आत्मालोक

पिछले भागों में आपने पढ़ा कि कैसे उस रात मेरी जिंदगी के आत्माओं की दुनिया से पर्दा हटा , फिर  बेपर्दा हो गया ख़ौफ़ का राज 
इस भाग में सैर करें आत्माओं की दुनिया में।
पिछले भाग में महंत जी ओर मेरे मध्य आत्माओ के अस्तित्व के संदर्भ में संवाद हुआ उसके ठीक आगे।

                   इसके बाद पहाड़ियों के उबड़ खाबड़ रास्ते से होते हुए हम मंदिर के ठीक पीछे पहुंचे जहां पर पहाड़ के कटने से एक अर्धचंद्राकार मैदानी आकृति बनी हुई थी जिस के विपरीत तरफ मंदिर की ऊंची दीवार थी वहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था सिवाय एक छोटे से दरवाजे के , उस चंद्राकार मैदान में एक विशाल वर्गाकार यज्ञवेदी बनाई गई थी । यज्ञवेदी के एक सिरे पर विभिन्न प्रकार के अनाज से एक परवलयाकार रंगोली जैसी लगभग 10 फुट की आकृति बनाई गई थी जिसमें पीले रंग के पुष्प भरे हुए थे उसके ठीक बीच में उड़द की दाल से एक वृत्ताकार आकृति बनाई गई थी , जिसमें लाल रंग के फूल वह गुलाब की पत्तियां बिखरी हुई थी। उसमें मुझे बैठा दिया गया । महंत जी प्रोफेसर राममूर्ति हरि और सौरभ यज्ञवेदी के एक तरफ बैठ गए ,  उनको महंत जी के द्वारा ताड़पत्र दिए गए जिन पर कुछ मंत्र लिखे हुए थे उन मंत्रों का जाप उन सभी को करना था।



 उनके मंत्र जाप के स्वरों से मेरी पलकें भारी होने लगी । मैंने खुद को जगाए रखने की बहुत कोशिश की लेकिन लगभग 2 घंटे बाद यज्ञ मंडप में ही मुझे नींद आ गई। फिर अचानक से किसी ने मुझ पर पानी फेंका। मैं उठा , तो देखा.. मैं उसी परवलयाकार आकृति में बैठा हूं । लेकिन सामने यज्ञवेदी नहीं है । उसकी जगह पर एक दिया (दिपक) जला हुआ है । अब मैं पहाड़ों में ना होकर शायद रेगिस्तान में ... किसी हवेली के पीछे की तरफ था । जहां खेजड़ी के पेड़ लगे हुए थे । हवेली बेहद आलीशान थी । उसकी सभी खिड़कियों पर कांच की नक्काशी की गई थी । कुछ खुली खिड़कियों से अंदर लगे हुए रंग बिरंगे पर्दे दिख रहे थे । पर एक चीज बेहद अजीब थी.... हवेली की पिछली दीवार पर 4 सफेद पर्दे लगाए गए थे !! शायद उनके अंदर कोई दरवाजा हो! इससे पहले मैं कुछ समझ पाता मुझे महंत जी की आवाज़ सुनाई दी      "अंकित यह दिया उठाओ और उस लड़की की आत्मा को खोजो.... जब तक यहां पर यज्ञवेदी सुरक्षित है ,,तब तक इस को कुछ नहीं होगा इसलिए जल्दी करो और उसे ढूंढ कर इस चक्र में ले आओ।" 

सांझ की हल्की लाल रोशनी में वह हवेली बेहद खूबसूरत नजर आ रही थी। मैं दिया उठाकर इस परवलयाकार परिधि से बाहर निकल गया। मैं सबसे पहले सबसे बाईं ओर की पर्दे की तरफ गया जैसे ही पर्दा हटाया तो गहरा अंधेरा नजर आया। यहां तक दीए की रोशनी भी उस अंधेरे को हटा पाने में सक्षम नहीं थी। आगे बढ़ने की कोशिश की तो पता चला पर्दे के पीछे काले स्याह रंग की एक दीवार है। मैंने दीवार को काफी टटोला और बड़े ध्यान से देखा तो उस दीवार पर एक तारे जैसी आकृति हल्के से सफेद रंग में बनी हुई नजर आई । मैंने जितनी कोशिश कर सकता था उतनी की ...पर वहां पर कोई दरवाजा नहीं था । वह केवल एक दीवार ही थी। पर अजीब सी मनहूसियत फैली थी उस काली दीवार पर ......….ठीक ऐसा ही दूसरे पर्दे के पीछे भी था । जब तीसरा पर्दा खोला तब उसके पीछे भी वही दीवार आई । लेकिन मैंने हर बार की तरह उसे धक्का मारने की कोशिश की तो पता चला वह दीवार केवल दिख रही थी... हकीकत में नहीं थी और मैं उस काली दीवार की आर पार हो गया और हवेली के एक गलियारे में पहुंच गया। हवेली में सामने की तरफ दीवार पर 8 फुट ऊंचाई पर दो मशालें लगी थी । जिनसे हल्की सी रोशनी हवेली में फैली थी। खुशबू से लगा कि मैं शायद स्नानगृह वाले भाग में था । यह लगभग 5 फुट चौड़ा वह 15 फुट लंबा गलियारा था जिसके दोनों तरफ शायद स्नान घर बने हुए थे । उनके दरवाजे और उन पर लगे पर्दों को खोलकर देखा तो पानी के बड़े-बड़े टब, गुलाब की पत्तियां , इत्र ,, तेल की बड़ी-बड़ी शीशियां ....इन सब को देखकर यकीन हो गया कि यह जगह स्नानघर ही है । देखकर कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई अभी यहां से नहा कर गया है।
वहां पर गहरा सन्नाटा छाया था अचानक से पायल और चूड़ियां खनक ने की आवाज सुनाई दी। मैं सतर्क होकर दीए को चेहरे के सामने लाकर खड़ा हो गया। आवाज बढ़ने लगी फिर अचानक से उस गलियारे में सामने से भागती हुई राजपूती पोशाक पहने ..... गहनों से लदी हुई ..... घूंघट डाले हुए एक औरत चिल्लाते हुए आई और आकर मेरे पांव पर झुक गई ओर रोते रोते बोली ," हुकुम ....हमें बचा लो !!!..हुकुम... हमें बचा लो.!! साहैब पे शैतान चढ़ गया है वह हमारी जान ले लेंगे।"
फिर जैसे किसी ने उसके पेट पर बेहद जोर से लात मारी हो..!! मैंने उसे लात नहीं मारी थी .... पर वह लात उसी जगह से लगी थी जहां पर मैं खड़ा था ,और वह औरत चिल्लाते हुए गलियारे से बाहर जाकर हवेली के चौक के बीचो बीच में गिर गई। मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया कि यह हो क्या रहा है ।तभी हवेली में भारी कदमों की आवाज गूंजने लगी । अचानक से एक राजसी पोशाक पहने हुए एक लगभग 6 फीट लंबा आदमी आया और उसने उस औरत को पांव से पकड़कर दीवार पर दे मारा। उसके बाद अपने म्यान से तलवार निकालकर उस औरत की गर्दन पर बहुत जोर से वार किया। इससे उसकी गर्दन पूरी तो नहीं कटी ,,,,पर आधी गर्दन में तलवार समा चुकी थी । उस औरत की चीखों से पूरी हवेली गूंज रही थी और मैं सहमा सा खड़ा.... हाथ में दिया लिए ....बस देख रहा था । लेकिन उस आदमी पर तो शायद कोई और ही जुनून सवार था । वह ताबड़तोड़ वार उसकी गर्दन पर कर रहा था । वार एक जगह पर ना होने के कारण से गर्दन और चेहरे के आसपास से मांस उछल रहा था । फिर आखरी में गर्दन अलग हो ही गई । उस औरत के पांव और बचा हुआ पूरा शरीर बुरी तरह से कांप रहा था। उसकी चीखें  हवेली में गूंज रही थी । गर्दन कट जाने के बाद में लहूलुहान शरीर  को उस आदमी ने अपने हाथ में उठाया। उस आदमी की कमर कमर पर कोई धातु की छड़ पर बना हुआ तारे जैसा प्रतीक चिन्ह बंधा हुआ था। ऐसा ही चिन्ह  उन पर्दों के पीछे....हवेली की पिछली दीवार पर भी था । उसने दाएं हाथ को उस औरत के सिर को  बालों से पकड़कर उठाया और बाएं हाथ से नाभि के करीब उस तारे जैसे प्रतीक  को लगाया और अपनी गर्दन को पीछे की तरफ झुका कर वह कोई मंत्र से  बुदबुदाने लगा। लेकिन वह मंत्र संस्कृत भाषा के नहीं थे । उस औरत के सिर से खून की बूंदे गिरने के कारण  उस आदमी का मुंह भी लहूलुहान हो गया और खून उसके चेहरे से फिसलते हुए बाएं हाथ में पकड़े हुए तारे जैसी आकृति के बीचों-बीच गिर रहा था । इसके बाद वह जोर-जोर से हंसने लगा और बोला "शैतान इस उपहार को स्वीकार करें" 
और उसके बाद वह इधर उधर बेसब्री से देखने लगा। तभी मेरे ठीक पीछे की गलियारे वाली दीवार पर लगा हुआ पर्दा हटा और उसके पीछे से काली दीवार में से कोई चमगादड़ धीरे-धीरे उड़ता हुआ उस  आदमी में जाकर समा गया। चमगादड़ अंदर समाने के बाद उस आदमी में अजीब सी खुशी की लहर दौड़ गई वह जोर-जोर से हंसने लगा । उसके हसने से मेरे दीए की रोशनी भी कम हो रही थी। फिर ऊपर लगी हुई मशाले भी बुझ गई । हालांकि मेरा दिया जल रहा था और वह आदमी मेरे सामने से ही गायब हो गया। उसके गायब होने के साथ ही पूरी हवेली में अनेकों औरतों और लड़कियों की चीखें गूंजने लगी । पूरी हवेली दर्दनाक चीखों से थर्रा रही थी । उन्हीं चीखों में से एक आवाज ऐसी थी... जिससे मेरी आत्मा का जर्रा जर्रा कांप गया था.... जिससे मेरी आंखों में आंसू आ गए थे ......हां यह उसी की आवाज़ थी ......जिसे आजाद करने के लिए मैं यहां तक आया था ।वह आवाज ऊपर की तरफ से आ रही थी । मैं दिए को आगे किए हुए जल्दी-जल्दी भागा।
 मैं स्नानघर वाले गलियारे से निकलकर हवेली के आंगन में पहुंच गया था। लेकिन मुझे कहीं पर भी सीढ़ियां दिखाई नहीं दे रही थी । चारों तरफ कमरे बने हुए थे जिन पर पर्दे लगे हुए थे । मैं एक-एक करके .....भाग भाग कर ...उनको खोल रहा था। लेकिन सीढ़ियां कहीं पर भी नहीं दिखाई दे रही थी। मैं  बेबस होकर घुटनों के बल दीए को हाथ में लिए बैठ गया और देखने लगा क्या कोई दूसरा रास्ता है।
तभी मुझे किसी के भागने की आवाज सुनाई दी जब मैंने उस तरफ दिया घुमाया.... तब मुझे कुछ नही दिखा।

"नहीं.... नहीं.... छोड़ दो...बचाओ" एक छोटी बच्ची की बेहद ही तेज आवाज मेरे कानों में गूंजी । यह आवाज मेरी ठीक पीछे से आ रही थी। मैं तुरंत उसकी तरफ मुड़ा और मैंने देखा एक छोटी सी लगभग 4 या 5 साल की बच्ची बेहद डरी हुई भाग रही है और एक कमरे को खोलकर अंदर चली गई। मैं भी  उसकी आवाज का पीछा करते हुए कमरे में गया। कमरे में गहरी शांति थी.. मैं दिया लेकर कमरे में उस बच्ची को ढूंढ रहा था और मैने देखा कि अलमारी का दरवाजा हल्का सा हिला है। जैसे ही मैंने अलमारी को खोलकर उसके अंदर झांका तो देखा कि अलमारी के अंदर सीढ़ियां बनी हुई थी । शायद वह ऊपर जाने का रास्ता था। मैं उन बेहद ही बदबूदार घनी अंधेरी सीढ़ियों में दिए की रोशनी में बढ़ रहा था । सीढ़ियां खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी और आगे जाकर मेरे हाथ गहरी निराशा लगी क्योंकि यह सीढ़ियां कहीं नहीं पहुंचाती .....किसी बंद काली दीवार पर खत्म हो गई। मैं निराश होकर वापस पीछे मुड़ गया तभी फिर से मुझे वही दर्द भरी आवाज सुनाई दी । मैं पीछे मुड़ा और देखा कि वहां पर एक काली दीवार के अलावा कुछ नहीं है । मैंने जैसे ही काली दीवार को हाथ लगाने की कोशिश की तो लगा यह काली दीवार नहीं है ...ये शायद एक पर्दा है और मैं उस पर्दे के आर पार हो गया अब मेरे चारों तरफ सैंकड़ों पर्दे लगे हुए थे जिनके अंदर  से बड़ी ही दर्द भरी चीखें गूंज रही थी। 
हां..???

 इस जगह में पहले भी आ चुका था..!! [ जब मैं विकास के कमरे पर गया था।] मैं उसका आवाज का पीछा करते-करते आखिर उस पर्दे तक पहुंच ही  गया ...जहां पर पहले भी मैं जाना चाहता था। मैंने उस परदे को हटाया तो फिर वही दिल दहलाने वाला मंजर सामने था । पर्दे के पीछे वही खिड़की थी और उसी तरह वह लड़की बंधी हुई थी। उसके बाजुओं से अब भी खून बह रहा था। उसके मुंह में तौलिया ठूंसा हुआ था । वह जमीन से लगभग आधा फुट ऊपर... कंधों में लपेटी हुई रस्सी के सहारे झूल रही थी ।बड़ी अजीब बात थी उसके मुंह के अंदर तक कपड़ा घुसा हुआ था , फिर भी उसकी आवाज आ रही थी ।शायद वह जीते जी आवाज नहीं लगा पाई .. और वह आवाज उसकी आत्मा की थी । इसी कारण इतना दर्द था उसकी आवाज में।


दिया  खिड़की में रखकर मैं उसे उतारने की कोशिश करने लगा । लेकिन हड़बड़ाहट इतनी ज्यादा थी कि मैं कोशिश करके भी रस्सी खोल नहीं पा रहा था और उस लड़की की दर्द भरी आहेें मुझे और भी ज्यादा झकझोर रही थी। तो मैंने दिए से उस रस्सी को ही जला डाला। मैंने उस लड़की के मुंह से कपड़ा निकाला ......लेकिन शायद वह होश में ही नहीं थी। उसके गाल थपथपाएं और होश में लाने की पूरी कोशिश की ,, लेकिन उसके द्वारा कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।
  ।तभी महंत जी की आवाज गूंजी "अंकित जितना जल्दी हो सके इसे उसी परिधि में ले आओ जहां से तुमने दिया उठाया था।"  
  मुझे कुछ खास समझ में नहीं आया कि क्या करना चाहिए मैंने उसके कपड़े ठीक किए और उसके बाद उसे उठाकर अपने दाएं कंधे पर डाल लिया और बाएं हाथ में दिया लेकर वापस उस रास्ते को खोजने लगा जहां से मैं आया था। वह मुझे बेहद ही हल्की महसूस हो रही थी । असल जिंदगी की तरह मैं यहां पर भी भुलक्कड़ निकला । मुझे रास्ते याद नहीं आ रहे थे । इसलिए मैं हर किसी पर्दे के पीछे झांक कर देख रहा था। कभी कोई पर्दा खाली मिलता ,,किन्ही पर्दों के पीछे कमरे भी दिखे जिसमें औरतें .....लड़कियां ......यहां तक की जानवर भी कैद थे। 
  थोड़ी देर बाद में पूरे  माहौल में घिनौनी बदबू फैलने लगी...!!  जिसे मैं अच्छी तरह से पहचानता था । एक बार फिर वही खौफनाक हंसी गूंजी जो मुझे ठंडे पसीनों में नहला देती थी । हा हा हा हा हा क्या सोचते थे तुम....?? तुम यहां पर आकर बच जाओगे ......तुम यहां आए अपनी मर्जी से हो .......पर कभी निकल नहीं पाओगे .....यहीं के होकर रह जाओगे .....किसी पर्दे के पीछे हमेशा हमेशा के लिए कैद...।
  वह जोर जोर से हंस रहा था और मैं हर एक परदे को उठा कर बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था ।उसके बाद मुझे एक पर्दे को देखकर पता नहीं क्यों लगा कि वह मुझे बाहर पहुंचा सकता है । मैं तेजी से उसकी तरफ दौड़ा और हमारे पीछे पीछे वह काली परछाई जैसा शैतान भी आया। लेकिन मैं उससे काफी आगे था और परदे के ऊपर कूद गया...................!!!! पर्दे के बाहर जमीन थी जिस पर मैं मुंह के बल गिरा था और वह लड़की मुझसे थोड़ी सी आगे गिरी थी । यह सबसे बायीं ओर वाला पर्दा था जिसमे मुझे केवल काली दीवार मिली थी। अब इसी दीवार के पार से मैं आया था। तभी महंत जी की आवाज गूंजी "अंकित..!! संभालो खुद को ...तुरंत उस दिए को लेकर परिधि में आ जाओ"....... और मैंने खुद को संभालते हुए फिर से उस लड़की और दीए को पकड़ा और बहुत तेजी से ही उस मंडप की तरफ बढ़ने लगा । अचानक मेरे दोनों पांव को किसी ने कस के पकड़ लिया। मैंने फुर्ती उस लड़की को परिधि के अंदर उछाल दिया और खुद वहीं गिर गया  ।

यह गलत किया तुमने बहुत गलत किया अब तुम क्या-क्या भुगतोगे  , तुम सोच भी नहीं सकते .....तुम बहुत भुगतोगे अहह हहहह।
  "अंकित ......उससे डरो मत ..उस का मुकाबला करो ....वरना हमेशा हमेशा के लिए यहीं रह जाओगे" महंत जी की आवाज मेरे कानों में गूंजी। लेकिन मैं कुछ नहीं कर पा रहा था क्योंकि उसने मेरी दोनों टांगों को पकड़ रखा था...... और वह मुझे पीछे की तरफ घसीट रहा था...... और घसीट कर मुझे फिर से तीसरे पर्दे के पास लेकर गया...... और वहां से घसीट कर फिर से हवेली के उसी गलियारे में लेकर चला गया । वह मेरे पांव को जोर से मरोड़ रहा था और मैं चिल्ला रहा था । मैं पीछे मुड़ने की कोशिश कर रहा था पर वह मेरे पांव को फिर से मरोड़ देता।मैं बेबस हो चुका था। उस गलियारे में अचानक से रोशनी का एक बिंदु प्रकट हुआ ध्यान से देखने पर पता चला वह दिया है जिसे महंत जी ने हाथ में ले रखा था। 
  "कौन हो तुम और यहां पर क्यों आए हो?"
  काली परछाई ने कड़कड़ाती आवाज में पूछा पर महंत जी बिना जवाब दिए चुपचाप उसकी तरफ बढ़ने लगे । वह मेरे पांव छोड़कर महंत जी की तरफ बढ़ा और महंत जी ने कुछ नहीं किया केवल उसके सिर पर अपना हाथ रखा।

महंत जी के हाथ रखने मात्र से ही वह काली परछाई कांपने लगी जैसे उस हाथ का वजन पहाड़ जितना हो और वह घुटनों के बल बैठ गई। इसके बाद उस काली परछाई जैसे शैतान छटपटा कर दीवार की तरफ हाथ बढ़ाने लगा । महंत जी ने एक हाथ उसके सर पर रख रखा था। दूसरे हाथ में दिया था और दीए को उसके हाथ की तरफ  बढ़ाने लगे। तभी उस काली परछाई नें दीवार पर बनी एक तारे जैसी आकृति को छुआ और वह तुरंत एक कुत्ते में बदल गया । उस कुत्ते को महंत जी भी छू नहीं पा रहे थे और वह गुर्राता हुआ चला गया ।महंत जी ने मुझसे कहा "अंकित अब देर मत करो जितनी जल्दी हो सके हमें यहां से निकल जाना चाहिए"

 मैं वापस गलियारे में पीछे की तरफ दौड़ने लगा तो महंत जी ने कहा "रुको ...!!जो रास्ता अंदर आने का है वह रास्ता बाहर जाने का नहीं है । तुम इस दिए की लौ का पीछा करो । ये तुम्हें सही रास्ते पर पहुंचा देगी।"

हम दीए की लौ का पीछा करते हुए स्नान घर में घुस गए स्नान कर में मैंने देखा जो छोटी बच्ची पहले भाग रही थी...... उसी की खून से लथपथ लाश पानी में तैर रही थी। 

"उसकी तरफ मत देखो चुपचाप मेरे पीछे चलो"

 महंत जी ने मुझे की हियादत  देते हुए कहा । मैं उनके पीछे पीछे चल पड़ा । स्नान घर में एक रस्सी पर साड़ी सुखाई हुई थी । महेंद्र जी ने उस साड़ी को हटाया तो पीछे काली दीवार आई और हम दोनों उस काली दीवार के अंदर से आर-पार होकर सबसे दाएं तरफ के परदे से बाहर निकल गए। इसके बाद महंत जी ने उस परवलयाकार परिधि के छोर पर पुनः दिए को रखा और कहा अब इसके अंदर से चले जाओ। उस परिधि में जाते ही मुझे एक झटका सा लगा और अपना शरीर बहुत भारी महसूस हुआ। जैसे ही मैंने आंख खोलकर देखा तो पता चला मैं वापस उसी जगह पर पहुंच चुका हूं सामने प्रोफेसर राममूर्ति..... महंत जी..... हरि और सौरव बैठे थे।
"अंकित तुम इस परिधि से तुरंत बाहर निकलो ......सौरव यज्ञवेदी को ढक दो ......और हरी इस पूरी परिधि को साफ कर दो यहां पर कोई भी अवशेष नहीं बचना चाहिए" महंत जी सभी को आदेश दे रहे थे। मैं परिधि से बाहर निकला और तुरंत पूछा "वह लड़की कहां है..!!?"

 तो महंत जी ने जवाब दिया "वह एक पहर के विश्रांति काल में चली गई है । तुम सभी जितनी जल्दी हो सके एक बार फिर से नहा धोकर तैयार हो जाओ और भोजन करने के उपरांत मुझे मेरे कक्ष में मिलो।"
 हजारो सवाल मन मे कुलबुला रहे थे,पर महंत जी के आदेश की अवहेलना नहीं की जा सकती थी।हम सभी वापस मन्दिर प्रांगण में चले गए।


प्रिय पाठकों
                 इस कहानी में कोई भी किरदार बेवजह नही है। सभी की भूमिका अगले भाग में स्पष्ट हो जाएगी। अगला भाग लेकर जल्द आ रहा हूँ जिसका शीर्षक होगा।


पर्दाफाश
इस भाग में अधिकांश राज आपके सामने स्पष्ट हो जायेगे।

एक अनुरोध भी है। मेरी लिखी हुई पहली विस्तृत प्रेम कथा मंजिल प्यार की को पढ़कर मार्गदर्शन दे।
इस कहानी को भी 5 स्टार रेटिंग व समीक्षा दे ताकि इसको मैं उत्साह पूर्वक जल्दी पूरा कर सकूं।अगले भाग प्राप्त करने के लिए मुझे फॉलो करें। पढ़ते रहिये मातृभारती ।


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