रमन जैसा जीवन साथी पाकर स्वयं को धन्य मानूँगी लेकिन यह तो डॉ रमन ही बता सकते हैं कि वह क्या चाहते हैं।”

डॉ रमन कुछ कह पाते उससे पहले ही वहाँ पहुँच चुकी डॉ रमन की माँ ने कहा, “हाँ, मैं अपने रमन के लिए स्नेहा जैसी बहादुर लड़की को अपनी बहू के रूप में पाकर गर्व महसूस करूंगी।”

डॉ रमन के चेहरे पर भी खुशी की मुस्कान बिखर गयी।

सभी लोगों ने ज़ोर से नारा लगाया ‘डॉ रमन जिंदाबाद, स्नेहा दीदी जिंदाबाद।’